Monday, December 7, 2020

दिल नहीं करता

अब दिल नहीं करता,
किसी से दिल लगाने को , 
एक और दफा दिल ,
किसी और का तोड़ जाने को l 

ना ही फिज़ाओं में है खुशबू तेरी ,
ना ही हलचल पत्तियों पर ,
ना खिले है फूल कहीं ,
ना ही पैरों के निशा बिखरे पत्तों पर l

मौसम सी होती है मोहब्बत ,
कौन ये सच मानता है ,
धूप और छाव के मायने ,
सिर्फ वक्त पहचानता हैं l

कभी लगता है डर धूप से ,
कभी छाव ढूंढते है ,
बेवजह ही नहीं लगाते दिल ,
अजनबी में भी पहचान देखते है l

फरेबी कहे दिल को ,
या तुमको बेवफा ,
इश्क़ में हार बैठे हम बाज़ी ,
या ज़िन्दगी एक दफा ?

अब नहीं करता दिल ,
किसी से दिल लगाने को ,
एक और दफा किसी का ,
दिल तोड़ जाने को ll

Wednesday, November 11, 2020

अजनबी


मुमकिन नहीं या मुश्किल है ,
उलझा जज्बातों में दिल है ,
नकाबपोश चहरे है अनगिनत ,
कौन अपना और कौन अजनबी है ।

आंखो से होती अक्सर बातें ,
उलझ जिनमें कई दफा हम जाते ,
लब्जो के शोर को समझना होता मुश्किल ,
और खामोशी से धड़कता ये दिल ।

मालूम नहीं ये सिलसिला ,
आखिर शुरू ही क्यों हुआ ,
अजनबी थी निगाहें जो अब तक ,
उनमें हमारा जिक्र क्यों हुआ ।

है और भी निगाहों का पहरा ,
जिन्होंने ने दिया उसे जख्म गेंहरा ,
पर हम क्यों मरहम बनने को आ रहे ,
जब ज़ख्म से भी वो मुस्कुरा रहे ।

अजनबी निगाहों में है बसी,
किसी और की तस्वीर ,
ढूंढ रहे है देकर जख्म दिल को ,
अपनी निगाहों में उसकी तस्वीर ।

बेहतर है वो अजनबी ,
आज भी अनजान है ,
लिए अनगिनत सवाल ,
मालूम नहीं जिसकी हमे पहचान है ।

Saturday, October 31, 2020

फ़िक्र

कभी दूर हो कर भी साथ होते थे ,

हाथो में थामे हर पल हाथ होते थे ,

होती थी लम्बी लम्बी बाते ,

छोटे छोटे ख्वाब होते थे। 


निगाहे तो मिलती थी नहीं ,

अलफ़ाज़ भी लिख कर जाते थे ,

लिखी दास्तने दिल की बातो को ,

अपने लबों से वो पढ़ पाते थे। 


दौर बदला बदली मोहब्बत ,

साथ होना पास होना और बाबू सोना ,

वक़्त के साथ इश्क़ और उसकी वजह ,

दोनों बदल जाते है ,

इस झूठे सच को ,

छोड़ हमें सब मान जाते है। 


बुनते नहीं कोई ख्वाब अब ,

और ना ही इश्क़ में फ़ना हो पाते है ,

सच्चा समझ आज के इश्क़ को ,

कुछ वक़्त के बाद खुद उसे झुट्लाते है। 

 

