Wednesday, April 8, 2020

फुलझड़ी

रात के अंधेरे मे ,
जब चाँद बादलों में छिपने लगा ,
थमते शोर के साथ ,
मौसम भी सर्द पड़ने लगा ।

आग लगी कही दूर नज़र आई ,
रोशनी जिसकी जलती बुझती ,
आँखो से अंधेरे के छटने की ,
उम्मीद थी संग ले आई  ।

कुछ जुगनुओं के चमकने से ,
जो अब तक रात सुनहरी लगती थी ,
ख़्वाबों में अक्सर आकर ,
हुस्ने मलिका हमसे मिला करती थी ।

इस जलते बुझते रोशनी के पीछे ,
कोई ख़ूबसूरत सी परी थी ,
हाथों मे लिये फुलझड़ी ,
वो मेरे सामने ख़ामोश खड़ी थी ।

चमकते सूरत ने उसके ,
जज़्बातों पर क़ब्ज़ा सा कर लिया ,
जलते बुझते फुलझड़ी ने उस अंधेरे में ,
रात को रोशनी से भर दिया ।

श्वेत चादर में लिपटी हो जो रोशनी के ,
होंठों पर लिए हल्की सी मुस्कान ,
आँखो में चमकता नूर हो जिसके ,
फुलझड़ी सी है वो दिल-ए- नादान ।

मानो ख़्वाब होने को था पुरा ,
रह ना जाये कोई एहसास अधूरा ,
ख़ातिर उसके हम एक और दफ़ा ,
हड़बड़ी कर बैठे थे ।

बुझ जाती है फुलझड़ी ,
कुछ देर चमकने के बाद ,
ना जाने कैसे हम ,
ये भुल बैठे थे ।

Monday, April 6, 2020

इंसानो का मोहल्ला

मेरे बहुत से दोस्त कहते है की क़ौमी एकता नहीं कट्टर एकता की बाते सच्ची लगती है , कभी शाहीन बाग़ , बाटला हाउस , कैराना या कश्मीर जैसे जगहो पर गये हो कभी जा कर देखो डर लगता है , और यक़ीनन अब जेहादियों से डर लगता है ।

हाँ मौलाना आज़ाद , ज़ाकिर हुसैन , बहादुर शाह ज़फ़र और अश्फ़ाकउल्ला जैसो वीरों ने हमे आज़ादी दिलाई और हम उनसे नहीं डरे लेकिन जेहादीयो से डर लगता है ।

सब लोग डाक्टर , इंजीनीअर और काफ़ी कामयाब बन गये और कहते है वो अब्दुल कलाम जैसा सच्चा और अच्छा बनना चाहते है और देश के लिये और अच्छा करना चाहते है और कहते है हममें से किसी को ये क़बूलने मे डर नहीं लगता है लेकिन जिहादियों से डर लगता है ।

सब खेलने के भी शौक़ीन है और सैयद मोदी , अजरुद्दीन , आदिल खान और इरफ़ान पाठन के जैसा खेलते है और उनके नाम की जर्सी पहनते है लेकिन जिहादियों से डर लगता है ।

आज भी कला और फ़िल्म जगत में सलमान की फ़िल्म हो या ज़ाकिर हुसैन का शो हाउसफ़ुल ही रहता है और रहमान के गाने पे आज भी वो ख़ूब झूमते है और कहते है माँ तुझे सलाम लेकिन माँ के इन्हीं बच्चों को अपनी सलामती के ख़ातिर जेहादियों से डर लगता है ।

वो जब भी डरते है तो उन्हें मुम्बई ब्लास्ट , दंगे और 26/11 याद आता है यहाँ तक काबुल में भी अपनो को खोने का दर्द मिल जाता है फिर भी इंसानो को दिल से लगाते है लेकिन जेहादियों से डर लगता है ।

बिशमिल्ला खान की शहनाई बजती है हर जश्न में इन लोगों के यहाँ और मातम मे अक्सर होता है एक का हाथ , इसी लिये जेहादियों से डर लगता है ।

कईयो के ससुराल में मनाई जाती है ईद और घर पर मनाते होली , दिल खोल कर मिलते इंसानो से पर दिल तेज़ धड़कता है क्यूँकि जेहादियों से डर लगता है ।

हाँ रोये थे ये सब शहीद अब्दुल हामिद के शहादत पर , शहीद औरंगज़ेब पर भी आँसु बहाये थे ख़ून से लिखने जब किसी अपने का इतिहास अफ़ज़ल , बुरहान जैसे आये थे हाँ लगता है डर ऐसे जेहादियों से ।

जान कर हर इंसान को इंसान , वो करते है सबसे प्यार , ना कोई धर्म ना जाती कहते सबको यार , हाँ लगता है डर खोने का किसी अपने को , जेहादियों के ख़्वाब पुरे होने से ।

है बहुत मोहल्ले आज भी जहाँ जाने से वो डरते है कहते है रहते नहीं इंसान वहाँ , जेहादी जो ख़ुद को कहते है , इंसान और इंसानियत से मिलों दूर जो रहते है !

