Monday, December 7, 2020
दिल नहीं करता
Wednesday, November 11, 2020
अजनबी
Saturday, October 31, 2020
फ़िक्र
कभी दूर हो कर भी साथ होते थे ,
हाथो में थामे हर पल हाथ होते थे ,
होती थी लम्बी लम्बी बाते ,
छोटे छोटे ख्वाब होते थे।
निगाहे तो मिलती थी नहीं ,
अलफ़ाज़ भी लिख कर जाते थे ,
लिखी दास्तने दिल की बातो को ,
अपने लबों से वो पढ़ पाते थे।
दौर बदला बदली मोहब्बत ,
साथ होना पास होना और बाबू सोना ,
वक़्त के साथ इश्क़ और उसकी वजह ,
दोनों बदल जाते है ,
इस झूठे सच को ,
छोड़ हमें सब मान जाते है।
बुनते नहीं कोई ख्वाब अब ,
और ना ही इश्क़ में फ़ना हो पाते है ,
सच्चा समझ आज के इश्क़ को ,
कुछ वक़्त के बाद खुद उसे झुट्लाते है।
फ़िक्र होती मुझे उस रांझे की ,
जिसकी हीर कही खो गई ,
बदलते दौर में बदली नहीं मोहब्बत ,
बस उसकी मोहब्बत किसी और की हो गई।
Saturday, October 10, 2020
इश्क़ तो है
माना की इश्क़ में मुश्किलें है बहुत ,
पर करना भी ज़रूरी है ,
ख़ातिर रखने को किसी का दिल ,
किसी का तोड़ना भी ज़रूरी है ।
है एतबार इश्क़ पर उसके इतना ,
हम सब लूटा बैठे है ,
तोड़ कर अपनी ही ख़्वाहिशों को ,
उसकी ख़ुशियों को ही ख़्वाहिश बना बैठे है ।
ना रास्तों का पता ,ना ही कोई ठिकाना ,
अजनबी से लोग और दिल अंजाना ,
फिर भी पैरों के निशा तलाश कर ,
ढूँढ रहा दिल कोई अपना दीवाना ।
ग़ौर से ग़ैर को देख कर भी ,
नज़रें अक्सर लड़ा लिया करते है ,
अजनबी है बहुत महफ़िल में ,
अक्सर दिल चुरा लिया करते है ।
इश्क़ में उलझ कर हर एक दिल ,
किसी रोज़ क़ुर्बान होता है ,
किसी से होती है बेपनाह मोहब्बत ,
तो कोई इश्क़ बेवफ़ा , बदनाम होता है ।
इश्क़ तो हर दिल को होता ,
कभी हँसता कभी रोता है ।।
Thursday, September 24, 2020
कब्र
जो ना मिली होती दो गज़ ज़मीन ,
और मिट्टी की चादर ,
कही होते पड़े लावारिस ,
लिये जिस्म पर ज़ख़्मों के सागर ।
ना आया था कोई पहले मिलने ,
मेरे मिट्टी के ऊपर वाले कब्र में ,
था पड़ा सुनसान वो भी ,
ज़िंदा लाश के मरने के सब्र में ।
थी जान बाक़ी कुछ ,
और उम्मीद तेरे लौट आने की ,
अनगिनत दिये अंजाने ज़ख़्मों पर ,
मरहम लगाने की ।
ख़ैर मौत से पहले कब्र पर ,
कौन ही है आता ,
ज़िंदा पड़े अनगिनत क़ब्रों में ,
लाशों से कौन ही दिल लगाता ।
आज वो बैठी है मेरे कब्र के पास ,
भीगी पलकें और थोड़ी उदास ,
फेर रही वो ऊँगलियाँ कब्र पर ,
और फ़ुल के मरहम लगा रही ।
उसके इस अंजाने अन्दाज़ से ,
मानो ज़िंदा होने का दिल करता है ,
क्यूँ अक्सर ज़िंदा रहने पर ,
इतना प्यार नहीं मिलता है ।
अब मेरी रूह भी तुझ जैसे ,
किसी और जिस्म की जान हो गई ,
मेरे इस जिस्म से ,
वो भी अनजान हो गई ।
मेरी कब्र पर लौट कर फिर आना कभी ,
सिर रख कर सो जाना कभी ,
होगा मालूम शोर धड़कनो का ,
गर उन्हें सुन पाना कभी ।।
Sunday, September 20, 2020
बेहतर
बेहतर ही होता जो ना आते तुम ,
मुस्कुरा कर दिल ना चुराते तुम ,
ना ही होती कोई उम्मीद ख़ुद से ,
ना ही उसे फिर से तोड़ पाते तुम ।
पहली ही मुलाक़ात आख़िरी क्यूँ ना हुई ,
क्यूँ वक़्त ने फिरसे था मिलाया ,
दूर था हो मीलों मुझसे अब तक ,
फिर था ज़िंदगी के क़रीब आया ।
ना ही आँखों से अब होती बातें ,
ना ही हम उन्हें अब पढ़ पाते ,
ना ही बेताबी है मोहब्बत में ,
