Wednesday, July 15, 2020

जंग

ये जंग है ख़्वाबों की ,
ख़्वाबों के संग ,
टूटते बिखरते बिछड़ते ,
बदलते कई रंग ।

हौसला भी है वही ,
और जज़्बा भी ख़ूब ,
मौजूद हर मोहरा मैदान में ,
कोई घोड़ा कोई ऊँट ।

क्यूँकि जीतनी है जंग ,
हर बार हार कर भी ,
बस मैदान में है डट जाना ,
मुश्किल मगर मुमकिन है निशाना ।।

हर सुबह उठ कर ,
ख़्वाबों की ओर दौड़ जाते है ,
क्या हुआ जो नहीं मिली मंज़िल ,
ढूँढने रास्ता फिर सो जाते है ।

बस रहा भरोसा ख़ुद पर ,
हौसला नहीं डगमगायेगा ,
ख़्वाबों को सच होने से ,
कौन रोक पायेगा ।

Tuesday, June 30, 2020

चमन की बहार

ये इश्क़ की ज़ंजीरो में ,
बँधा एक दिल है ,
छोटी सी ख़्वाहिश जिसकी ,
दूर बहुत मंज़िल है ।

ख़्वाबों से ख़्यालों तक का सफ़र ,
था बहुत शानदार ,
ख़ूबसूरत वो और उसकी अदायें ,
खिच ले मुझे अपनी ओर हर बार ।

सच से बस उतना ही था फ़ासला ,
जितना वो हमें पहचानते थे ,
आज भी हम थे उनके लिये अनजान ,
बस इतना ही वो जानते थे ।

दूसरों की आँखों में ,
बसी उसकी तस्वीर ,
कैसे नज़रों से उतार लाते ,
कैसे ख़्वाबों को तोड़ पाते ।

मोहब्बत हमने भी की थी ,
पर हाले दिल किसी बताते ,
ख़्वाबों में है सिर्फ़ साथ मेरे ,
कैसे बस इतना सा सच सुनाते ।

धड़कनो से माँगा उधार हो तुम ,
सच्चा प्यार हो तुम ,
ख़्वाबों में ही सही ,
चमन की बहार हो तुम ।। 

Monday, June 15, 2020

मेरे मौत की ख़बर

जिस रोज़ मिले ख़बर मेरे मौत की,
चंद शब्दों के फ़ूल छोड़ जाना।
रिश्ता जो निभाया ना कभी,
उसपर इमोटिकॉन्स वाले आँसू बहाना।।

ज़िंदगी के मतलब को,
मर कर कैसे जताते हैं ।
सीख लो कला ये उनसे,
जो मौत के बाद ज़िंदगी मे आते हैं।।

था परेशान बहुत उस दौर में,
कहानियाँ भी थी अनगिनत ।
पर किसको सुनाता,
ज़िंदा रहने पर मिलने कौन है आता।।

चलो अब तो वो शोर भी,
दफ़्न मेरे अंदर ही हो गया।
मौत की बाँहों मे जाकर,
जिस पल मैं सो गया।।

ज़िंदगी थी साथ ज़िंदगी के ,
काफ़ी अरसे तक मेरे ,
भूल जायेगा चंद लम्हों में वो ,
जो था नहीं कभी साथ मेरे । 

ख़बर मेरे मौत की भी पुरानी होगी,
धुँधली जिसकी कहानी होगी।
फिर आँसू बहाने को वो तैयार होंगे,
मौत के पास जाने को ना जाने ,
कितने और बेक़रार होंगे।।

गर हो सके तो मेरी मौत पर ,
ना आंसू बहाना।
वो चंद लम्हा ही सही ,
किसी अपने को दे आना ।

वरना जंग-ए-ज़िंदगी से,
और कहानियाँ मौत की।
आये दिन सुनते जाएंगे ,
चंद शब्दों वाले फ़ुल वो छोड़ जाएंगे।।

Wednesday, June 10, 2020

मैं दिल्ली हूं

मैं ज़िंदा लाश बन ,
कहीं लावारिस पड़ी हूं।
कहीं आख़िरी है साँस बची ,
कहीं मौत की गोद में पड़ी हूं।
मैं दिल्ली हूं।

मालिक मेरे छोड़ कर मुझे ,
मेरे अपने गिनाते है ,
क़ैद कर मेरे बच्चों को ,
मुझे ख़ूनी बताते है ,
मैं दिल्ली हूं।

मेरे घर में ना दरवाज़े ,
ना ही दिलों में थी कभी दूरियां
पहले जलाया जिस्म को मेरे ,
दंगो के आग से ,
आख़िर क्या थी मजबूरियाँ ।