फ़िक्र होती मुझे उस रांझे की ,

जिसकी हीर कही खो गई ,

बदलते दौर में बदली नहीं मोहब्बत ,

बस उसकी मोहब्बत किसी और की हो गई।

Saturday, October 10, 2020

इश्क़ तो है

माना की इश्क़ में मुश्किलें है बहुत ,

पर करना भी ज़रूरी है ,

ख़ातिर रखने को किसी का दिल ,

किसी का तोड़ना भी ज़रूरी है ।


है एतबार इश्क़ पर उसके इतना ,

हम सब लूटा बैठे है ,

तोड़ कर अपनी ही ख़्वाहिशों को ,

उसकी ख़ुशियों को ही ख़्वाहिश बना बैठे है ।


ना रास्तों का पता ,ना ही कोई ठिकाना ,

अजनबी से लोग और दिल अंजाना ,

फिर भी पैरों के निशा तलाश कर ,

ढूँढ रहा दिल कोई अपना दीवाना ।


ग़ौर से ग़ैर को देख कर भी ,

नज़रें अक्सर लड़ा लिया करते है ,

अजनबी है बहुत महफ़िल में ,

अक्सर दिल चुरा लिया करते है ।


इश्क़ में उलझ कर हर एक दिल ,

किसी रोज़ क़ुर्बान होता है ,

किसी से होती है बेपनाह मोहब्बत ,

तो कोई इश्क़ बेवफ़ा , बदनाम होता है ।


इश्क़ तो हर दिल को होता ,

कभी हँसता कभी रोता है ।।

Thursday, September 24, 2020

कब्र

जो ना मिली होती दो गज़ ज़मीन ,

और मिट्टी की चादर ,

कही होते पड़े लावारिस ,

लिये जिस्म पर ज़ख़्मों के सागर ।


ना आया था कोई पहले मिलने ,

मेरे मिट्टी के ऊपर वाले कब्र में ,

था पड़ा सुनसान वो भी ,

ज़िंदा लाश के मरने के सब्र में ।


थी जान बाक़ी कुछ ,

और उम्मीद तेरे लौट आने की ,

अनगिनत दिये अंजाने ज़ख़्मों पर ,

मरहम लगाने की । 


ख़ैर मौत से पहले कब्र पर ,

कौन ही है आता ,

ज़िंदा पड़े अनगिनत क़ब्रों में ,

लाशों से कौन ही दिल लगाता ।


आज वो बैठी है मेरे कब्र के पास ,

भीगी पलकें और थोड़ी उदास ,

फेर रही वो ऊँगलियाँ कब्र पर ,

और फ़ुल के मरहम लगा रही ।


उसके इस अंजाने अन्दाज़ से ,

मानो ज़िंदा होने का दिल करता है ,

क्यूँ अक्सर ज़िंदा रहने पर ,

इतना प्यार नहीं मिलता है ।


अब मेरी रूह भी तुझ जैसे ,

किसी और जिस्म की जान हो गई ,

मेरे इस जिस्म से ,

वो भी अनजान हो गई ।


मेरी कब्र पर लौट कर फिर आना कभी ,

सिर रख कर सो जाना कभी ,

होगा मालूम शोर धड़कनो का ,

गर उन्हें सुन पाना कभी ।।

Sunday, September 20, 2020

बेहतर

बेहतर ही होता जो ना आते तुम ,

मुस्कुरा कर दिल ना चुराते तुम ,

ना ही होती कोई उम्मीद ख़ुद से ,

ना ही उसे फिर से तोड़ पाते तुम ।


पहली ही मुलाक़ात आख़िरी क्यूँ ना हुई ,

क्यूँ वक़्त ने फिरसे था मिलाया ,

दूर था हो मीलों मुझसे अब तक ,

फिर था ज़िंदगी के क़रीब आया । 


ना ही आँखों से अब होती बातें ,

ना ही हम उन्हें अब पढ़ पाते ,

ना ही बेताबी है मोहब्बत में ,

ना ही शिद्दत से उन्हें वो निभाते । 


मिल कर भी मीलों दूर खड़े है ,

जान कर भी अजनबी बने है ,

बेहतर ही होता जो ना मिलते ,

शायद यूँ ना हम कहते ।


ख़ैर इस ज़िंदगी का क्या अब ,

पर अगली ज़िंदगी बेहतर बनायेंगे ,

होगा शायद बेहतर ,

इस दफ़ा जो तुझे भूल जायेंगे ।

Wednesday, September 2, 2020

हद

ये जो इश्क़ है ना तुमसे ,

हद में नहीं हो पाता ,

यूँ बैठी हो जाकर दूर कही ,

कोई पता भी नहीं बताता ।