हाँ लगता है डर जेहादियों से इंसानो को !!

प्यार

मेरी कहानी के हज़ार पन्नो मे ,
एक ख़ाली पन्ना भी पड़ा है ,
है लिखना बाक़ी जिसेमें,
हुआ वो “इश्क़” मुझे इस दफ़ा है ।

मेरे गुज़रते वक़्त के साथ ,
तुम हरदम आस पास ही नज़र आते ,
पर सोचा नहीं था तुम ही हो मेरी मोहब्बत ,
वरना कब का ये दिल तुम्हें दे आते ।

मेरे दर्द मे रोते तुम ,
और ख़ुशियों मे मुस्कुराते ,
मेरी एक झलक पाने को तुम ,
दूर कही से आते ।

मेरे टूटे दिल को अब ,
धड़कने की इजाज़त ना थी ,
ख़्वाब बुरा सा मान कर ,
उसे भुल जाने की आफ़त भी थी ।

तुमने आकर मुझ अधूरे को ,
पुरा सा कर दिया ,
बेवजह उलझी सवालों में थी अक्सर ,
मौजूदगी ने तेरे जवाबों से भर दिया ।

क्यूँकि अब इस दिल को ,
हम तुझपर लुटा बैठे थे ,
भुल कर इस जहाँ को ,
तुझमें दुनिया बसा बैठे थे ।

अब ये प्यार ना कभी कम होगा ,
अधूरे पड़े पन्ने पर ,
ज़िक्र इसका हरदम होगा ,
होगा मेरे साथ बन कर ज़िंदगी मेरी ,
मेरी कहानी की शुरुआत और
मेरे प्यार पर ही जो ख़त्म होगा ।

Friday, March 27, 2020

फ़रेबी

जो ये फ़रेब करता दिल ,
जा एक रोज़ ,
फ़रेबी दिल से मिला था ,
हो रही फ़रमाइशों के बीच ,
वो मेरी पसंद बन चुका था ।

धड़कने को धड़कन ,
धड़क भी जाता ,
मेरा हो चुका दिल ,
मुझसे मिलने को भी आता ।

पर ये एहसास ख़्वाब ही रह गये ,
ना जाने क्यूँ वो हमसे दूर हो गये ,
ना फ़रेब था मेरी इरादो में ,
ना ही किये किन्हीं वादों मे ।

कुछ तो था दरमियाँ दिलों के ,
वक़्त जिसे थामे खड़ा था ,
लूटा चुका अपनी ज़िंदगी मुझपर जो ,
वो बेख़बर किसी और के ख़्यालों मे पड़ा था ।

सपना था जो टूट चुका ,
मेरा माही मुझसे रूठ चुका ,
दिल फिर लगाया होगा उनसे उसने ,
फ़रेब समझ छोड़ दिया होगा जिसने ।

ये जंग है दिल की ,
जिसमे हार कर भी जीत जाते है ,
जीत कर भी अक्सर ,
दिलवाले हार जाते है ।

ये फ़रेबी दिल ,
फिर निकल पड़ा है ,
लूटने को दिल धड़कनो से ,
तैयार पड़ा है ।

Saturday, March 14, 2020

ख़ुशबू


मोहब्बत दिल के धड़कनो से ,
होती है मालूम सिर्फ़ ,
ऐसा बिलकुल नहीं ,
ख़ुशबू तेरी , मेरी साँसो में ,
धड़कनो को धड़का रही ।

जो गुज़री तो क़रीब से मेरे ,
ना तेरा दीदार हुआ ,
ना ही नज़रें दो चार हो गई ,
फिर भी दिल तू धड़का गई ,
तेरी ख़ुशबू साँसो में बसने को आ गई ।

मोहब्बत देगी दस्तक फिरसे ,
कुछ इस अन्दाज़ में ,
मालूम नहीं था धड़केगा दिल ,
ख़ातिर , ख़ुशबू लपेटे लिबाज में ।

क्यूँकि अब इस झट पट वाली मोहब्बत को ,
कोई एक नाम चाहिये था ,
निगाहों में बसाने को तस्वीर उसकी ,
उसकी निगाहों से पैग़ाम चाहिये था ।

