Friday, September 13, 2019

किन्नर

आज की सुबह कुछ ख़ास थी ,
माँ के चेहरे पर ख़ुशी बेशुमार थी ,
पापा को बेटी प्यारी ,
वंश को बेटे की दरकार थी ।

माँ के जिस्म से अलग होने को ,
वक़्त मेरे जितने पास आ रहा था ,
ना जाने क्यू माँ से ,
ख़ुद को मैं दूर पा रहा था ।

ऐसा पहली दफ़ा होने को आया था ,
पैदा होने पर रोता सुन ,
कोई नहीं मुस्कुराया था ,
मेरी पहचान से मातम छाया था ।

माँग रहे थे दुआ सभी जब,
क्यू दुआ क़बूल नहीं हो पाई ,
ना आया बेटा , ना आई बेटी ,
किन्नर थी ... माँ के घर आई ।

क्यूँ नहीं कोख में मुझे मिटा दिया ,
क्यूँ मुझे ऐसा बना दिया ,
कोख से जन्मी थी जिस माँ के ,
उसने भी ठुकरा दिया ।

क्यूँ नहीं बन पायी पापा की लाड़ली ,
ना ही बन पाया घर का लाल ,
पैदा होते ही छोड़ दिया ,
क्यूँ मुझे मेरे हाल ।

माना की मैं अलग हु जिस्म से ,
पर दिल मेरा भी धड़कता हैं ,
माँ की ममता और परिवार की ख़ातिर ,
हर वक़्त तड़पता है ।

यू तो पहचान मुझे मेरी मिल गई ,
पर आज भी अपनो से अनजान रह गई ,
ना वो मुझे अपनाते , ना अपना बनाते ,
हाय हाय “ किन्नर “ ... कह ,
अक्सर आगे बढ़ जाते ।

वक़्त वो भी ज़रूर आयेगा ,
जा मेरी पहचान जान कर ,
दुनिया मुझे अपनायेगी ,
उस रोज़ माँ भी सीने से लगाएगी ।।

Saturday, August 24, 2019

शिकायत

मेरे आने से तेरे जाने तक ,
तेरे आने से मेरे जाने तक ,
कुछ जो हर पल साथ था ,
वो एक उलझा एहसास था ।

ना बदला वक़्त ना बदली ख़ुशी ,
आज भी रहती है अक्सर बेरुख़ी ,
बस यूँही हम मुस्कुराते जाते ,
एक तरफ़ा मोहब्बत उनसे कर आते ।

कभी वो मुस्कुराती ,
कभी बेवजह रूठ जाती ,
होश में तो मालूम नहीं ,
अक्सर नींद में ख़्वाब बन आती  ।

रंग होंठों का लाल ,
पलकों पर काजल कमाल ,
गाल पर वो छोटा तिल ,
बसता था जहाँ मेरा दिल ।

बस चंद लम्हों में अरमा,
टूटे काँच सा बिखर गया ,
जिस पल वो शिकायत मेरी ,
ख़ुद की मौजूदगी से कर गया ।


नहीं मालूम इश्क़ सच्चा ,
या झूठा होता हैं ,
ये “शिकायतों” वाला दौर ,
शुरू में कहाँ होता है ।

ख़ैर अच्छा हैं ,
“शिकायत “ फ़रिश्ता बन कर आता हैं ,
उलझे रिश्तों में क़ैद पंछी को ,
पिंजड़े से आज़ाद कर जाता हैं ।

शुक्र हैं शिकायत से कोई शिकायत नहीं ,
वरना होती मोहब्बत शायद दुबारा कभी ।।


Friday, August 23, 2019

ज़ख़्म

तेरे हाथों की मेहंदी ,
आँखों का नूर ,
करते थे मोहब्बत जिनसे ,
बिछड़े ना जाने क्यूँ हजूर् ।

पहली मुलाक़ात , पहली बात ,
बिछड़ते हम , मिलते जज़्बात ,
कुछ लम्हों का साथ ,
और वो मुलाक़ात ।

एक स्पर्श से हुआ शुरू सफ़र ,
ना जाने कैसे थम गया ,
खाते थे क़समें वादे जन्मो के ,
चंद लम्हों में था जो छिन गया ।

