Saturday, July 16, 2016

ख़ामोशी

है ख़ामोशी का मंजर चारो ओर ,
घनघोर अँधेरा पसरा है ,
है साथ नहीं कोई मेरे ,
तन्हाइयो मे टूट कर दिल बिखरा है |

मैं देख रहा इधर उधर ,
कही कोई दिख जाए ,
तन्हाई के इस आलम मे ,
कोई अपना मिल जाए |

मैं हो कर भी साथ सभी के ,
ख़ुद को तनहा पाता हु ,
वक़्त के साथ बदलते देख अपनो को ,
मायूस हो जाता हु ।

मैं करता इजहार खुल के ,
अपनो से मोहब्बत का ,
पर कोई सुन नहीं पाता ,
अक्सर सोच जिसे मैं ख़ामोश हो जाता ।

काश इस शहर मे ,
हमें कोई अपना मिल जायें ,
चल रहाँ दौर जो ख़ामोशी का ,
शायद वो थम जाए ।

है भरोसा ,
ख़ामोशी तु एक रोज़ दूर जायेंगी ,
जो हो गया वास्ता हलचल से मेरा ,
तू मुझ जैसे ख़ुद को तनहा पायेंगी ।

उस रोज़ ख़ामोशी से ख़ामोश हो ,
तू ख़ूब आँसू बहायेंगीं ,
ख़ामोशी भी ख़ामोश हो कर ,
कहीं गुम हो जायेंगी ।

Sunday, June 5, 2016

दर्द

चारो तरफ शोर है ,
मेरी आवाज़ कमजोर है , 
कास कोई सुन पाता ,
मेरी आवाज़ को उन तक पहुंचाता . 

मैं लड़ रही हु मुस्कुरा के ,
पर गम छिपा नहीं पाती , 
ख़ामोशी का क्या है ,
इस शोर मे वो भी अक्सर छिप जाती . 

हर रोज़ चल पड़ती हु , 
ए दर्द तुझे छिपाने ,
बस होती है यही कोशिश ,
तू है साथ मेरे , ये कोई ना जाने .

पर क्या खूब खेल खेलती है ज़िन्दगी भी ,
क्या हम किसी को बताये ,
दर्द थे कम नहीं ज़िन्दगी मे ,
दो चार और ले आये .

है भरोसा आज भी ,
ये शोर एक रोज़ थम जाएगा ,
ऐ गम 
ज़िंदगी ने जो दिया है तुझे साथ मेरे , 
एक रोज़ वो भी छूट जाएगा .

ऐ दर्द फ़िक्र मत कर ,
तुझे बिता कल बनाउंगी ,
होगी फिर एक सबुह ,
तनहा अकेला छोड़ तुझे ,
अपनी ख़ुशी संग कही दूर चली जाउंगी .

अलविदा दर्द , 
लौट कर नहीं आउंगी ...

Tuesday, May 31, 2016

हाँ ... वो जायेगी

पहली दफा देख जिसे , 
दिल अपना कह बैठा था ,
जा रही थी दूर वो भी , 
जब ख़ुदा हमसे रूठ बैठा था . 

जिसकी मुस्कान हमे हसाती थी ,
आँखे जो भर आये उसकी ,
मेरी जान निकल जाती थी , 
आज बहुत रोई ,
पूरी रात नहीं सोई .

कल तक हाथो मे हाथ डाले ,
हम यु ही चला करते थे , 
खींच के ले आते थे पास ,
जो कभी वो दूर जाया करते थे . 

आज एक दफा फिर ,
वो लौट कर आई थी ,
साथ अपने अंगूठी लाई थी ,
देख जिसे मैं थोड़ा घबराया ,
पर कुछ कह नहीं पाया .

वो झट से मेरे करीब आई ,
आँखे थी उसकी भर आई  ,
देखते ही नम आँखों को उसके ,
हां वो जायेगी .. 
ये बात समझ आई .

चल पड़े एक दफा फिर तलाश मे उसके ,
शायद कही नजर आ जाये ,
मोहब्बत थी नहीं इतनी भी कमजोर हमारी ,
की वो नजर ना आये .

दिल को था पता ...  हां वो जायेगी ,
पर समझा नहीं पाया ,
अंजान रहो मे ढूंढने उसे चला आया .