तेरी हँसी की हो गूँज ,

या निगाहें क़ातिलाना ,

कमबख़्त इश्क़ क्यूँ है ,

किसी हद से अनजाना । 


माना की मिलना हुआ नहीं ,

मिल कर भी कई बार ,

हद में थे नहीं कभी तुम ,

कभी हमारा प्यार ।


धड़कन ने भी कहाँ दिल से ,

हद में धड़काया करो ,

बेवजह ही नहीं अक्सर,

साथ छोड़ जाया करो ।


कैसी है जीद तेरी ,

और कैसा मेरा पागलपन ,

हद में रह कर करो मोहब्बत ,

ए जानेमन ।।

Saturday, August 29, 2020

महसूस

आज के इस अकेलेपन में ,

जब रिश्ते टूट रहे ,

मिल रहे कुछ नये पराये ,

और कुछ अपने पुराने छूट रहे ।


हर बदलते शाम के साथ ,

चाँद भी कुछ अनजान है ,

कभी चमकते जुगनू ,

कभी तारों से रोशन होता आसमान है ।


रात हो अँधेरी, या ,

हो उजालों का पहेरा ,

एक ख़ूबसूरत ख़्वाब ,

होता एहसास और गहरा । 


जुगनु ,

मीलों दूर कहीं खो गये तुम ,

दिन के उजाले में सो गये तुम ।


बस इस उजाले और अँधेरे में ,

उलझे हुए लाखों जज़्बात है ,

महसूस होती मौजूदगी जिसकी ,

वो धरती और मैं आकाश हैं ।

Friday, August 14, 2020

क़रीब

मोहब्बत हो ग़ैर की तुम ,

तुम मेरी मोहब्बत हो ,

शाम हो अंधेरी सी तुम ,

मेरी जुगनुओं सी मोहब्बत हो ।


समझना नहीं आसान तुमको ,

तुमको समझाना है नामुमकिन ,

मोहब्बत की फ़रियाद लिये बैठी तुम ,

और गिनते हम हर गुज़रता दिन । 


कभी हम पास , कभी तुम दूर ,

कभी हो वजह , कभी नामंज़ूर  ,

कभी वो लम्हे , कभी तेरी यादें ,

कभी तेरे वादे , कभी हम आधे ।


तेरी ख़ुशबू हो या तेरा एहसास ,

तेरी तिरछी निगाहे या बेहद पास ,

तेरा हँसना या हँसाना ,

मुश्किल है , पर , है तो निभाना ।


क़रीब तेरे जिस्म के नहीं ,

तेरी रूह के पास आना है ,

बेवजह ही सही ,

पर हर मर्ज़ की दवा बन जाना है ।


माना की मुश्किल होगी समझने में ,

पर समझ कर दिखाओ ,

क़रीब हो कर भी होते है दूर जो ,

हाले दिल कभी उनसे पुछ आओ ।


मोहब्बत है कोई और तुम्हारा ,

मोहब्बत हो मेरी तुम ,

हो कर भी एहसास क़रीब दिल के ,

धड़कने है गुमसुम ।।

Saturday, August 8, 2020

ख़फ़ा

तेरी हँसी मे बसी ख़ुशी ,

और आँखों में ग़म ,

मंज़र है बिछड़ने का आज ,

और वक़्त है काफ़ी कम ।


अनगिनत सवाल और चंद जवाब ,

अधूरे ख़्वाब और अल्फ़ाज़ ,

कैसा साज कैसा राज़ ,

चंद लम्हों का अधूरा साथ ।


इतने बरसात के बाद भी ,

क्यूँ इश्क़ में भीग नहीं पाये ,

मानो मिलने के लिये नहीं ,

बिछड़ने के लिये हर बार पास आयें ।


क्यूँकि अब तय है सफ़र ,

और मंज़िल भी बेहद पास है ,

दूर होते हम और हमारी यादें ,

शायद अंत का ये आग़ाज़ है ।


कभी हर लम्हे में थे हम ,

आज ख़्यालों में भी नहीं ,

कभी जवाब थे हम ,

अब सवालों में भी नहीं ।


कभी सुबह होती थी हमसे ,

और हमसे ही रात ,

ग़म की वजह भी हम ,

और ख़ुशियों की सौग़ात ।


आख़िरी दफ़ा टूट कर मुझसे ,

उनसे जुड़ने वो जा रहे है ,

हम हैं ख़फ़ा ज़िंदगी से ,

और वो मुस्कुरा रहे है ।

Saturday, July 25, 2020

ख़ुशनसीब

मैं ख़ुशनसीब हूँ आज मालूम पड़ा ,
जब मौत चौखट पर थी आ खड़ी ,
जाने की बेला अब थी पास आ रही ,
ज़िंदगी से कही दूर मुझे ले जा रही । 

