Sunday, March 1, 2020

बेक़रार

अब .. जाना तो था मुझे  ,
कुछ यादें छोड़ कर ,
चंद लम्हों की वो ,
मुलाक़ातें छोड़ कर ।

जुगनुओं की ख़ातिर ,
सूरज ढलने को खड़ा था ,
सर्द होती हवाओं ने ,
जब उसकी ज़ुल्फ़ों को छुआ था ।

हरकतों से अंजान इशारों के ,
मिलते बिछड़ते निगाहो के ,
अब कुछ बात होने ही लगी थी ,
पर क्या करते जब जाने की हड़बड़ी थी ।

घटते वक़्त के साथ ,
हम कुछ क़रीब आ रहे थे ,
अजनबी एहसास छिपा कर ,
कुछ बता रहे थे ।

कुछ तो था दरमियाँ हमारे ,
जीना था बस इन यादों के सहारे ,
बिछड़ने को अब हम तैयार थे ,
समझ बैठे थे .. वक़्त के इशारे को ..इजहार थे ।

ख़त्म हो गया था सिलसिला हमारा ,
पर था नहीं दिल को जो गवारा ,
कुछ तो बाक़ी रह गया था ,
शायद दिल, निगाहों से कुछ कह गया था ।

पलट कर बस आख़िरी बार ,
देखने को उसे जैसे ही हम मुड़े थे ,
मानो उनकी भी निगाहे मिलने को ,
बेक़रार पड़े थे ।

ख़त्म नहीं ये शुरुआत है ,
कुछ दरमियाँ दिलों के ख़ास है ,
दूर हो कर भी ,
जो मेरे पास है ।।

Sunday, February 2, 2020

कच्चे मकान

होते थे घर पक्के,
कच्चे मकान हुआ करते थे ,
उलझते थे इंसान ,
फिर भी साथ रहा करते थे ।

वक़्त था एक वो भी ,
जब घर में होते थे आँगन ,
खेला जहाँ सब करते थे ,
अक्सर लोग जहा लड़ते थे ।

ना कुछ तेरा , ना मेरा ,
सब सबका हुआ करता था ,
एक वृक्ष की छाओ में ,
पूरा घर रहा करता था ।

कपड़े बाँटे तब भी थे जाते ,
चाचा के कपड़े भैया ,
भैया के कपड़े हम ,
पहन बेहद ख़ुश हो जाते ।

नमक रोटी का स्वाद ,
और उस चूल्हे की ख़ुशबू ,
ना जाने कहाँ खो गई ,
वो बंद मकानों में ... शायद हो गई ।

ना थे दरवाज़े , ना थी दूरियाँ ,
सब था तेरा , सब था मेरा ,
पर वक़्त कैसे बदल गया ,
जबसे मकान तेरा और मेरा हो गया ।

चंद लोगों के साथ घर कैसे हम बनायेंगे ,
जाते वक़्त दुनिया से वो चार कंधे कैसे लायेंगे ,
क्यूँ नहीं तोड़कर मकान आओ घर बनाते है ,
ख़ातिर ख़ुशियों के अपनो के ,
लोगों से घर सजाते है !!

आओ तोड़ कर मकान ,
घर बनाते है ।

Thursday, January 23, 2020

सर्द सड़क

उन सर्दियों की वो रात ,
वादियों में दफ़्न ज़िंदा लाश  ,
सर्द होती मेरी साँसे ,
और बचे चंद अल्फ़ाज़ ।

फिर वो सर्द वाली रात,
लौट कर आई है  ,
मुझ जैसे लाखों का ,
हुजूम वो लाई है ।

फ़र्क़ बस इतना है ..!

सड़क पर आज बैठी हो तुम ,
उस रात मैं लेटी हुई थी ,
ढका है कम्बल में ख़ुद को तुमने ,
मैं फटे कपड़ों से जिस्म ढक रही थी ।

तुम लाई हो साथ बच्चों को ,
मैं पेट में लिए उसे मर रही थी ,
तुम आवाज़ कर रही बुलंद अपनी ,
मैं ख़ामोश पड़ रही थी ।

तुम लड़ रही हो घर के ख़ातिर ,
किसी ग़ैर का बचाने को ,
छिन लिया था किसी अपने ने ,
उस रात मेरे आशियाने को ।

तुम भी हो ज़िंदा ,
और तुम्हारे अपने भी ,
मर रहे थे हम सब ,
और हमारे सपने भी ।

नहीं था कोई सड़कों पर,
ख़ातिर हमारे आया ,
लाशों को समझ बेवा ,
नोच उन गिद्धों ने था खाया ।

बैठी हो तुम भी सड़क पर ,
रोक कर अपनो का रास्ता ,
थी पड़ी लाशें हमारी भी सड़कों पर ,
अपनो का था नहीं जिनसे वास्ता ।

मैं लौट कर जब भी आऊँगी ,
आशियाना फिर से सजाऊँगी ,
सड़कों को कर आज़ाद ,
सबको रास्ता दिखाऊँगी ।

मैं लौट कर आऊँगी ....!!

