Thursday, November 2, 2017

तुम

अभी बस हम ख़ुशी से हटे थे ,
जा जब तुझसे मिले थे ,
सोचा ना था यादें से उनके निकल ,
तेरे हो चले थे ।।

ना तेरा मेरा कोई रिश्ता था ,
ना थी कोई पहेचान ,
थे कल तक जो अजनबी ,
अब नहीं थे अनजान ।।

तुम से मिलकर ... तुम से मिला था ,
अजनबी अब अनजान ना रहाँ था ,
हो रहीं थी बातें बेशुमार ,
होने लगीं थी मोहब्बत फिर एक बार ।।

तभी मधुशाला ने क्या खेल खिलाया ,
गड़ा मुर्दा जाग आया ,
देख जिसे , ख़ुद को तुमने ,
ज़िंदा लाश बनाया ।।

खो दिया तुम को मैंने ,
अब कहाँ तुम आओगी ,
वक़्त के साथ ,
एक हसीन याद बन जाओगी ।।

पर फ़र्क़ होगा थोड़ा ,
और को हम लिखकर सुनाते ,
तुम पर हम लिखते जाते ,
पड़ जिसे वो भी ‘तुम’ से मोहब्बत कर जाते ।।
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Wednesday, October 11, 2017

काजल ... आँखो का



यूँ जो तनहा सा किसी कोने में ,
एक दिल पड़ा था ,
जा जिससे मेरा दिल मिला था ।

आँखो से होती थी बातें ,
वादों से होती थी मुलाक़ातें ,
ये सिलसिला बस चलने ही लगा था ,
उनका दिल कहीं और चल पड़ा था

जो तमन्ना थी मेरी ,
वो अधूरी रह गई ,
दिल से मिला दिल उनका ,
मेरी आँखे देखती रह गई ।

चल पड़ा ये सिलसिला ,
अब बड़ता जा रहाँ था ,
डूब कर वो इश्क़ के समुन्दर में ,
उन्हें , उनके और क़रीब ला रहाँ था ।

एक रोज़ अनजान राहों पर ,
निगाहे टकरा गई ,
आँखे देख मायूस उनकी ,
बात समझ आ गई ।

दिल का दर्द पिघल गया ,
आँसु काजल लिए साथ बह गया ,
फिर एक दफ़ा ये निगाहे ,
उनकी आँखो में डूब कर देखता रह गया ।।

Saturday, September 9, 2017

अनजान निगाहें




यू जो हम ढूँढ रहे थे उन्हें ,
कही किसी राहों में ,
जा टकराई निगाहे मेरी ,
किसी अनजान निगाहों से ।

मैं चलता कुछ आगे ,
उससे पहले ही निगाहे थम गई ,
रुक गया 'वक़्त' भी ख़ातिर मेरे ,
देख जिन्हें वो थोड़ी सहम गयी ।

अभी जो शुरू ही हुआ था ये सिलसिला ,
आँखों से ख़ुशी होंठों पे आ गई ,
दिल में थी कसक जो मेरी ,
उन्हें वो पूरा करा गई ।

ख़ूबसूरत होगी शायद सूरत उनकी ,
पर सीरत दिलदार है ,
टूटा है दिल उनका .. , मगर ,
निगाहों में आज भी प्यार है ।

यू तो अब भी मेरी तलाश अधूरी हैं ,
निगाहे में छिपी मोहब्बत अधूरी हैं ,
अनजान राहों पे ,
मिले जो कभी किसी दफ़ा ,
फिर बतलाएँगे ।

हुआ क्या था हाले दिल ,
देख अनजान निगाहों को ,
ये आप को समझाएँगे ।

निगाहे होती अगर अबतक अनजान ,
तो शायद ये दिल उसपर आ जाता ,
ढूँढ रहा था जिसे वो ,
शायद वो मिल जाता ।।



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Sunday, May 21, 2017

नाज़ुक


मैंने देखा जो उन्हें पहली दफ़ा ,
नज़रें गई थी थम ,
सहेमी सी बैठी थी एक कोने में ,
जहाँ जा पहुँचे थे हम ।

उम्मीद भरी निगाहों से ,
वो पलकें उठा रहीं थी ,
देख इस अजनबी को  ,
वो नज़रें चुरा रही थी ।

नाज़ुक सा दिल जिसका ,
अदा में सादगी है ,
खुदा ने क्या ख़ूब बनाया हैं ,
सीरत भी पाक सी हैं ।

हैं जो मालूम हो चला हमें सब ,
आज भी वो अनजान हैं ,
दिल तो हैं सिने में मेरे ,
पर वो उसकी जान है ।