मैं आज अपने-पराये के जंग में ,
आत्मीयता को ही खो रही हूं,
सो रहे मालिक मेरे बंद कमरे में ,
और मैं खुले आसमां में रो रही हूं ,
मैं दिल्ली हूं ।

ना कोई पूछ रहा हाल मेरा ,
ना कोई ज़िंदगी बचा रहा है ,
आख़िर क्यूँ है भूख इतनी ,
क्यों मेरा जिस्म नोच कर मालिक खा रहा है ,
मैं दिल्ली हूं।

मैं गर बच गई जीवित
लौट कर ज़रूर आऊँगी ,
बंद घरों में ज़िंदा लाश ,
दुनिया को दिखाऊँगी ।

कौन कहता दिलवाले रहते यहाँ ,
मौत के सौदागर बने बैठे मालिक जहाँ ,
वक़्त ज़रूर जवाब दे जायेगा ,
मेरे मिट जाने पर वो ,
किस पर हुकूमत चलायेगा ।

मैं दिल्ली हुँ ,
ज़िंदा लाश क़ब्र के पास ।।

Sunday, June 7, 2020

गुमसुम ज़िंदगी

माना की अंधेरा बहुत है मगर ,
दीया तो जलाना होगा ,
बुझ चुके उम्मीद के दीपक को ,
फिरसे जगमगाना होगा ।

साथ थे कल सब पराये ,
आज सब अपने साथ है ,
पर लगता नहीं कुछ अपना ,
उलझे सब जज़्बात है ।

होंठों पर ना अब आती हँसी ,
ना आँखें नम होने को आती है ,
मायूसी घेरे बैठे चारों ओर मेरे ,
मुझे ख़ामोश कर जाती है ।

मौलूम नहीं पता कब ,
कोई अपना मिलने को आयेगा ,
लावारिस हो चुकी ज़िंदगी को ,
क्या वो पहचान पायेगा ।

गुमसुम सी ज़िंदगी मेरी ,
शायद कुछ ऐसी ही हालत तेरी ,
पर कैसे तुझे हाले दिल सुनाये ,
कैसे तुझमें गुमसूदा हो जाये ।

Monday, June 1, 2020

ग़ज़ल

मेरी दिल के धड़कनो से पुछो ,
कैसा हाल हो चला है ,
एहसास जुड़े तुझसे ,
वो शब्दों में पिरो चुका है ।

स्याही तेरा एहसास ,
क़लम तेरे जज़्बात ,
आँखे तेरी वजह ,
और ये कायनात ।

तेरे ज़िक्र भर होने से ,
सब बदल सा जाता है ,
थमने को आ चुके दिल को,
फिर से वो धड़काता है ।

ना कभी हम होते साथ ,
ना कभी बहुत दूर ,
यक़ीनन है मजबूरियाँ बहुत ,
पर क्यूँ ? बताना ज़रूर ।

मेरे हर शब्द पर हक़ तेरा ,
दिल पर तेरा राज़ ,
सजाते जिन्हें लफ़्ज़ों में पिरो कर ,
हर दिन और रात  ।

मुमकिन है की हम ना मिले कभी ,
फिर भी तुम्हें लिखता जाऊँगा ,
तुम बनोगी ग़ज़ल मेरी ,
स्याही और क़लम से ,
हर दफ़ा सजाऊँगा ।

गर ना मिले खत मेरा कभी ,
आख़िरी समझ लेना ,
क्यूँकि याद रहे धड़कनो के ,
आख़िरी शोर पर भी ,
हक़ सिर्फ़ तेरा ।

Friday, May 29, 2020

नींद

प्रिय नींद ,
मेरी पहली मोहब्बत हो तुम ,
जो अक्सर दूसरी मोहब्बत के आते ही ,
कहीं खो जाती हो ।

अक्सर रातों को तुमसे लड़कर ,
कहीं तुम तक पहुँच पाते है ,
कभी आ जाती हो वक़्त पर ,
कभी हम बुलाते है ।

आज तो मानो रुठ कर बैठ गई हो ,
कुछ इस क़दर ,
बेख़बर है हम वजह से ,
और हो रही , हर कोशिश , बेअसर ।

ना दूसरी मोहब्बत ने आज दस्तक दी ,
ना ही दी किसी ने दग़ा ,
बेवजह क्यूँ ग़ायब हो आज ,
कोई तो बताये वजह ।

उड़ी उड़ी सी तुम कही ,
बतला दो अपना पता ,
कोई तो ले उड़ा है ,
मेरी पहली मोहब्बत बेवजह ।

अब और नहीं होता इंतज़ार ,
मिलने को तुझसे आँखें बेक़रार ,
दिल भी धड़कना छोड़ रहा है ,
ख़ामोशी की चादर वो ओढ़ रहा है ।

लौट आओ वक़्त से ,
कही देर ना हो जाये ,
पहली मोहब्बत अंजाने में ,
मौत ना बन जाये ।