Saturday, January 18, 2020

मोमबत्ती

आँखों में आँसू उसके ,
चहरे पर ख़ामोशी ,
हिम्मत से लड़ी थी “माँ” ,
हार जंग इंसाफ़ की आज घर लौटी ।

लाखों की भीड़ लिये ,
हम सड़कों पर आये थे ,
बलात्कारियों को फाँसी ,
कुछ ऐसे नारे लगाये थे ।

बदलते वक़्त के साथ ,
हम सब कुछ भूल गये ,
माँ को छोड़ अकेले ,
अपनी दुनिया में खो गये ।

मिला जो इंसाफ़ उस बेटी को ,
एक दरिंदा हुआ आज़ाद था ,
कुछ चंद पैसे और मशीन ,
लेकर “मालिक” से बना उस्ताद था ।

इंसाफ़ के इस लड़ाई मे ,
माँ उतरी है दलदल वाली खाई में ,
हर कोशिश में हार रही ,
फिर भी लड़ने को तैयार रही ।

आज जिनको सड़कों से ,
सत्ता मे लेकर आये थे ,
मालूम नहीं था चंद वोटों के लिये ,
वो इंसाफ़ रोकने आये थे ।

क्यूँकि “बेटी” हम सब की है ,
आओ उस माँ के पास जाते है ,
सड़कों पर क़ब्ज़े के इस दौर में ,
सत्ता की भूख मिटाते है ।


आओ सभी मिल कर फिर से,
सड़कों पर आते है ,
बुलंद कर आवाज़ अपनी ,
“मालिक” को जगाते है ।

माँ जिसको छोड़ दिया लाखों ने ,
आओ हम फिर उसका साथ निभाते है ,
बुझ गई मोमबत्तियों को छोड़ ,
उम्मीद और भरोसे का दिया जलाते है ।

आओ चलो सड़कों पर उतर कर ,
माँ का साथ निभाते है !!

Saturday, January 11, 2020

मालूम नहीं

तुझसे मोहब्बत हुई कब ,
कहाँ और कैसे ,
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

तेरी पहली मुलाक़ात ,
और उसमें हुई हर बात ,
और उस वक़्त के हालत ,
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

एक रोज़ फिर मिला था तुझसे ,
पर तुम वक़्त निकाल नहीं पाई ,
थी शायद कहीं जाने को आई ,
लेकिन कहाँ ?
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

कब चंद लम्हों की बातों को ,
रात छोटे लगने लगे ,
अजनबी से पहचाने लगने लगे ,
आख़िर क्यूँ ?
यक़ीन मानो ... मालूम नहीं ।

हर रात चाँद से पहले सोने वाला ,
तुम्हें बिना देखे अब सोता नहीं ,
पर ऐसा क्यू ??
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

जान कर भी जा रही जान ,
तेरी आँखों में डूब कर ,
तैरना मंज़ूर नहीं होता ,
क़सम से ?
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

ज़िंदगी भर ज़िंदगी के लिये ,
हम सब लूटा आये थे ,
ख़त्म उस सिलसिले को ,
आज ख़ुद कर आये थे ,
लेकिन क्यूँ ?
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।।

शायद


दिल के लगने से ,
दिल के बिछड़ने तक ,
मुझसे मिलने और
उनसे जुलने तक ।

मेरी पहली मुलाक़ात ,
से आज फिर वो मिल रहे होंगे ,
मेरे जाने पर ,
मोम से जज़्बात पिघल रहे होंगे ।

होगा हाथ फिर थामा मेरा ,
बड़ी शिद्दत से आज उन्होंने ,
कसमें भी ख़ूब खा रहे होंगे ,
ख़्वाब फिर सज़ा रहे होंगे ।

ख़ुशबू से मेरे महक रहा होगा शमा ,
और अल्फ़ाज़ो से वो सज़ा रहे होंगे ,
पिघल कर बहने को आ रहे जज़्बात ,
आँखों में दिखा रहे होंगे ।