वो लाल रंग भी क्या ख़ूब खिला है ,
रोशन हो उठा समा हैं ,
देख जिसे भी , आज दूर तक ,
इस नाज़ुक दिल पर वो फ़िदा है ।

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Tuesday, April 25, 2017

आवाज़

रोज़ सुबह हल्के अंधेरे में ,
चिड़ियाँ मधुर गीत गुनगुनाती है ,
तभी किसी कोने से ,
ज़ोर की आवाज़ आती हैं ।

मैं समझ नहीं पाता बोल ,
सो ख़ामोश हो जाता हु ,
एक दफ़ा फिर ख़ुद को ,
नींद की ओर ढकेल जाता हु ।

जब आती है ख़ामोशी लौट ,
शोर थम जाने के बाद ,
चिड़ियाँ फिर गुनगुनाती है ,
सुकून भरे गीत गाती है ।

आवाज़ से नहीं ,
अन्दाज़ से शिकायत हैं हमें ,
किसी धर्म से नहीं ,
इंसान से चाहत हैं हमें ।

जो सुनता वो शोर से ,
हम ज़ोर से ही चिल्लाते ,
क्यूँ खामखां दबी आवाज़ में ,
उसके दर को जाते ।

मैं मुझे पसंद है ,
इसका बिलकुल मतलब नहीं ,
वो उसे पसंद हैं ।

आवाज़ ज़रूरी हैं ,
उठाने के लिए ,
पर नींद से नहीं ,
कुछ गुनगुनाने के लिए ।

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Sunday, April 23, 2017

नूर

मैं जी रही थी ज़िन्दगी ,
बड़ी ज़ोर शोर से ,
ख़ामोशी ने थाम लिया ,
ना जाने किस ओर से ।

मैं बड़ रहीं थी ओर मंज़िल के ,
मंजलि पीछे हो चली ,
ख़ूबसूरत सपनो की ख़ातिर ,
मैं अपनो को खो चली ।

थामा था हाथ बहुत भरोसे से ,
लगा हुए हम अधूरे से पूरे से ,
पर उस रोज़ हम भी टूट गए ,
जिस रोज़ वो हमें ख़ामोशी से छोड़ गए ।

लगा मानो सब ख़त्म हो गया ,
मेरी एक नादानी से ,
मेरा मैं भी मुझसे दूर हो गया ।

ख़ुद को तलाशने मैं अब निकल पड़ी ,
लोगों ने ली निगाहे थी फेर कहीं ,
आइना भी मुझे ना पहेचान सका ,
वो भी नूर से अनजान रहा ।

बदल रहीं इस दुनिया को ,
मैं थी पहचान गई ,
जीती थी जिस ज़िन्दगी की ख़ातिर ,
आज मेरी वो ग़ुलाम हुई ।


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Friday, November 18, 2016

मुस्कान

पलकें उठीं , होंठों पे हँसीं ,
गालों पे डिम्पल ,
ज़ुल्फ़ों ने मुस्कान कुछ छिपाया है ,
इनके ख़ूबसूरती ने दिलों को जलाया है ।

मासूमियत उसकी हर अदा मे महसूस होती है ,
दूर हो कर भी वो पास होती है ,
जिस शाम हो जाए दीदार उसके ,
वो रात हसीन होती है ।

है दिल टूटा भी उसका ,
पर अक्सर दिल लगा जाती है ,
है मोहब्बत दिल मे बहुत ,
पर सच्ची मोहब्बत ना मिल पाती है ।

उड़ना चाहती है वो असमानो मे ,
पर कोई हौसला दे पाता ,
शायद हसीन मुस्कान की मोहब्बत को ,
ख़यालों मे ही उसको ले उड़ जाता ।

है कहीं जब अब दिल से मुस्कुरा रहीं है ,
ख़्यालों मे मुझे वो ला रहीं है ,
ख़ूबसूरत मुस्कान लौट चहरे पे आ रहीं है ,
ना जाने कितने दिलो को जला रहीं है ।

तेरी सीरत का पता नहीं ,
पर होंठों पर मुस्कान देख कुछ हद तक समझ आता है ,
दिल से हो साफ़ बहुत तुम ,
पर तुम्हें कोई दिल समझ नहीं पाता है ।

मुस्कुराओ जी भर के ,
एक रोज़ दिल भी मुस्कुराएगा ,
जिस रोज़ तुम्हारे मुस्कुराने की वजह ,
वो तुम्हारे क़रीब पाएगा ।