आओ फिरसे तेरी दुनिया में ,
हम लौट जाते है ,
पहली मोहब्बत में डुब कर ,
ख़्वाबों से मिल आते है ।। 

Monday, May 25, 2020

ग़ुरूर

मुझे तुझसे इश्क़ का ग़ुरूर ,
तुझे उसमें खोने का सुरुर ,
मुझे तेरी यादों का सहारा ,
तुझे उसके लम्हों ने वारा ।

मैं उठ कर आज भी देखता तुझको ,
और तु भी उसे निहारती है ,
मैं ज़िंदा हु ख़ातिर तेरे ,
और तु उसपर जान वारती है ।

होती है बाँहों में अक्सर मेरे ,
बन कर तु एहसास ,
रहती है तु साथ उसके ,
हर दिन और रात ।

मेरे हर ज़िक्र में मौजूद तु ,
और तेरी ही बातें ,
चाँद से जा पुछ आ कभी ,
अभी कितनी और रातें ।

है ग़ुरूर जितना तुझमें ,
उसे पाने का ,
शायद उतना ही है मुझे ,
तुझमें खो जाने का ।

ग़ुरूर मिट भी जाये तो सही ,
मोहब्बत के रंग कैसे मिटाओगी ,
हर वो निशा जो मेरी मौजूदगी बताते है ,
कब तक उन्हें छिपाओगी ।

सूखे पत्ते

मेरी यादों के बाग़ीचे में ,
कुछ पत्ते सुख कर गिर पड़े थे ,
कुचलने को जिसे राहगिर दिल के ,
पग पग पर खड़े थे ।

मौसम के बदलने से ,
सूरज के ढलने से ,
शाम के आने से ,
चाँद के जाने से ।

अब तक संभालें बिखेर पत्तों को ,
ख़ामोशी से उन्ही के पास खड़ा था ,
राहगिर को रोकने की ख़ातिर ,
ख़ुद को ज़ख़्मों से भर चुका था ।

दिल में ज़ख़्मों से अब ,
घाव गहरे होने लगे ,
तेरा ज़ख़्म टूटने का क्या कम था ?,
एक और घाव हम सहने लगे ।

तूने माना नहीं हमें कभी अपना ,
और ग़ैर तुझे जलाने लगे ,
टूट कर मुझसे जिस पल ,
तुम दूर जाने लगे ।

कौन कहता है पत्तों के बग़ैर ,
पेड़ पनप पाता है ,
पत्तों से उसकी मोहब्बत ऐसी ,
वो छांव और सुकून छोड़ जाता है ।

हज़ारों है पेड़ मुझ जैसे ,
और लाखों पत्ते ,
टूट कर बिखर जाते बहुत ,
कुछ झूठे कुछ सच्चे ।। 

Wednesday, May 13, 2020

मुआवज़ा

मेरी ज़िंदगी को मौत बना कर ,
दाम लागते है मालिक ,
छुप छुप कर जीते आये की ,
खुल कर मौत दिखाते है मालिक ।

कभी ख़बरों को पढ़ने वाले को ,
ख़बर बनाते है मालिक ,
मुझ जैसे अनपढ़ के मरने पर ,
काग़ज़ लिखवाते है मालिक ।

हे मालिक , ख़ुशिया और ग़म ,
मालूम नहीं कौन रहता है साथ कम ,
फिर भी अनजान से रिश्ता आप बनाते है ,
बिन बुलाये मेहमान बन कर आ जाते है ।

मेरी सूरत जिससे मैं होता ख़ुद अनजान ,
पहचान लेते अक्सर वो शैतान ,
ख़ाक में मिला कर मुझे ,
दे देते मेरे मौत का मुझे ईनाम ।

मौत के इंतज़ार में बैठें रहते मालिक ,
गिद्ध बन नोचने को लाश ,
ले आते मेरा ही ख़ज़ाना लुट कर ,
मेरे मौत के बाद ।

क्यूँ नहीं कभी ज़िंदा को देते ज़िंदगी ,
या किसी उलझन में उसका साथ ,
हर बार सोच कर मसीहा ,
चुन लाते मालिक हम ,
बेचने ख़ुद की लाश ।

मालूम नहीं मालिक कभी ,
क्यूँ ख़ुद मुआवज़ा नहीं पाते ,
बन कर गिद्ध नोचने ,
मेरी ही लाश पर आते ।

ए मालिक ,
मुआवज़ा का दौर गर जाये थम ,
यक़ीनन मरेंगे कम ,
ज़िंदा रहेंगे हम , ज़िंदा रहेंगे हम ।।