क्यूँकि जाना ज़रूरी है अब ,
वो रुकने को मिन्नते किये जा रहे होंगे ,
आख़िरी नो हो मुलाक़ात ये ,
फ़ैसला कुछ ऐसा सुना रहे होंगे ।

मैं तो आज भी हु वही वैसे खड़ी ,
बस वो कोई और मुझ सा ढूँढ लाये होंगे ,
भूल कर तस्वीर मेरी ,
पहली हो मोहब्बत मेरी .. पहेली बुझाये होंगे ।

शायद मुझसे मिलने भी पहली दफ़ा ,
किसी मैं को छोड़ आये होंगे ,
मेरे संग बीते हर लम्हे को ,
कही और जी कर आये होंगे ।

शायद .. आज फिर मुझसे मिलने ,
वो कहीं आये होंगे !!

Monday, January 6, 2020

वो आँखे

तेरी आँखो में आज देखा था पहली दफ़ा .. शायद ,
कुछ मुस्कुरा सी रही थी ,
जज़्बात छिपा सी रही थी ,
ख़्वाब सज़ा सी रही थी ,
तेरी आँखो में देखा था पहली दफ़ा आज .. शायद !!

यू तो देखते थे कई दफ़ा तुमको ,
तुम्हारे भेजे ख़त में ,
पर कभी ठीक से निहार नहीं पाये ,
शायद आँखो में तुझे उतार नहीं पाये ।

गुमनामी के रिश्तों में उलझें ,
हुए हमारे तार है ,
अजनबी आज भी हो तुम मेरे लिये ,
बातें यू हो जाती दो चार है ।

कभी देखा ना ग़ौर से इतना ,
या शायद कुछ नया सा एहसास है ,
तेरी आँखो में बसी उसकी मोहब्बत ,
या काजल का रंग कुछ ख़ास है ।

आँखो से बातें करने उसके ,
अब हम नहीं जाते ,
दिल में बसी तस्वीर उसकी ,
देखते ही अजनबी बन रुक जाते ।

देखा था ग़ौर से तेरी आँखो में आज ...
शायद ,
ख़ूबसूरत है वो तेरी मोहब्बत सी !!!

Sunday, December 29, 2019

ग़ायब

ना जाने क्यूँ ग़ायब है ख़ुशियाँ ,
ना जाने क्यूँ तेरा इंतज़ार है ,
ना जाने क्यूँ उलझी हु तुझमें ,
ना जाने ये कैसा प्यार है ।

हर सुबह खुलते ही आँखे ,
देखने को जिसे ख़्वाब संजोये थी ,
टूट गये अरमा उस पल ही ,
सामने जब ख़ामोशी मेरे खड़ी थी ।

दिन जो कट जाते थे जल्दी ,
और रात ख़्वाब बन उड़ जाता था ,
हर पल उसकी मौजूदगी से ,
ख़ुशनुमा हर लम्हा हो जाता था ।

तेरी ग़ैर मौजूदगी अब सताती है ,
ख़ुशियाँ बेवजह अधूरी रह जाती है ,
हाले दिल मैं किसे अपना सुनाऊँ ,
दिल में तेरे तस्वीर को कैसे छिपाऊँ ।


उलझी हु माँझे सी बन कर तुझमें ,
बन पतंग मुझे उड़ा ले जा ,
मेरी ख़ुशियाँ मुझे लौटा कर ,
ग़लतियों की सज़ा दे जा ।

ग़ायब हो तुम ,
ग़ायब तुम्हारा एहसास है ,
फिर भी तेरे लौट आने का ,
ज़िंदा मुझमे आस है ।

ग़ायब हो तुम ,
ग़ायब तुम्हारा एहसास है !!

Thursday, December 26, 2019

बात उस रात की ..!!

उस रात अंधेरे मंज़र में ,
आसमा भी मायूस पड़ा था ,
ना थी रोशनी चाँद की ,
ना ही तारों का जमावड़ा ।

सुनसान से पड़े जज़्बात ,
उलझते मेरे अल्फ़ाज़ ,
तभी ख़्याल तेरा आया ,
था साथ जो हज़ारों सवाल लाया ।

भूल कर अपनी वो मोहब्बत ,
जिसे आख़िरी मान बैठे थे ,
तुझसे मिलने की हड़बड़ी में ,
ख़ुद से अनजान हो रहे थे ।