Tuesday, November 1, 2016

अड़सा ( कंजस्टेड )

कही रिश्तो में अड़सा होता है ,
कही अपनों में अड़सा होता है ,
हमारी तो मोहब्बत है अड़सा ,
जो हर वक़्त यादो में साथ रहता है |

कभी एक बिस्तर पे हम अडस कर सोते थे ,
पर कोई शिकायत को ना था आता ,
आज कमरे हो गए है अलग अलग ,
फिर भी उन्हें अड़सा है नजर आता |

मोहब्बत गैरो से इतनी भी ठीक नहीं ,
कही अपने बहुत पीछे छूट जाए ,
ज़िन्दगी तो है खुद एक अड़सा ,
पर कही आप रिश्तो में ना अडस जाए |

हमे फक्र है अपनों से मोहब्बत की ,
सिवा उनके , कुछ और समझ नहीं आता ,
दुःख होता है देख उन्हें ,
जिन्हें अपनों से अड़सा ,
गैरो से मोहब्बत हो जाता |

मोहब्बत अपनों से दिल से है ,
दूरियों से वो कहा कम हो पायेगी  ,
कर लो कितनी भी कोशिश ,
ऐ मेरे दोस्त ,
अड़से में ही सही ,
पर आखिरी सांस तक ,
ज़िन्दगी अपनों की खातिर मुस्कुराएगी |

अड़से से ही सही ,
अपनों को अपना के देखो ,
गैरो को ख्यालो से हटा के देखो
अड़से से मोहब्बत हो जायेगी ,
हर किसी अपने में ,
ख़ुद की ख़ातिर ख़ुशी नजर आएगी |

अड़स रहीं ज़िन्दगी का अपना ही मज़ा हैं ,
खुल के तो हर कोई जिया हैं ,
अपनो से मोहब्बत ही तो हैं 'अड़सा' ,
इतने सितम के बाद भी ,
जो साथ खड़ा हैं ।

कई लोगों से बातचीत और उनके अनुभव के आधार पर लिखी गई कविता ।

Thursday, July 28, 2016

साथ

पहली दफ़ा नज़र गयीं तो ,
कुछ वक़्त गुज़र चुका था ,
हो गई थी मायूस वो ,
अनजाने मे मैं आगे बड़ चला था ।

मिली नज़र जो पहली दफ़ा ,
उसको ख़ुद से जुदा पाया  ,
देख जिसे मैं ख़ुद को ,
कुछ वक़्त ख़ामोशी को था दे आया ।

उसकी हँसी , उसका अन्दाज़ ,
उसकी निगाहे , उसके अल्फ़ाज़ ,
सब बेचारगी मे पड़े थे ,
और वो यू ही सामने मायूस खड़े थे ।

मिलते ही निगाहे ,
वो उन्हें चुराने लगीं ,
दिल मे हो रहीं हलचल को ,
मुस्कुरा के छिपाने लगी ।

देखती है निगाहे उनकी फ़ुरसत से हमें ,
पर अब नज़रें नहीं चुराती ,
निगाहों से ही अब अक्सर वो ,
हर बात कह जाती ।

सिलसिला जो हुआ है शुरू ,
अब ना थम पायेगा ,
हैं हम हर पल साथ तेरे ,
ये बहुत जल्द समझ आएगा ।

उम्मीद

है शाम अंधेरी घनी सी ,
घनघोर अँधेरा छाया है ,
हैं मंज़र ख़ौफ़ का ,
हर ओर मौत का साया है ।

मैं देखू जिधर कही भी ,
कुछ नज़र नहीं आता ,
हैं उम्मीद तेरे आने की ,
सोच जिसे मैं मुस्कुराता ।

मैं थाम कर दामन अपनो का ,
कुछ आगे बस बड़ा था ,
पीछे मूँड़ कर देखा तो ,
सुनसान रास्ता पड़ा था ।

छोड़ गये वो हमें अपनो कीं ख़ातिर ,
हम उन्हें अपना कहते रह गए ,
वो पकड़ ग़ैरों का दामन ,
हमें कोसते रह गए ।

हुई ख़ता बस इतनी हमसे ,
हम अपनो कीं ख़ातिर जीते मरते है ,
वरना सच कहें ,
आप को आप के अपने ,
ही अक्सर कोसा करते है ।

चलो ख़ुशी है इस बात कीं ,
ख़ुशी है आज भी मेरे साथ ही ,
रोशनी जल्द वो लायेंगीं ,
इस घनघोर अंधेरे को मिटायेंगीं ।