Sunday, May 3, 2020

थप्पड़

फेरते उँगलियाँ गालों पर उसके ,
अनगिनत दफ़ा रहे होंगे ,
छुपे जज़्बात दिल के अक्सर ,
इस अदायगी से वो बयां करते होंगे ।

सुबह के शोर से पहले की ख़ामोशी ,
या रात के सन्नाटे का शोर ,
बन बैठी है ये उँगलियाँ .. क़सूरवार ,
आज कल ना जाने क्यूँ हर ओर ।

आज भी छुआ था गालों को उसके ,
उँगलियों ने थोड़ी ज़ोर से,
थे निशाँ ज़ख़्म के इस दफ़ा ,
लिये ख़ामोशी चारों ओर थे ।

जो लगते थे गले अक्सर ,
इस अदायगी के बाद ,
जाने लगे ख़ामोशी से दूर ,
दफ़नायें टूटे दिल के साथ ।

ना माँगा कभी मोहब्बत से अधिक ,
ना कभी चाहा किसी और को ,
छोड़ आई आज गलियाँ वो ,
संग उसे , उसके हाल छोड़ कर ।

कई दफ़ा एक लम्हे में ,
सब बिखर जाता है ,
अंदाज़े मोहब्बत में “ज़ुल्म” ,
कहाँ जगह पाता है ।

हाँ अक्सर हम ख़ुद को समझाने में ,
अपना दुःख सुनाने में ,
उसकी बात सुनना भुल जाते है ,
अनगिनत दफ़ा ऐसा ज़ुल्म कर जाते है ।

बेशक थोड़ा ही शोर रहाँ हो ,
उँगलियों का गालों पर उस रोज़ ,
पर ज़ख़्म पुराना सा लगता है ,
ये “थप्पड़” बहाना सा लगता है ।

Wednesday, April 22, 2020

दो दिल

धड़कन के धड़कने से ,
दिल हम लगा बैठे ,
था मालूम नहीं पता ,
फिर भी घर बसा बैठे ।

एक से लगते है हम ,
और एक सा धड़कता दिल भी ,
फिर भी मुश्किलें ना कम है ,
ज़माने को तो सिर्फ़ ,
मेरी ही मोहब्बत का ग़म है ।

क्यूँकि तुम अच्छी नहीं लगती ,
जैसे औरों को भा जाती हो ,
मालूम नहीं क्यू ,
धड़कता नहीं दिल वैसे ,
जैसे दिलों मे बस जाती हो ।

याद है आज भी मुझे ,
उसकी वो पहली मुस्कान ,
जिस पर हम सब लुटा बैठे ,
दिल से दिल लगा बैठे ।

ना बिखरी है ज़ुल्फ़ें उसकी ,
ना ही आँखो पर काजल ,
सजता है बिलकुल मुझ जैसे ,
कहती दुनिया जिसे पागल ।

फ़र्क़ पड़ता है क्या ,
अलग सा होना जिस्मों का ,
क्यूँकि इश्क़ को चाहिये ,
सिर्फ़ दो दिल , धड़कनों के साथ ।

बहुत हुई लैला और मजनूँ की जोड़ी ,
अब हम भी क़िस्से कहानियों में आयेंगे ,
सिर्फ़ एक होगी पहचान हमारी ,
 “दो दिल” जिससे जाने जायेंगे ।

हाँ दो जिस्म एक से ,
मोहब्बत करते जायेंगे ,
होगी ख़ूबसूरत कहानी हमारी भी ,
दुनिया तक लेकर जिसे हम आयेंगे ।

हाँ दो जिस्म एक से ,
मोहब्बत करते जायेंगे ।। 

Thursday, April 16, 2020

जुगनू


मालूम नहीं फिर ये रात ,
कब लौट कर आयेगी ,
जुगनू सी चमकती हँसी तेरी ,
होंठों पर फिर जगमगाने आयेगी ।

फिर भी तेरे संग बीते हर लम्हे को ,
ख़ूबसूरत हम बनायेंगे ,
अल्फ़ाज़ो से ही सही ,
तेरा श्रिंगार कर जायेंगे ।

होगी और भी ख़ामोशी शायद उस रोज़ ,
और आसमा भी ख़ामोश पड़ा होगा ,
देखने को तेरे चहरे पर हँसी ,
चाँद भी तरस रहा होगा ।

माना की है ना रिश्ता कोई ,
ना ही कोई जज़्बात है ,
फिर भी ना जाने हो कर भी दूर ,
लग रहा तु पास है ।

बीत गया वो वक़्त भी ,
और ढेरों एहसास ,
चंद ख़ुशियों के लम्हों की ,
देकर तुझको सौग़ात ।

हर शाम के ढलते रात की ओर ,
चमकता चाँद और तारे हर ओर ,
जुगनू सा मन बन जाता है ,
ढूँढने तुझे फिर निकल जाता है ।