निकल कर अपने पते से ,
कुछ दूर ही चला था ,
मानो तुझसे जा ,
मैं उस पल ही मिला था ।

यू तो छाया घनघोर अंधेरा ,
पत्तों ने डालियों से मानो था मुँह फेरा ,
हवायें भी भूल गयीं हो रास्ता ,
या शायद रखना नहीं चाहता था कोई ,
उस मोहब्बत की तरह .. मुझसे वास्ता ।

बस अब टूट कर बिखरने ही वाला था ,
ना जाने कहाँ से तुम आ गई ,
तन्हाई से भी हो सकती है मोहब्बत ,
ये बात तब जा कर समझ आ गई ।

था नहीं मालूम ,
ये रात फिर लौट कर आयेगी ,
तन्हाई को समेटे ख़ुद में ,
मुझसे मोहब्बत कर जायेगी ..
ये रात फिर लौट कर आयेगी ॥

Sunday, December 22, 2019

मैं इज़हार करता हु .. वतन से प्यार करता हु !!

तुम गोलियों से मार रहे ,
धमाके लगा जश्ने बाज़ार रहे ,
हर तरफ़ मातम का मंज़र है ,
शोर कहाँ हो रह कम है ।

कहीं ख़ामोशी को कमज़ोरी समझ ,
तुम चिल्ला रहे ,
कहीं ग़ैरों की ख़ातिर ,
अपनो का ख़ून बहा रहे ।

मातम पर देखा है मुस्कुराते तुमको ,
बेवजह दे वास्ता “किसी” का ,
मासूमों का ख़ून बहाते हो ,
मजहबी करवाई उसे बतलाते हो ।

मंज़ूर नहीं सरकार अगर तो ,
वोट के वक़्त कहाँ छिप जाते हो ,
देते हो दुहाई संविधान की ,
जब भी उलझ जाते हो ।

जन के गड़ना से भी दिक्कत ,
जन गण से घबराते हो ,
देश के गीत को ,
जब मज़हबी रंग दे जाते हो ।

चंद घंटो की करवाई कह कर ,
सच तुम संसद का झुठलाते हो ,
गवाह रहाँ हैं मुल्क ये ,
जब मिटाने इस संसद को आते हो ।

क्यू दिक्कत नहीं होती सबको ,
आप चिल्लाते है ,
देश से आगे अक्सर ,
मजहब को रखते देखे जाते हो ।

कलाम को भगवान मान ये देश पूजता है ,
औरंगज़ेब की क़ुर्बानी सोच मन कुचेटता है ,
सहमत का क़र्ज़दार है ,
क्यूँ हो नहीं सकता तू भी इतना वफ़ादार है ।

देश सबका है ,
एक दफ़ा मज़हबी चादर उठा के देखो ,
एक दफ़ा इसे अपना बना के देखो ,
एक दफ़ा सिने से लगा के देखो ।

सुनने को ये मुल्क हम सबसे ,
बेताब है ... चलिये
मैं इज़हार करता हु .. वतन से प्यार करता हु !! ...

.... और आप !!

स्त्री

सेम डिग्री सेम पोज़िशन ,
डिस्क्रिमिनेशन का “अजेंडा” वाला फ़ेज़ है ,
कह देते आकर दो चार लाइन ,
बेवजह हो रहे वो चेप है ।

शादी बच्चे कर लूँगी मैं ,
किसकी क्या एज है ,
मालूम है मुझे सब ,
आज़ाद हु नहीं कोई “केज” है ।

मेरी मौजूदगी मौलूम ना हो ,
ऐसा मुमकिन कहाँ हो पाता है ,
कभी माँ , कभी बेटी , कभी बहू ,
वो कई रूप में मुझे देख पाता है ।

उसकी फ़िक्र जब भी अपनो को सताती है ,
बन जवाब सवालों का वो हँसाती है ,
मेरे अकेले होने पर भी सब साथ होते है ,
मेरी नींद से ही वो सोते है ।

मेरी पहचान दुनिया ख़ूब जानती है ,
सवालों का जवाब मुझे मानती है ,
हैं अपने इतने मेरे ,
दुनिया को क्या दिखाना ,
सिंगल हु या कमिटेड ,
जान कर क्या करेगा ज़माना ।

छू ले मुझे कोई ग़लती से ,
ये ग़लतियाँ नहीं होती ,
बेवजह ही उलझ कर जज़्बातों में ,
ग़ैरों को अपना नहीं लेती ।

पढ़ लिख कर आज़ाद बनी हु ,
भरोसा अपनो का लिये खड़ी हु ,
शादी से भागूँगी नहीं ,
प्यार के इस बंधन में बँधने को ,
तैयार खड़ी हु ।

