Wednesday, December 31, 2025

बेखबर

कैद जिसकी ख्वाइशें,
वो कैसे आज़ाद रहेगा,
बिना मिले खुद से,
वो कैसे खुद से सच कहेगा ।

उलझन जिसको जीने में,
वो भला जिंदगी कैसे देगा,
खामोशी को पढ़ने वाला,
किसी रोज़ उसे भी पढ़ लेगा।

तस्वीरों से भला,
क्या खूब किस्से वो बनाता हैं,
हर दर्द छिपा कर,
बस खुद को कैद कर जाता है।

पर कब तक ये सिलसिला,
गुमनाम बन कर फिरता रहेगा,
क्या कभी ठहर कर,
खुद से कुछ कह सकेगा ।

गर नहीं कहा किसी से,
कोई भला उससे क्या कहेगा,
शायद वो भी उस जैसा,
खुद में उलझा रहेगा ।

खत्म कर के खामोशी,
एक बार शोर मचाते जाना,
शायद मिल जाए वो जवाब,
जिससे अब तक था वो अनजाना !


Saturday, November 29, 2025

मासूम दिल

किन्हीं किस्सों में उसके,
उसके हिस्से की बात भी होगी,
संग अक्सर होते सब उसके,
पर खुद से उसकी मुलाकात कब होगी ?

जिसकी बातों में आकर उसने,
सब कुछ अपना कुर्बान किया,
वक्त आने पर उस कमबख्त ने,
उसे खुद से भी अंजान किया ।

आज मुसाफ़िर आया है,
चेहरे पर उसके मुस्कान लाने,
सजा कर अल्फ़ाज़ को,
लम्हों को उसका बनाने ।

कहा कभी आंखों को किसी ने,
उसके जैसे वो भी मासूम हैं,
दिल के जख्मों को छिपाने में,
वो भी उस जैसे मशहूर हैं ।

होठों पर उसके ये जो मुस्कान,
अब लौट कर आई है,
बस इतनी थी कोशिश,
देखो शायद जो रंग लाई है।

इश्क़ के श्वेत रंग में,
वो इंद्रधनुष बन कर आई है ,
अरसों बाद ... आज फिर ,
खिल खिलाकर मुस्कुराई है ।।