उस भीड़ में जितना वो ,
मुझसे दूर जा रही थी ,
ख़ुशबू उसकी मुझे ,
उतना ही क़रीब ला रही थी ।

आख़िर निगाहों ने कोशिश कर ,
दिल को और धड़का दिया ,
जब निगाहों ने उसकी निगाहों में ,
ख़ुद को उलझा दिया ।

उसकी ख़ुशबू और वो ख़ूबसूरत आँखें ,
हम अपना सब लूटा बैठे थे ,
एक दफ़ा फिर अजनबी से ,
दिल टूटने को लगा बैठे थे ।

ग़लतफ़हमी थी मेरी ,
की दिल इस बार भी टूट जायेगा ,
था नहीं मालूम ,
ख़ुशबू रूह में बस कर ,
ताउम्र वो मेरा हो जायेगा ।

तेरी ख़ुशबू से अब होती हर सुबह ,
और शाम है ,
फेरती उँगलियाँ तेरी सर पर मेरे ,
देती आराम है ।

तेरी ख़ुशबू .. !!

Sunday, March 1, 2020

बेक़रार

अब .. जाना तो था मुझे  ,
कुछ यादें छोड़ कर ,
चंद लम्हों की वो ,
मुलाक़ातें छोड़ कर ।

जुगनुओं की ख़ातिर ,
सूरज ढलने को खड़ा था ,
सर्द होती हवाओं ने ,
जब उसकी ज़ुल्फ़ों को छुआ था ।

हरकतों से अंजान इशारों के ,
मिलते बिछड़ते निगाहो के ,
अब कुछ बात होने ही लगी थी ,
पर क्या करते जब जाने की हड़बड़ी थी ।

घटते वक़्त के साथ ,
हम कुछ क़रीब आ रहे थे ,
अजनबी एहसास छिपा कर ,
कुछ बता रहे थे ।

कुछ तो था दरमियाँ हमारे ,
जीना था बस इन यादों के सहारे ,
बिछड़ने को अब हम तैयार थे ,
समझ बैठे थे .. वक़्त के इशारे को ..इजहार थे ।

ख़त्म हो गया था सिलसिला हमारा ,
पर था नहीं दिल को जो गवारा ,
कुछ तो बाक़ी रह गया था ,
शायद दिल, निगाहों से कुछ कह गया था ।

पलट कर बस आख़िरी बार ,
देखने को उसे जैसे ही हम मुड़े थे ,
मानो उनकी भी निगाहे मिलने को ,
बेक़रार पड़े थे ।

ख़त्म नहीं ये शुरुआत है ,
कुछ दरमियाँ दिलों के ख़ास है ,
दूर हो कर भी ,
जो मेरे पास है ।।

Sunday, February 2, 2020

कच्चे मकान

होते थे घर पक्के,
कच्चे मकान हुआ करते थे ,
उलझते थे इंसान ,
फिर भी साथ रहा करते थे ।

वक़्त था एक वो भी ,
जब घर में होते थे आँगन ,
खेला जहाँ सब करते थे ,
अक्सर लोग जहा लड़ते थे ।

ना कुछ तेरा , ना मेरा ,
सब सबका हुआ करता था ,
एक वृक्ष की छाओ में ,
पूरा घर रहा करता था ।

कपड़े बाँटे तब भी थे जाते ,
चाचा के कपड़े भैया ,
भैया के कपड़े हम ,
पहन बेहद ख़ुश हो जाते ।

नमक रोटी का स्वाद ,
और उस चूल्हे की ख़ुशबू ,
ना जाने कहाँ खो गई ,
वो बंद मकानों में ... शायद हो गई ।

ना थे दरवाज़े , ना थी दूरियाँ ,
सब था तेरा , सब था मेरा ,
पर वक़्त कैसे बदल गया ,
जबसे मकान तेरा और मेरा हो गया ।

चंद लोगों के साथ घर कैसे हम बनायेंगे ,
जाते वक़्त दुनिया से वो चार कंधे कैसे लायेंगे ,
क्यूँ नहीं तोड़कर मकान आओ घर बनाते है ,
ख़ातिर ख़ुशियों के अपनो के ,
लोगों से घर सजाते है !!

आओ तोड़ कर मकान ,
घर बनाते है ।

Thursday, January 23, 2020

सर्द सड़क

उन सर्दियों की वो रात ,
वादियों में दफ़्न ज़िंदा लाश  ,
सर्द होती मेरी साँसे ,
और बचे चंद अल्फ़ाज़ ।

फिर वो सर्द वाली रात,
लौट कर आई है  ,
मुझ जैसे लाखों का ,
हुजूम वो लाई है ।

फ़र्क़ बस इतना है ..!