लगा मालूम जैसे ,
सब लूटा बैठे हम ,
दिल से धड़कन को ,
जुदा कर बैठे हम ।

तस्वीर जो आईना समझ निहारते थे ,
ख़ुद को जिसमें वो सँवारते थे ,
एक रोज़ अनजाने में टूट गया ,
मानो वो भी इस बेरुख़ी से रूठ गया ।

वक़्त के साथ मरहम बन यादें ,
एहसास के ज़ख़्म को भरने लगी ,
उन्हें उसके क़रीब ,
मुझे उनसे दूर करने लगी ।

लौट कर वक़्त फिर वही आया है ,
मालूम नहीं किसने खोया ,
किसने पाया है ।

पर अब ना वो बात है ,
ना ही वो जज़्बात है ,
ना ही वो “स्पर्श”
और ना ही अब वो साथ है ।

बस चंद यादें , ज़ख़्मों के निशा और उलझे अल्फ़ाज़ है ।।

Friday, August 16, 2019

आज़ादी

वाह रो लिया मैंने आज के मातम पर ,
कल की चीख़ पर बहरा गया था ,
थे वो भी इंसा लूटी थी अबरू जिनकी ,
बेघर सड़क पर आ पड़े थे ,
लाखों छोड़ घर अपना जब जा रहे थे ।

ख़ैर आप को क्या ,
आप आज उनकी चीखे सुन लीजिये ,
छिने नहीं घर , ना लूटी आबरू ,
आप उनके सिने पर ही रख सर रो लीजिये ।

याद है आज भी हर क़ुर्बानी ,
चाहे हो शहीद औरंगज़ेब या
कोई बुरहॉन वानी ,
देखा था मंज़र मिट्टी में मिलते दोनो को ,
एक पर जहाँ चंद जनाज़े तक आये थे ,
वही दूसरे के मौत पर “वो “ भीड़ लाये थे ।

शहीदों की बात ना करे तो बेहतर होगा ,
खोया हैं लाखों ने अपनो को ,
ख़ैर आप को उनकी चीख़ो से क्या होगा ।

मना लीजिये मातम आप आज पर ,
शायद सुकून मिल जाये ,
आज़ाद हुआ “ताज” भारत का ,
फिर ग़ुलाम ना हो जायें ।

ख़ैर आप को क्या आज़ाद भारत से ,
आप तो पिंजरे में क़ैद ,
मंदिर मस्जिद में उलझने वाले  ,
मालूम होते है ।।

इंसानियत ना सही तो कोई बात नहीं ,
मिट्टी का क़र्ज़ निभा जाओ ,
माँ भारती के वीरों के बलिदानो को ,
यू मिट्टी में ना मिलाओ ।

हुआ है भारत एक जहाँ अब ,
आओ वही भारत बनाते है ,
जहाँ है एक धर्म एक मजहब ,
सब भारतीय कहलाते है ।

और हाँ ...
नहीं जीता कोई आज़ाद देश हमने ,
अपनो को आज़ाद कराया है ,
भारत माँ के शीश पर ,
आज़ादी का तिलक लगाया है ।

जय हिंद जय भारत

Saturday, August 10, 2019

बेचारी मोहब्बत

ऐसी मोहब्बत का क्या फ़ायदा ,
जहाँ इश्क़ करने की इजाज़त ना हो ,
बेवजह हम उलझे हो उनके ख़्यालों में ,
जिन्हें हमारी चाहत ना हो ।

हर सुबह उठते ही ज़िक्र,
जिसका उसे आता है ,
फोने पर लगी तस्वीर उसकी ,
देख नम आँखो से वो मुस्कुराता है ।

मालूम नहीं क्यू इस क़दर ,
वो इतने दूर हो गये ,
मिलते नहीं ख़्वाबों मे भी अब तो ,
आख़िर क्यू इतने मजबूर हो गये ।

कल तक के क़समें वादे ,
नाजाने अब कौन निभायेगा ,
मालूम नहीं इस ज़िंदगी में ,
कौन बन कर ...
सच्ची वाली मोहब्बत आयेगा ।