Sunday, April 17, 2016

अजनबी

अनजान राहों पर मिले थे कभी , 
सोचा ना था मिलेंगे फिर कभी ,
पर वक़्त ने आज मिला दिया , 
एक बार फिर ख़ुशी से दिल मुस्कुरा दिया । 

देखा जो पहली दफ़ा आँखों मे उसके , 
क्या ख़ूब जादू है , 
बोल कर 'हम' सिर्फ हमें , 
कर दिया इस दिल को बेक़ाबू है ।

झुकीं पलके , उठीं आँखें , 
होंठों पर मुस्कान , 
पर दिल मे दर्द काफी है , 
मुस्कुरा के अक्सर उन्हें वो छिपातीं है । 

बिन कुछ कहे उसके , 
मैं सब जान गया हु , 
थी अजनबी कुछ वक़्त पहलें तक ,
अब पहचान गया हूँ । 

दिल से ख़ूब हँसीं वो , 
आज अरसो के बाद , 
मिल गया शायद उसे ,
जिसे ढूँढती थी वो दिन रात ।

तू जो यु मुस्कुरा रहीं है , 
दिल को समझा रहीं है , 
मन को बहला रही है ,
लटों को घुमा रहीं है । 

मुझे है सब मालूम , 
कमबख़्त ये दिल है बड़ा मासूम । 

आओ चलों फिर तुम्हें , 
ख़यालों मे ले जातें है , 
आओ एक दफ़ा फिर , 
अजनबी बन जाते है ।

Tuesday, April 12, 2016

मौत को आना है .. जिनको जाना है

मौत को भी आना है एक रोज़ , 
हम को भी जाना है , 
जीले ज़िन्दगी मुस्कुराके , 
गम मे क्यों उसे बिताना है | 

हर ओर ख़ुशी की तलाश मे , 
हम झट से हर लम्हे को समेट लाते , 
हम तो उनकी ही खातिर , 
गम मे भी मुस्कुराते | 

था भरोसा खुद पर नहीं , 
या यु कहे उनपर खुद से जादा कही , 
पर एक झटके मे वो सब बिखरा गए , 
मौत और मेरे फासले को मिटा गए | 
 
जो कभी मौत को हमने बुलाया ,
वो झट से चली आएँगी , 
टूटे रिश्ते और वादों को देख रही है खूब वो , 
अब उसके आने के बाद ही कही खबर जायेगी |

हमारे कल को आज ला कर , 
हमे वो कल मे ले गए , 
छीन कर ले गए एक झटके मे खुशिया हमारी , 
हम बस देखते रह गए |

था क़सूर सिर्फ इतना मेरा ,
हम कुछ नहीं थे छिपाते , 
सच चाहें हो कैसा भी , 
हम आ कर झट से थे उन्हें बताते ।

चल रहे थे ख़ुशियों के सड़क पर , 
वक़्त ने एक दफ़ा फिर हमें ढकेला है ,
छूटा है सिर्फ़ साथ ही नहीं अपनो का , 
सच ने भी हमसे मुँह फेरा है ।

चलो जो चले भी गए दुनिया से , 
दिल मे मलाल नहीं होगा , 
सच्चे तो हम अपनो कीं ख़ातिर हुए है , 
उम्मीद है फिर कभी सच्चे दिल वालों का , 
ये अंजाम नहीं होगा , 
हर तोड़ने वाले भरोसे वालों का , 
बस मेरा यहीं आख़िरी पैग़ाम होगा .. 

मौत को भी आना है ... हमको भी जाना है ।

Thursday, March 17, 2016

माँ

 रिश्ता जिससे सबसे पुराना है , 
आज इस भीड़ भाड़ मे , 
वही अनजान है . 

कोख मे रह के जिसके ,
 ढेरो हमने उसे परेशान किया , 
दुनिया मे आते ही , 
औरो की खातिर उसे अनजान किया . 

हर बार ख़ुशी मे वो याद ना आती है ,
गम के एक छोटे से लम्हे मे ही , 
रूह भी उसका नाम ले चिल्लाती है .

खुलते आँख सुबह जिसे पहला ख्याल मेरा आता है , 
सोते हुए भी जो खयालो मे जो मुझे संग ले जाता है , 
ऐ वक़्त क्या खूब खेला है खेल तूने , 
मुझे तो उसका चहेरा भी , अक्सर धुंधला नजर आता है .