जो भी हो डिग्री मेरी ,
हर ज़िम्मेदारी निभाऊँगी ,
कम्पैरिजन कर के अपना अपनो से ,
रिश्ते नहीं उलझाऊँगी ।

वो मिल कर आये किसी से ,
या मैं किसी से मिलने जाऊँ ,
फ़र्क़ नहीं पड़ता है ,
एक दूसरे को समझ कर ही ,
परिवार चलता है ।

मेरे कपड़ों की शिकायत होती नहीं ,
ना ही कोई नज़रें मेरे जिस्म पर घुमाता है ,
बेवजह उलझती नहीं मैं किसी से ,
ना एडवाईज़री कोई मुझ तक लाता है ।

मेरे घर से होगी शुरुआत ,
सिखेगा बच्चा मेरा ,
वो घूर कर निगाहे नहीं घुमायेगा ,
सम्मान से नज़रें मिलायेगा ।

आओ बन कर आदर्श घरों का ,
परिवार अपना बचाते हैं ,
देवी मानते अपनो को ,
दिल से अपनाते है ।

आओ “स्त्री” का फ़र्ज़ निभाते हैं ,
आओ ये दुनिया बचाते हैं ,
ग़ैरों को अपना बनाते है ,
आओ कुछ नया कर जाते है ।

मैं बेटी बन पापा की ताक़त हो जाती हु  ,
पत्नी बन पति की ख़ुशियाँ हो जाती हु ,
बहू बन घर सजाती हु ,
माँ बन सबकी इज़्ज़त करने की ,
परवरिश दे जाती हु ।

और हाँ रही बात ,
मेरे आज़ाद होने की ,
मैंने चुना वो जहाँ है ,
क़ैद होती नहीं बेटियाँ वहाँ है ।।

Saturday, December 14, 2019

ख़ैर

क्यूँकि मोहब्बत होना ज़रूरी है ,
टूटते दिल की मजबूरी है ,
नहीं तो पत्थरों से चिंगारी जलती है ,
लगती नहीं आग सूरत बदलती है ।

फ़ासले जो फ़ैसलों से बढ़ने लगे थे ,
जान कर भी वो अजनबी कहने लगे थे ,
मान कर सच उनके जज़्बात को ,
मोहब्बत से हम रूठने लगे थे ।

सिलसिला शुरू हुआ था जो कल ,
कल क्यूँ थमने को आया था ,
आज़ाद आवारा दिल मेरा ,
पिंजड़े में क़ैद हो आया था ।

ख़ैर हर दफ़ा जीत ले दिल कोई ,
ये ज़रूरी नहीं ,
लुटेरे बहुत है इस जहाँ में ,
कोई किसी से कम नहीं ।

क्यूँ तेरी मौजूदगी अब रुलाती है ,
ख़ामोशी में भी वो चिल्लाती है ,
ना रहना तेरा बेहतर होगा ,
इस एहसास से दिल बेख़बर होगा ।

क्यूँकि ख़ैर नहीं ...ख़ैर क्या कर पायेंगे ,
उलझ कर जज़्बातों के खेल में ,
कभी राजा , कभी वज़ीर ,
तो कभी सिपाही बन जायेंगे ।।

Monday, November 18, 2019

बेफ़िक्र

क्यूँकि चलना ज़रूरी होता है ,
मंज़िल की तलाश में ,
आसमान से भी होता है ऊँचा ,
ख़्वाब उड़ता आकाश में ।

कभी ऊझलते तार ज़िंदगी के ,
कभी सुलझ जाते है ,
अजनबी कई दफ़ा अपने ,
अपने अजनबी हो जाते है ।

डर लगता है खोने का ,
पाने से घबराते ,
पास आकर भी मंज़िल के ,
दूर हम हो जाते ।

कभी ग़म के बादल ,
कभी ख़ुशियों की होती बारिश ,
बेवजह हो कर भी साथ ,
ज़िंदगी बन जाती लावारिस ।

क्यूँकि फ़िक्र जो होती साथ है ,
डर से गुज़रती हर रात है ,
क्यूँ नहीं बेफ़िक्र हो जाते ,
छोड़ सब हर पल मुस्कुराते ।

क्या ज़रूरी है वजह का ,
बेवजह ज़िंदगी में ,
क्यूँ जी नहीं लेते ज़िंदगी ,
अपनी ख़ुशी में ।

बेफ़िक्र हो कर आज हम ,
ख़ुशियाँ मनाते है ,
बीत गये लम्हों का मालूम नहीं ,
आओ इन लम्हों में ज़िंदगी जी जाते है ।