दिल के धड़कनो पर ,
कहाँ किसी का ज़ोर है ,
तेरे जाने से कही जादे ,
उसके आने का शोर है ।

बस मोहब्बत अब ख़्यालों में ,
और नहीं कर पायेंगे ,
जो नहीं मिली मंज़िल गर ,
इन्ही रास्तों पर लौट आयेंगे ।

चाहत थी नहीं जिसे हमसे ,
उससे ही मोहब्बत कर जायेंगे ,
एक दफ़ा फिर और सही ,
हम दिल तोड़ने को लायेंगे ।

मोहब्बत .. उससे ही करते जायेंगे ।।

Tuesday, July 30, 2019

बदनाम “मोहब्बत”

वक़्त के साथ रिश्ते बदल जाते है ,
आज इनसे , कल उनसे दिल लगाते है ,
वो हँसाती , हम रुलाते है ,
बस अक्सर यूही दीवाने हो जाते है ।

ना होती चाहत सच्ची वाली ,
ना ही वो होता आख़िरी बार है ,
लग जाये जहाँ दिल हमारा ,
हो जाता वहीं सच्चा प्यार है ।

जिसको समझ सच्ची मोहब्बत ,
ज़िंदगी उसके नाम कर दी ,
वक़्त के बदलें के साथ ,
सच्ची मोहब्बत बदनाम कर दी ।

कल तक वाली ज़िंदगी से बेहतर ,
आज ज़िंदगी लगने लगी ,
कंधो पर सुकून से रखते थे सर जिसके ,
‘आप कौन’ अब वो कहने लगी ।

क्यूँकि हम जीते हैं हर दफ़ा ,
अपनी ही शर्तों पर ,
बस वक़्त के साथ ,
चाहत बदल जाती हैं ।

कभी वक़्त के साथ वो मुकरती ,
कभी हम चले जाते है ,
बेवजह हर दफ़ा ,
बदनाम मोहब्बत को कर जाते है ||

Sunday, July 28, 2019

फूँल

तोड़ कर लाते है जान किसी की ,
किसी के ख़ुशी के लिये ,
बना गुलदस्ता उसके लाशों का ,
देते है अक्सर हम ,
किसी रिश्ते की ज़िंदगी के लिये ।

रंग उसके फिर भी नहीं बेरंग होते ,
ना ही मायूसी नज़र आती है ,
बिछड़ कर ज़िंदगी से अपने ,
ख़ुशियाँ हमें दे जाती है ।

मौक़ा हो ज़िंदगी का या मौत का ,
हर दफ़ा वो छोड़ अपनो का साथ ,
हमसे मिलने चली आती है ,
बिना उसके मौजूदगी के ,
कुछ कमी रह जाती है ।

काँटो से घिर कर भी ,
नहीं कभी घबराती है ,
मुश्किलों में भी हँसते रहना ,
हमें वो सिखाती है ।

ख़ुशबू से जिसके शमा ,
हर वक़्त महकता हैं ,
जो छोड़ कर अपनी धड़कन ,
दूसरों के लिये धड़कता है ।


मुर्झा जाती है मोहब्बत पहले ,
फूँल तो वक़्त लगाते है ,
अंग्रेज़ी वाले फ़ूल बन ,
हम फिर उन्हें तोड़ने आ जाते है ।

मालूम नहीं कोई अपनी मौत पर,
इस क़दर कैसे मुस्कुरा लेता है ,
ख़ातिर औरों के मोहब्बत की ,
ख़ुद को गवा देता है ।

Sunday, July 21, 2019

ख़्वाबों वाली मोहब्बत

कही हवा का शोर ,
कही दिलो का ज़ोर ,
उल्फ़त में उलझी ज़िंदगी ,
फैली चारों ओर ।

हर दफ़ा वाली मोहब्बत से ,
थोड़ी अलग बात थी ,
ना उलझे थे एहसास , ना जज़्बात ,
ना वो मेरे पास थी ।

इस दफ़ा उसकी मौजूदगी ,
बेहद ख़ास थी ,
अजब सी अदा और दीवानगी ,
जिसके आस पास थी ।

सिलसिला बिना निगाहों के हलचल के ,
धड़कनो को बढ़ा रहा था ,
तेरे लौट जाने का दर्द ,
अब सता रहा था ।