सड़क पर आज बैठी हो तुम ,
उस रात मैं लेटी हुई थी ,
ढका है कम्बल में ख़ुद को तुमने ,
मैं फटे कपड़ों से जिस्म ढक रही थी ।

तुम लाई हो साथ बच्चों को ,
मैं पेट में लिए उसे मर रही थी ,
तुम आवाज़ कर रही बुलंद अपनी ,
मैं ख़ामोश पड़ रही थी ।

तुम लड़ रही हो घर के ख़ातिर ,
किसी ग़ैर का बचाने को ,
छिन लिया था किसी अपने ने ,
उस रात मेरे आशियाने को ।

तुम भी हो ज़िंदा ,
और तुम्हारे अपने भी ,
मर रहे थे हम सब ,
और हमारे सपने भी ।

नहीं था कोई सड़कों पर,
ख़ातिर हमारे आया ,
लाशों को समझ बेवा ,
नोच उन गिद्धों ने था खाया ।

बैठी हो तुम भी सड़क पर ,
रोक कर अपनो का रास्ता ,
थी पड़ी लाशें हमारी भी सड़कों पर ,
अपनो का था नहीं जिनसे वास्ता ।

मैं लौट कर जब भी आऊँगी ,
आशियाना फिर से सजाऊँगी ,
सड़कों को कर आज़ाद ,
सबको रास्ता दिखाऊँगी ।

मैं लौट कर आऊँगी ....!!

Saturday, January 18, 2020

मोमबत्ती

आँखों में आँसू उसके ,
चहरे पर ख़ामोशी ,
हिम्मत से लड़ी थी “माँ” ,
हार जंग इंसाफ़ की आज घर लौटी ।

लाखों की भीड़ लिये ,
हम सड़कों पर आये थे ,
बलात्कारियों को फाँसी ,
कुछ ऐसे नारे लगाये थे ।

बदलते वक़्त के साथ ,
हम सब कुछ भूल गये ,
माँ को छोड़ अकेले ,
अपनी दुनिया में खो गये ।

मिला जो इंसाफ़ उस बेटी को ,
एक दरिंदा हुआ आज़ाद था ,
कुछ चंद पैसे और मशीन ,
लेकर “मालिक” से बना उस्ताद था ।

इंसाफ़ के इस लड़ाई मे ,
माँ उतरी है दलदल वाली खाई में ,
हर कोशिश में हार रही ,
फिर भी लड़ने को तैयार रही ।

आज जिनको सड़कों से ,
सत्ता मे लेकर आये थे ,
मालूम नहीं था चंद वोटों के लिये ,
वो इंसाफ़ रोकने आये थे ।

क्यूँकि “बेटी” हम सब की है ,
आओ उस माँ के पास जाते है ,
सड़कों पर क़ब्ज़े के इस दौर में ,
सत्ता की भूख मिटाते है ।


आओ सभी मिल कर फिर से,
सड़कों पर आते है ,
बुलंद कर आवाज़ अपनी ,
“मालिक” को जगाते है ।

माँ जिसको छोड़ दिया लाखों ने ,
आओ हम फिर उसका साथ निभाते है ,
बुझ गई मोमबत्तियों को छोड़ ,
उम्मीद और भरोसे का दिया जलाते है ।

आओ चलो सड़कों पर उतर कर ,
माँ का साथ निभाते है !!

Saturday, January 11, 2020

मालूम नहीं

तुझसे मोहब्बत हुई कब ,
कहाँ और कैसे ,
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

तेरी पहली मुलाक़ात ,
और उसमें हुई हर बात ,
और उस वक़्त के हालत ,
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

एक रोज़ फिर मिला था तुझसे ,
पर तुम वक़्त निकाल नहीं पाई ,
थी शायद कहीं जाने को आई ,
लेकिन कहाँ ?
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

कब चंद लम्हों की बातों को ,
रात छोटे लगने लगे ,
अजनबी से पहचाने लगने लगे ,
आख़िर क्यूँ ?
यक़ीन मानो ... मालूम नहीं ।

हर रात चाँद से पहले सोने वाला ,
तुम्हें बिना देखे अब सोता नहीं ,
पर ऐसा क्यू ??
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

जान कर भी जा रही जान ,
तेरी आँखों में डूब कर ,
तैरना मंज़ूर नहीं होता ,
क़सम से ?
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।

ज़िंदगी भर ज़िंदगी के लिये ,
हम सब लूटा आये थे ,
ख़त्म उस सिलसिले को ,
आज ख़ुद कर आये थे ,
लेकिन क्यूँ ?
यक़ीन मानो .. मालूम नहीं ।।