मेरे तन पे देख , एक खरोच भी , 
जिसकी आँखे भर आती , 
मेरी आँखे क्यों अब उसके भीगी पलकों को ,
देख नहीं पाती .

आज अभी इस पल से , 
चलो सब एक साथ कसम खाते है , 
खून का थोड़ा ही सही , 
कर्ज चुकाते है . 

आओ चलो सब मिल कर माँ को ,
उसके बच्चे से मिलवाते है , 
आओ सभी एक बार फिरसे , 
माँ की खातिर बच्चे बन जाते है .


Friday, February 5, 2016

साथ

जब थाम कर हाथ हम उनका , 
चले थे कुछ कदम दूर , 
मांग बैठे ज़िन्दगी भर का साथ , 
हमसे हमारे हज़ूर . 

छोड़ना पड़ा बीच राह मे साथ हमे , 
हाथ उनका ,
ज़िन्दगी से ज़िन्दगी का साथ कैसे निभाते , 
जब लिख चूका था खुदा कोई और उनके किस्मत मे , 
हम कहा से उन्हे अपना बनाते . 

बस जो छोड़ा साथ हमने ,
अनजान रहो पर उनका , 
कोई अपना ना जाने कहा से आ गया , 
थाम कर हाथ , साथ उन्हे , 
उनकी मंजिल की ओर ले गया .

देख जाते संघ उन्हे किसी अपने के , 
दिल को सुंकून मिल गया , 
छोड़ते ही हाथ उनका , उसकी खातिर ,
मेरा चहेरा मानो मुरझाया , 
और उनका खील गया .

हम भी चल पड़े थे , 
अनजान राहों पर फिर एक दफा , 
शायद कही मंजिल मिल जाए , 
खुदा ने रखा होगा कही ,
खाली हथेली हमारी खातिर भी , 
शायद इन्ही राहों पर वो हमे मिल जाए . 

#उम्मीदपेदुनियाकायम 

Thursday, December 24, 2015

मेहँदी

अब अक्सर जब निहारता हु ,
कल को ,
तू याद आती है ,
ना कोई सवाल , ना कोई जवाब ,
बस हाथो पर सजी मेहँदी नजर आती है .

यु चल रहे सिलसिले को ,
ना जाने वो क्यों तोड़ गए ,
एक दफा पूछा भी नहीं हमसे ,
बिन कुछ कहे मुह मोड़ गए .

उस रोज़ खुलते ही आँख ,
तेरी हाथो पर रंगी मेहँदी नजर आई ,
मानो ख्वाबो मे से ,
मेरे पीछे पीछे थी तू चली आई .

खुश हुआ ये जान कर ,
बिना कुछ मांगे पहली बार मिला था ,
पर क्या पता था ,
बस वही आखरी बार तेरे जहन मे ,
हमारा ज़िक्र हुआ था .

कभी रुखसाना बन हमे जलाती ,
कभी बड़ी बड़ी बातो से अपना बनाती ,
हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते ,
झेलना जब उन्हे तक़दीर मे लिखा था ,
हम कैसे तक़दीर के खिलाफ जा पाते  .

चल पड़ा था ये सिलसिला ,
कई दफा टूटने के बाद ,
जानने लगे थे तुझको कुछ हद तक ,
बहुत कोशिशो के बाद .

नहीं पता वजह क्या है ,
और अब जानना भी नहीं ,
तू जो गयी दूर ,
जरूर होगी तू मजबूर .

वरना कल तक साथ निभाने वाले ,
आज यु दूर ना जाते ,
तोड़ कर अपने दिल को ,
हमे ना कुछ बताते .

एक दफा पूछ लिया होता मुझसे ,
जो थी अगर कोई बात ,
बिना कुछ कहे ,
क्यों छोड़ गयी तू मेरा साथ .

मेहँदी लगे हाथो पर तेरे ,
कदम चूमे तेरे खुशिया हज़ार ,
वादा है मेरा , जो बस चला दिल पर ,
अपने नाम की मेहँदी तेरे हाथो पर ,
ये ख्यालो मे भी ना सोचेंगे यार .

तेरी मेहँदी एक पहेली है ,
जानता हु तू आज बहुत अकेली है ,
पर हम क्या कर पाएंगे ,
जब आप यु ही हमे हर दफा अधूरे मे ,
अपनी हाथो पर सजी मेहंदी के यादो संग ,
छोड़ जाएंगे .