पड़े ख़ामोश अब तक जज़्बात ,
कुछ कहने को आ रहे थे ,
कम थी क्या क़ातिलाना मासूमियत ,
जिससे वो कहर ढा रहे थे ।

बस जो चले गये वो ,
मेरे होश में आते ही ,
क्यू आ जाते है लौट कर ,
मेरे ख़्वाबों  में जाते ही ।।

Saturday, July 20, 2019

अधूरी दास्ताँ

डरने को किसने कहा ,
जो इतना ग़म दिखा रहे हो ,
मोहब्बत थी मुझे भी तुमसे ,
ये क्यू नहीं बता रहे हो ।

जितना जता रहे आज दर्द ए दिल ,
कल गर थोड़ा भी निभा लिया होता ,
ना होती ये दूरियाँ ,ना होता दर्द ,
हम आज भी मुस्कुरा रहे होते ,
और शायद उसकी वजह तुम होते ।

किन राहों पर कर रहे इंतज़ार ,
ज़रा हमें भी बताओ ,
क्यूँकि मैं आज भी .. गुज़रती हु उन राहों से ,
एक दफ़ा हमारी राहों पर आओ  ।

हाँ मैं आज भी खाई क़समें निभा रही हु ,
बेहद मुस्कुरा रही हु ,
बस बदला है , तो वो तेरी अधूरी मौजदगी ,
जिसे मैं छिपा रही हु ।

बड़ा ख़ुशनसीब होता दिल मेरा ,
गर जो तू मुझे समझ पाया होता ,
मंज़िल भी मिल जाती मोहब्बत की ,
गर तूने साथ निभाया होता ।

क्यूँकि मेरी पहली , मेरी आख़िरी ,
मोहब्बत तुम हो ,
कैसे तुम्हें बताऊँ ,
मेरी धड़कनो को कैसे तुम्हें सुनाऊँ ।

इतना वक़्त क्यूँ लगा रहे ,
क्यूँ नहीं उन रास्तों पर लौट आ रहे ,
क्यूँ इस दिल को तड़पा रहे ,
क्यूँ नहीं एक दूजे के हो जा रहे ।

तेरे इंतज़ार में और कितना इंतज़ार होगा ,
ना जाने कब फिर तुझसे प्यार होगा ,
हो वक़्त गर , उन राहों पर लौट आना,
एक दफ़ा फिर मेरे हो जाना ।।

Thursday, July 18, 2019

प्यार बाटने चला

बस डरता हु ..
आज भी दिल लगाने से ,
एक दफ़ा फिरसे टूट जाने से ,
मोहब्बत में फ़ना हो कर ,
रूठ जाने से ।।

तेरा इंतज़ार बड़ी शिद्दत से कर रहा ,
मैं आज भी उन रहो पर ,
जहाँ साथ चलने को तू आई थी ,
उम्र भर साथ रहने की कसमें खाई थी ।

शायद तू आज भी वो क़समें निभा रही होगी ,
होगी जहाँ भी मुस्कुरा रही होगी ,
बस बदला होगा कुछ तो वो मेरा साथ होगा ,
मेरे बदले थामा तूने किसी और का हाथ होगा ।

बड़ा ख़ुशनसीब होगा दिल वो ,
जिसपर तू क़ुर्बान हो गई ,
मंज़िल भी मिल गई होगी मुक़्क़दर की ,
शायद  मेरी ज़िंदगी तुझसे अनजान हो गई ।

क्यूँकि मानता था पहली मोहब्बत को ,
आख़िरी मैं आज तक ,
मेरी साँसे नीलाम हो गई ,
जिस पल वो अनजान हो गई ।

उन राहों से गुज़रना जो कभी ,
मेरी रूह का एहसास पाओगी ,
सच्ची मोहब्बत बँटती नहीं ,
शायद तब समझ पाओगी ।

ख़ैर , गर भूल गये होंगे वो रास्ते ,
कैसे हमें जान पायेंगे ,
गर ना होगी उनसे उसको सच्ची मोहब्बत ,
ख़ुद बख़ुद एक रोज़ समझ जायेंगे ।।