ना ही शिद्दत से उन्हें वो निभाते ।
मिल कर भी मीलों दूर खड़े है ,
जान कर भी अजनबी बने है ,
बेहतर ही होता जो ना मिलते ,
शायद यूँ ना हम कहते ।
ख़ैर इस ज़िंदगी का क्या अब ,
पर अगली ज़िंदगी बेहतर बनायेंगे ,
होगा शायद बेहतर ,
इस दफ़ा जो तुझे भूल जायेंगे ।
Wednesday, September 2, 2020
हद
ये जो इश्क़ है ना तुमसे ,
हद में नहीं हो पाता ,
यूँ बैठी हो जाकर दूर कही ,
कोई पता भी नहीं बताता ।
तेरी हँसी की हो गूँज ,
या निगाहें क़ातिलाना ,
कमबख़्त इश्क़ क्यूँ है ,
किसी हद से अनजाना ।
माना की मिलना हुआ नहीं ,
मिल कर भी कई बार ,
हद में थे नहीं कभी तुम ,
कभी हमारा प्यार ।
धड़कन ने भी कहाँ दिल से ,
हद में धड़काया करो ,
बेवजह ही नहीं अक्सर,
साथ छोड़ जाया करो ।
कैसी है जीद तेरी ,
और कैसा मेरा पागलपन ,
हद में रह कर करो मोहब्बत ,
ए जानेमन ।।
Saturday, August 29, 2020
महसूस
आज के इस अकेलेपन में ,
जब रिश्ते टूट रहे ,
मिल रहे कुछ नये पराये ,
और कुछ अपने पुराने छूट रहे ।
हर बदलते शाम के साथ ,
चाँद भी कुछ अनजान है ,
कभी चमकते जुगनू ,
कभी तारों से रोशन होता आसमान है ।
रात हो अँधेरी, या ,
हो उजालों का पहेरा ,
एक ख़ूबसूरत ख़्वाब ,
होता एहसास और गहरा ।
जुगनु ,
मीलों दूर कहीं खो गये तुम ,
दिन के उजाले में सो गये तुम ।
बस इस उजाले और अँधेरे में ,
उलझे हुए लाखों जज़्बात है ,
महसूस होती मौजूदगी जिसकी ,
वो धरती और मैं आकाश हैं ।
Friday, August 14, 2020
क़रीब
मोहब्बत हो ग़ैर की तुम ,
तुम मेरी मोहब्बत हो ,
शाम हो अंधेरी सी तुम ,
मेरी जुगनुओं सी मोहब्बत हो ।
समझना नहीं आसान तुमको ,
तुमको समझाना है नामुमकिन ,
मोहब्बत की फ़रियाद लिये बैठी तुम ,
और गिनते हम हर गुज़रता दिन ।
कभी हम पास , कभी तुम दूर ,
कभी हो वजह , कभी नामंज़ूर ,
कभी वो लम्हे , कभी तेरी यादें ,
कभी तेरे वादे , कभी हम आधे ।
तेरी ख़ुशबू हो या तेरा एहसास ,
तेरी तिरछी निगाहे या बेहद पास ,
तेरा हँसना या हँसाना ,
मुश्किल है , पर , है तो निभाना ।
क़रीब तेरे जिस्म के नहीं ,
तेरी रूह के पास आना है ,
बेवजह ही सही ,
पर हर मर्ज़ की दवा बन जाना है ।
माना की मुश्किल होगी समझने में ,
पर समझ कर दिखाओ ,
क़रीब हो कर भी होते है दूर जो ,
हाले दिल कभी उनसे पुछ आओ ।
मोहब्बत है कोई और तुम्हारा ,
मोहब्बत हो मेरी तुम ,
हो कर भी एहसास क़रीब दिल के ,
धड़कने है गुमसुम ।।
Saturday, August 8, 2020
ख़फ़ा
तेरी हँसी मे बसी ख़ुशी ,
और आँखों में ग़म ,
मंज़र है बिछड़ने का आज ,
और वक़्त है काफ़ी कम ।
अनगिनत सवाल और चंद जवाब ,
अधूरे ख़्वाब और अल्फ़ाज़ ,
कैसा साज कैसा राज़ ,
चंद लम्हों का अधूरा साथ ।
इतने बरसात के बाद भी ,
क्यूँ इश्क़ में भीग नहीं पाये ,
मानो मिलने के लिये नहीं ,
बिछड़ने के लिये हर बार पास आयें ।
क्यूँकि अब तय है सफ़र ,
और मंज़िल भी बेहद पास है ,
दूर होते हम और हमारी यादें ,
शायद अंत का ये आग़ाज़ है ।
कभी हर लम्हे में थे हम ,
आज ख़्यालों में भी नहीं ,
कभी जवाब थे हम ,
अब सवालों में भी नहीं ।
कभी सुबह होती थी हमसे ,
और हमसे ही रात ,
ग़म की वजह भी हम ,
और ख़ुशियों की सौग़ात ।
आख़िरी दफ़ा टूट कर मुझसे ,
उनसे जुड़ने वो जा रहे है ,
हम हैं ख़फ़ा ज़िंदगी से ,
और वो मुस्कुरा रहे है ।