माँ ... माँ होती है

मैं आई थी जब कोख मे ,
माँ ने नहीं बताया , 
बेटी हु जान कर उसने , 
सबसे था मेरा राज़ छिपाया . 

मैं आई जब इस जग मे , 
पापा संग सबकी चहेती हो गयी , 
माँ के भी हिस्से का प्यार , 
माँ से मैं छीन ले गयी . 

हर रोज़ मेरे नींद से वो जग जाती , 
ख्वाबो मे धकेल कर मुझे ,
तब कही जाकर वो सो पाती . 

एक दफा मैं चोट खा कर घर आई ,
देख जिसे माँ की आँखे भर आई , 
मैं कुछ कहती उससे पहले ही बाहों मे समेट , 
पूछने लगी ये चोट कहा से लाइ . 

माँ ने चोट की जोर से फटकार लगाई , 
कहा अब फिर कभी मेरी बेटी के पास ना आना , 
देख उसके इस अंदाज़ को , 
मैं जोर जोर से खिलखिलाई . 

वक़्त का पहिया चल पड़ा था ,
माँ से बिछड़ने का वक़्त निकल रहा था ।

मेरी भी कोख मे एक , 
नन्ही जान आ रही थी , 
माँ के पास हो कर भी , 
मैं उससे दूर जा रही थी . 

एक रोज़ वक़्त ने क्या खेल खेला , 
देख जिसे मैं दंग रह गयी ,
माँ माँ होती है , 
उस रोज़ ये बात समझ आयी , 
जिस रोज़ बेटी कीं ख़ातिर ,
मैं माँ को आख़िरी वक़्त मे छोड़ आयीं .

Sunday, November 15, 2015

बेटियाँ .. माँ की परछाईं

जन्म के रोज़ ही ,
रोष जो थी वो सबमे लाइ , 
लौट आया था वो वक़्त , 
जब उसकी माँ थी दुनिया मे आई |

हर तरह बस सन्नाटा सा था छाया , 
देख मुझको माँ को छोड़ , 
कोई ना था मुस्कुराया | 

अपनों से घिरी मैं को , 
सब ने पराया बना दिया , 
गोद मे तो लेना दूर , 
नज़रो से भी गिरा दिया | 

सहमी मुझे देख माँ ने ,
आँचल मे छिपा लिया , 
भीगी पलकों संग मुस्कुराना , 
माँ ने मुझको भी सीखा दिया | 

वक़्त के साथ सब बदलने लगा , 
माँ से जादे पिता का साथ मिलने लगा , 
औरो ने भी मेरे प्रति स्नेह बढ़ाया , 
देख जिसे मुझमे एक जुनून सा था आया |

मैं पंख लगा कर अब उड़ने को ,
तैयार खड़ी थी , 
अपनों के सहारे के लिए , 
माँ की परछाई बनी थी |

कल तक जहा अपनों ने गैर बनाया था ,
आज गैरो को भी मुझमे , 
कोई अपना नजर आया था | 

एक दफा फिर वक़्त लौट कर आया , 
इस माँ के बेटी की गोद मे ,
एक बेटी को उसने था पाया , 
पर फर्क सिर्फ इतना था ,
इस बार मेरी माँ की परछाई ( मै ) संग ,
पूरा समां था मुस्कुराया | 

माँ तेरी परवरिश का ही था ये असर , 
जो ये मुमकिन हो पाया , 
झुकी नजरो तो उठी ही , 
समाज ने भी हमे अपनाया ||

सोच बदलो , समाज बदलो .. बेटियाँ तो देवी का रूप थी , है और रहेंगी ... || 

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Sunday, September 20, 2015

इंतज़ार

पहली दफा मिला था जो ,
अब तक जहन मे बसी उसकी याद है , 
फिर अब कब मिलेंगे , 
बस इसका इंतज़ार है . 

यु तो हर रोज़ अब ख्यालो मे , 
आ बस जाती है तू , 
दे कर वास्ता लौट आने का ,
वहां भी इंतज़ार कराती है . 

होश मे आते ही , 
ख्यालो को अपने कोसने लग जाते ,
क्यों करता हु इंतज़ार तेरा , 
बस यही सोचने लग जाता . 

तुझे मेरी आंखो मे खूबसूरती दिखती है , 
पर अपना हाल कैसे तुझे बताऊ , 
जब तू करती है मोहब्बत पिज़ा से , 
हाले दिल कैसे बर्गेर का सुनाऊ . 