अपनो कीं ख़ातिर जीने मरने वाले ,
हम यूँही अपना फ़र्ज़ निभाएँगे ,
छिपा लो कितनी भी चमक मेरी ,
एक रोज़ हम सबकी ख़ातिर जगमगाएँगे ।

Saturday, July 16, 2016

ख़ामोशी

है ख़ामोशी का मंजर चारो ओर ,
घनघोर अँधेरा पसरा है ,
है साथ नहीं कोई मेरे ,
तन्हाइयो मे टूट कर दिल बिखरा है |

मैं देख रहा इधर उधर ,
कही कोई दिख जाए ,
तन्हाई के इस आलम मे ,
कोई अपना मिल जाए |

मैं हो कर भी साथ सभी के ,
ख़ुद को तनहा पाता हु ,
वक़्त के साथ बदलते देख अपनो को ,
मायूस हो जाता हु ।

मैं करता इजहार खुल के ,
अपनो से मोहब्बत का ,
पर कोई सुन नहीं पाता ,
अक्सर सोच जिसे मैं ख़ामोश हो जाता ।

काश इस शहर मे ,
हमें कोई अपना मिल जायें ,
चल रहाँ दौर जो ख़ामोशी का ,
शायद वो थम जाए ।

है भरोसा ,
ख़ामोशी तु एक रोज़ दूर जायेंगी ,
जो हो गया वास्ता हलचल से मेरा ,
तू मुझ जैसे ख़ुद को तनहा पायेंगी ।

उस रोज़ ख़ामोशी से ख़ामोश हो ,
तू ख़ूब आँसू बहायेंगीं ,
ख़ामोशी भी ख़ामोश हो कर ,
कहीं गुम हो जायेंगी ।

Sunday, June 5, 2016

दर्द

चारो तरफ शोर है ,
मेरी आवाज़ कमजोर है , 
कास कोई सुन पाता ,
मेरी आवाज़ को उन तक पहुंचाता . 

मैं लड़ रही हु मुस्कुरा के ,
पर गम छिपा नहीं पाती , 
ख़ामोशी का क्या है ,
इस शोर मे वो भी अक्सर छिप जाती . 

हर रोज़ चल पड़ती हु , 
ए दर्द तुझे छिपाने ,
बस होती है यही कोशिश ,
तू है साथ मेरे , ये कोई ना जाने .

पर क्या खूब खेल खेलती है ज़िन्दगी भी ,
क्या हम किसी को बताये ,
दर्द थे कम नहीं ज़िन्दगी मे ,
दो चार और ले आये .

है भरोसा आज भी ,
ये शोर एक रोज़ थम जाएगा ,
ऐ गम 
ज़िंदगी ने जो दिया है तुझे साथ मेरे , 
एक रोज़ वो भी छूट जाएगा .

ऐ दर्द फ़िक्र मत कर ,
तुझे बिता कल बनाउंगी ,
होगी फिर एक सबुह ,
तनहा अकेला छोड़ तुझे ,
अपनी ख़ुशी संग कही दूर चली जाउंगी .

अलविदा दर्द , 
लौट कर नहीं आउंगी ...

Tuesday, May 31, 2016

हाँ ... वो जायेगी

पहली दफा देख जिसे , 
दिल अपना कह बैठा था ,
जा रही थी दूर वो भी , 
जब ख़ुदा हमसे रूठ बैठा था . 

जिसकी मुस्कान हमे हसाती थी ,
आँखे जो भर आये उसकी ,
मेरी जान निकल जाती थी , 
आज बहुत रोई ,
पूरी रात नहीं सोई .

कल तक हाथो मे हाथ डाले ,
हम यु ही चला करते थे , 
खींच के ले आते थे पास ,
जो कभी वो दूर जाया करते थे . 

आज एक दफा फिर ,
वो लौट कर आई थी ,
साथ अपने अंगूठी लाई थी ,
देख जिसे मैं थोड़ा घबराया ,
पर कुछ कह नहीं पाया .

वो झट से मेरे करीब आई ,
आँखे थी उसकी भर आई  ,
देखते ही नम आँखों को उसके ,
हां वो जायेगी .. 
ये बात समझ आई .

चल पड़े एक दफा फिर तलाश मे उसके ,
शायद कही नजर आ जाये ,
मोहब्बत थी नहीं इतनी भी कमजोर हमारी ,
की वो नजर ना आये .

दिल को था पता ...  हां वो जायेगी ,
पर समझा नहीं पाया ,
अंजान रहो मे ढूंढने उसे चला आया .