बस पलट कर देखा उन चेहरों को ,
बग़ैर मेरे कैसे वो मुस्कुराएँगे ,
छूट कर जब इन ज़ंजीरों से ,
हम किसी और शहर निकल जायेंगे ।

क्या मालूम है इन्हें भी ये सच ,
शायद हाँ , पर शायद बिलकुल नहीं ,
एक रोज़ मौत इनके भी चौखट पर आयेगी ,
छोड़ यादें , लम्हे , वादे संग इन्हें ले जायेगी ।

क्या ये चेहरे तब भी यूँ मुरझाये होते ,
आँखों में आँसु , दिल में दर्द दबाये होते ,
मैं तो ख़ुश हुँ मेरे जाने का ऐलान हुआ है ,
बेवक्त नहीं कोई आख़िरी फ़रमान सुना है ।

वरना कहाँ मौत बता कर ,
ऐसे चौखट पर आती है ,
ना सुनती कोई कहानी ,ना वक़्त दे पाती है ।
बस एक पल में लेकर रूह ,कहीं गुम हो जाती है ।।

मैं ख़ुशनसीब हु आज मालूम पड़ा ..!!

Tuesday, July 21, 2020

शोर

मालूम नहीं ज़िंदगी को , मंज़ूर क्या ,
पर कुछ तो , ख़ाली ख़ाली सा लग रहा ,
रात के अंधेरे में , चमकते थे जुगनू कभी ,
अब हर ओर अँधेरा बस रहा । 

पास हैं सब मेरे दिल और जज़्बात के ,
फिर भी कुछ , कमी सी लग रही ,
ख़ामोशी और अंधेरे में ,
जल्दी आने की ,जंग चल रही  ।

वक़्त भी हर रोज़ ,एक सा ही गुज़र रहा ,
कभी मुस्कुरा , कभी गुम रहा ,
मालूम नहीं इतनी क्या है उलझन ,
जो कभी दिल सहम , तो कभी ठिठुर रहा ।

ख़्यालों मे शोर इतना की , सब सुनाई देता है ,
बेवजह ही अक्सर , वो रास्ते मोड़ लेता है ,
ना होती कोई मंज़िल , ना कोई मुसाफ़िर ,
फिर भी अनजान रास्तों पर , चल देता है ।

ना होता पता मंज़िल का ,
और ना ही होता है कोई ठिकाना ,
लोगों से भरा ये शहर ,
लगता है ना जाने क्यूँ वीराना .. अनजाना ।।

Monday, July 20, 2020

हिचकी

मुझसे जुड़ी एक ज़िंदगी ,
और भी है साथ मेरे ,
छिपते छिपाते चलते मेरे अपने ,
है जो हर पल खुलेआम पास मेरे ।

कभी वो ज़िंदगी रंगो में उलझ जाती ,
कभी वो ख़्वाबों के टूटने पर बिखर जाती ,
कभी तुम्हें मंज़ूर नहीं होती वो साथ मेरे ,
कौन बताये ,
ज़िंदगी भर वो रहेगी थामे हाथ मेरे ।

क्या दिल भी देखता है कोई ,
दिल लगाने के लिये ,
ज़िंदगी भर साथ निभाने के लिए ,
संग मेरे ,
मेरी ज़िंदगी को भी अपनाने के लिए ।

माना की आसान नहीं होता सफ़र ,
तीन जिंदगियों का हर बार ,
पर क्यूँ भूल जाती है ये दुनिया ,
इश्क़ है सबका आधार । 

मुझमे है कमी बस इतनी सी ,
और इतनी सी ही है ताक़त ,
हो मंज़ूर तो ले चलो साथ ,
ना कोई हिचकी ना कोई आफ़त ।

मुझसे जुड़ी है एक और ज़िंदगी ,
ज़िंदगी भर के लिये ।।