शायद


दिल के लगने से ,
दिल के बिछड़ने तक ,
मुझसे मिलने और
उनसे जुलने तक ।

मेरी पहली मुलाक़ात ,
से आज फिर वो मिल रहे होंगे ,
मेरे जाने पर ,
मोम से जज़्बात पिघल रहे होंगे ।

होगा हाथ फिर थामा मेरा ,
बड़ी शिद्दत से आज उन्होंने ,
कसमें भी ख़ूब खा रहे होंगे ,
ख़्वाब फिर सज़ा रहे होंगे ।

ख़ुशबू से मेरे महक रहा होगा शमा ,
और अल्फ़ाज़ो से वो सज़ा रहे होंगे ,
पिघल कर बहने को आ रहे जज़्बात ,
आँखों में दिखा रहे होंगे ।

क्यूँकि जाना ज़रूरी है अब ,
वो रुकने को मिन्नते किये जा रहे होंगे ,
आख़िरी नो हो मुलाक़ात ये ,
फ़ैसला कुछ ऐसा सुना रहे होंगे ।

मैं तो आज भी हु वही वैसे खड़ी ,
बस वो कोई और मुझ सा ढूँढ लाये होंगे ,
भूल कर तस्वीर मेरी ,
पहली हो मोहब्बत मेरी .. पहेली बुझाये होंगे ।

शायद मुझसे मिलने भी पहली दफ़ा ,
किसी मैं को छोड़ आये होंगे ,
मेरे संग बीते हर लम्हे को ,
कही और जी कर आये होंगे ।

शायद .. आज फिर मुझसे मिलने ,
वो कहीं आये होंगे !!

Monday, January 6, 2020

वो आँखे

तेरी आँखो में आज देखा था पहली दफ़ा .. शायद ,
कुछ मुस्कुरा सी रही थी ,
जज़्बात छिपा सी रही थी ,
ख़्वाब सज़ा सी रही थी ,
तेरी आँखो में देखा था पहली दफ़ा आज .. शायद !!

यू तो देखते थे कई दफ़ा तुमको ,
तुम्हारे भेजे ख़त में ,
पर कभी ठीक से निहार नहीं पाये ,
शायद आँखो में तुझे उतार नहीं पाये ।

गुमनामी के रिश्तों में उलझें ,
हुए हमारे तार है ,
अजनबी आज भी हो तुम मेरे लिये ,
बातें यू हो जाती दो चार है ।

कभी देखा ना ग़ौर से इतना ,
या शायद कुछ नया सा एहसास है ,
तेरी आँखो में बसी उसकी मोहब्बत ,
या काजल का रंग कुछ ख़ास है ।

आँखो से बातें करने उसके ,
अब हम नहीं जाते ,
दिल में बसी तस्वीर उसकी ,
देखते ही अजनबी बन रुक जाते ।

देखा था ग़ौर से तेरी आँखो में आज ...
शायद ,
ख़ूबसूरत है वो तेरी मोहब्बत सी !!!

Sunday, December 29, 2019

ग़ायब

ना जाने क्यूँ ग़ायब है ख़ुशियाँ ,
ना जाने क्यूँ तेरा इंतज़ार है ,
ना जाने क्यूँ उलझी हु तुझमें ,
ना जाने ये कैसा प्यार है ।

हर सुबह खुलते ही आँखे ,
देखने को जिसे ख़्वाब संजोये थी ,
टूट गये अरमा उस पल ही ,
सामने जब ख़ामोशी मेरे खड़ी थी ।

दिन जो कट जाते थे जल्दी ,
और रात ख़्वाब बन उड़ जाता था ,
हर पल उसकी मौजूदगी से ,
ख़ुशनुमा हर लम्हा हो जाता था ।

तेरी ग़ैर मौजूदगी अब सताती है ,
ख़ुशियाँ बेवजह अधूरी रह जाती है ,
हाले दिल मैं किसे अपना सुनाऊँ ,
दिल में तेरे तस्वीर को कैसे छिपाऊँ ।


उलझी हु माँझे सी बन कर तुझमें ,
बन पतंग मुझे उड़ा ले जा ,
मेरी ख़ुशियाँ मुझे लौटा कर ,
ग़लतियों की सज़ा दे जा ।

ग़ायब हो तुम ,
ग़ायब तुम्हारा एहसास है ,
फिर भी तेरे लौट आने का ,
ज़िंदा मुझमे आस है ।

ग़ायब हो तुम ,
ग़ायब तुम्हारा एहसास है !!