Tuesday, July 16, 2019

पापा


होता वक़्त कम पास जिसके ,
मुझे सीने से लगाने को ,
आती नहीं अदाईगी जिसे ,
मोहब्बत जताने को ।

करते नहीं बया अपनी ख़ुशी ,
ना दर्द दिखाते है ,
देख ले सुकून से जो सपने हम ,
चैन से हमें सुलाते है ।

होती है बातें थोड़ी कम ,
पर बहुत कुछ सिखाते है ,
चंद आँखो की हरकत और
इशारों से हम समझ जाते है ।

मालूम नहीं होता उनके भूख का ,
पर हमें भर पेट खिलाते ,
कभी प्यार कभी फटकार से ,
अपना एहसास छोड़ जाते ।

बस इंतज़ार होता उन्हें एक लम्हे का ,
कब मेरे नाम से वो जाने जाये ,
ज़िंदगी भर के इस उम्मीद को ,
उतार सिने से मुझे गले लगाये ।

पापा  अभिमान है ,
पापा सम्मान है ,
पापा  गौरव और ,
पापा  ही ज्ञान है ।

Friday, July 12, 2019

सहमी आँखे


वो सहमी सी आँखे ,
होंठों पे नज़र का टिका ,
बिखरी ज़ुल्फ़ें ,
निगाहों को मेरा था जिसने रोका ।

अजब सी बेताबी ,
और बढ़ती बेचैनी ,
कैसे निगाहो को उलझा रही थी ,
दिल के धड़कनो को बड़ा रही थी ।

हर दफ़ा जब भी देखता उसको ,
नज़रें चुरा लेती ,
थमते धड़कनो के एहसास को ,
फिरसे बढ़ा देती ।

हर लम्हा अब ,
दिन सा लगने लगा ,
दरमियाँ जो थी हलचल हमारे ,
जब वो थमने लगा ।

रुकने को था सफ़रनामा ,
निगाहों के इस शोर का ,
बस तभी हुआ कुछ ऐसा ,
जिस पर नहीं उनका कोई ज़ोर था ।

वो मुस्कुराई ,थोड़ा शर्मआई ,
पहली दफ़ा जब कुछ कहने को आई ,
लगा अब दरमियाँ इश्क़ होने को हैं ,
जिसमें दिल खोने को है।

पर वक़्त को कुछ और था मंज़ूर ,
एक पल में जाने लगा जब वो दूर ,
मैं रोक नहीं पाया ,
दरमियाँ हो रही हलचल,
रुकने को था तब आया ।

चलो इस मोहब्बत को ख़्वाब समझ ,
हम भूल जाते हैं ,
एक दफ़ा फिर इन निगाहों से ,
इश्क़ करने जाते है ।।

Wednesday, June 26, 2019

तितली

हल्की हल्की बारिश की बूँद ,
और होता सवेरा ,
बादलों से घिरा असमां ,
ढूँढ रही थी वो अपना बसेरा ।

रंग बिरंगे रंगो से सजी ,
सूरज की किरणो से चमक रही थी ,
पत्तों से छलक कर बूँद बारिश की ,
उस पर जब पड़ रही थी ।

मदमस्त वो कभी इस डाली ,
कभी उस पेड़ पर छिप जा रही थी ,
कभी उड़ खुले आसमा मे ,
शमा को ख़ूबसूरत बना रही थी ।

सर्द होते मौसम में ,
वो एक गर्म सा एहसास थी ,
अंधेरे में जगमगाता दीया ,
ऐसा वो विश्वास थी ।

एक ज़ोर का तूफ़ान आया ,
देख जिसे मैं घबराया ,
पर वो ना रुकने को तैयार थी ,
उड़ने को फिर से बेक़रार थी ।

मन भी तितली सा लगता है ,
लिये रंग हज़ारों चमकता है ,
कभी इस डाल कभी उस पेड़ ,
बस उड़ता चला जाता है ।

क्यू ना दिल को भी ,
तितली बनाये ,
रंगबिरंगे उम्मीदों के संग ,
पंख लगा कर जो उड़ जाये ।।