दिखा कर घड़ी मुझे ,
वक़्त का अहसास दिला गयी ,
जब तक कहता कुछ इंतज़ार की खातिर , 
खुद को कही छिपा गई . 

नज़रे तलाशती रही उसे ,
शायद वो अपने वक़्त की खातिर लौट आये ,
पता नहीं था कुछ इस कदर दगा देंगी वो , 
कह कर इंतज़ार , 
ताउम्र इंतज़ार करना पड़ जाए .. 

ना कभी वो लौटे उस इंतज़ार की खातिर , 
और हम इंतज़ार करते रह जाए ..

Tuesday, July 7, 2015

ख़ुशी

कल तक ना थी ज़िन्दगी मे ख़ुशी ,
पर आज वो आ गयी ,
गम के चादर को हटा कर ,
लम्हे को खुशनुमा बना गयी .

पहली दफा जो मिली थी मुझे ,
उस गमे हाल मे ,
सवार दिया ज़िन्दगी मेरी खुशियो से ,
उसने हर हाल मे . 

मैं अब जब कभी लड़खड़ाता ,
वो झट से संभाल लेती ,
छिपा कर अपना हर दर्द ,
मेरी खातिर मुस्कुरा देती .

मेरे गुस्से को सहेती ,
मेरी वजह से अक्सर उलझन मे रहती ,
फिर भी नहीं कुछ कहने को आती ,
देखते ही मुझे .. भुला कर सब ..
झट से मुस्कुराती .

मैं जाहिर नहीं करता हर वक़्त ख़ुशी से ,
पर महसूस हर सांस मे उसे करता हु ,
ख़ुशी की पड़ गयी है आदत कुछ ऐसी ,
ज़िन्दगी भर खुशियो की खातिर ,
बन बैठा ख़ुशी का गुलाम हु .

यु तो वक़्त के साथ ,
एक रोज़ तुझे भी जाना है ,
पर वादा है ख़ुशी तेरी मुस्कान की खातिर ,
हमे आज भी और कल भी मुस्कुराना है .

कर लो मोहब्बत तुम भी ख़ुशी से ,
इस गम से भरे जमाने मे ,
वरना कौन जानता है ,
कितने पल की ख़ुशी लिखी है ,
हर एक के मुस्कुराने मे . 

Dedicated to you zindagi ..

Tuesday, June 30, 2015

बेपरवाह आशिक़ी

मेरे आंखो से छलकते मोती , 
बड़े हैरत से बहते जा रहे है ,
दिल जला जैसे ही मोम सा , 
पिघल कर पलकों को भीगा रहे है . 

बड़ी हैरत से हैरान हुए हम , 
बस एक लम्हे मे आप से अनजान हुए हम ,
कहा सोचा था दिल पे तेरे मेरा काबू है ,
कमबख्त दिल सोच कर उनको ,
तेरा हो उठा बेकाबू है .

बड़ी सिद्दत है चाहा है तुझे ,
बड़ी मुश्किल से पाया है तुझे ,
पर जाना तो हर किसी को है एक रोज़ ,
 फिर क्यों तुझे खोने से डरता है दिल हर रोज .

मैं जब संग उसके काफी दूर चल पड़ा था , 
ज़िन्दगी को सही रास्तो से जोड़ रहा था , 
तभी किसी अनजान डगर पर , 
वो अपने कल से जा टकराई ,
आशिक़ी मरती नहीं दूर जाने से ,
आंखो मे देख ख़ुशी उसके ,
ये बात समझ आई .

लगा मानो खो दिया हो ,
उसे बस एक पल मे ,
पर तभी झट से लौट मेरे पास आई ,
बाहो मे लपटी वो मेरे कुछ इस अंदाज़ मे ,
दिल के जज़्बात आंखो से बहते आंसू से समझ आई .

हम ने भी किया था किसी और से मोहब्बत , 
और शायद फिर से हो जाए ,
मिल कर अनजान रास्तो मे अपने कल से , 
कुछ वक़्त के लिए आज को भूल जाए . 

दिल तो रहता है एक , 
पर उसपर कब्जा अक्सर कई कर जाते ,
पर धड़कता दिल सिर्फ उनके लिए ,
जो सिद्दत से मोहब्बत कर ,
हर कदम पे आशिक़ी निभाते .

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