Sunday, April 4, 2021

जिंदगी और मौत

जिंदगी और मौत 


दिन था शनिवार और आज सुबह काफी पहले हो गई थी शायद 5 बजे से भी पहले और चांद धीरे धीरे आसमां में कही गुम हो रहा था । राहुल रोज की तरह आज भी सुबह सुबह उठ कर नाश्ता बना कर अपने ऑफिस के लिए निकल ही रहा था की अचानक ... उसकी नजर उसके फटे हुए चप्पल पर पड़ी .. जो कभी भी उसका साथ छोड़ने वाली थी । 


राहुल सोचने लगा आखिर आज ये हो क्या रहा है .. पहले सुबह का जल्दी आना और अब ये चप्पल , अभी तो आधे हिंदुस्तान ने जगना भी नहीं शुरू किया होगा , मैं मोची कहा से ढूंढ कर लेकर आऊ ।।


बहुत ही थक हार कर उसने फैसला किया की आज वो इन्हीं चपल्लो में ऑफिस जायेगा । जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहा था वैसे वैसे उसकी चप्पल कमजोर पड़ रही थी लेकिन जैसे तैसे वो 7 बजे तक अपने ऑफिस पहुंच गया । 


उस एक घंटे के सफर में अनगिनत सवाल और टूटने के डर ने ... उसे उसके चप्पल में ही उलझा कर रखा था और इसी भागम भाग में वो अपना नाश्ता घर पर ही भूल आया था और तो और स्वभाव से बेहद ही कंजूस राहुल किसी भी हाल में अब बाहर से तो लंच मंगाने ही वाला नहीं था ऐसे में वो अपने लंच के उम्मीद में अपने टूटे चपल्ल के साथ फ्लोर पर इधर से उधर , उधर से उधर ठहलने लगा की तभी उसकी निगाह फ्लोर के कोने में फाइनेंस डिपार्टमेंट की नई इंटर्न श्रेया पर पड़ी ( जो की उस पीले सूट में एक दम परी मालूम पड़ रही थी ) जो कभी किबोर्ड पर हाथ मार रही थी तो कभी लैपटॉप के स्क्रीन पर । दिल से बेहद मासूम राहुल बिना अपने टूटे चपल्लो की परवाह किए हुए दौड़ पड़ा .... जैसे लगा हो श्रेया लैपटॉप को नहीं खुद को ज़ख्म दे रही हो ।


सुबह के करीब 8 बज चुके थे और अभी भी कुछ चुनिंदा "मजबूर मजदूरों" को छोड़ कर पुरा ही फ्लोर खाली पड़ा था ऐसे में राहुल तो वहा तक पहुंचने में सिर्फ कुछ 2 ही मिनट  लगे । 


डू यू नीड एनी हेल्प ( क्या आप को किसी मदद की आवश्यता है ऐसा राहुल ने पूछा ) .. श्रेया ने बेहद ही हैरान निगाहों से पहले तो राहुल की तरफ देखा और फिर अचानक से कुर्सी छोड़ कर खड़ी हो गई । बोली नहीं सर कोई प्राब्लम नहीं है मैने आईटी में फोन कर के बोल दिया है और बस कोई ना कोई आने ही वाला होगा । "थैंक्स फॉर योर कंसर्न" 


जिस तरीके से उसकी आंखे चसमे के ऊपर वाले हिस्से से राहुल को देख रही थी उससे राहुल को एक बात तो समझ में आ गई थी की उसके इस कदम से श्रेया बिल्कुल खुश नहीं है .... ऐसे में उसने ना आओ देखा जा ताओ झट से मुस्कुरा कर पलटा की अचानक तभी पीछे से आवाज आई एक्सक्यूज मी सर .. ऐसा लगा मानो आज के सुबह के जल्दी आने की , चप्पल के टूट जाने की और लंच बॉक्स के छूट जाने की वजह मिल गई हो । खुद को संभालते हुए और बेहद ही एटीट्यूड वाले भाव में बोला "यस टेल मी" , श्रेया बोली सर क्या कोई और सिस्टम मिल सकता है मुझे क्लाइंट को बहुत ही अर्जेंट मेल करना है ।


राहुल के चेहरे की चमक एक अलग ही कहानी बयां कर रही थी उसने थोड़ा रुक कर बोला हां बिलकुल ( उंगलियों से इशारा करते हुए ) तुम मेरा सिस्टम यूज कर सकती हो । 


जैसे जैसे श्रेया आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे राहुल के कदम और तेज़ी से उन टूटे चपल्लो की बिना परवाह किए साथ साथ बढ़ रहे थे और आखिरकार श्रेया ने आसानी से अपना काम खत्म किया और वापिस अपने वर्क प्लेस पर चली गई लेकिन राहुल मानो एक अलग दुनिया में जा चुका था ।


दोपहर के कुछ 1:30 बजे होंगे और अब वक्त था लंच ब्रेक का .. हर कोई व्यस्त था अपने अपने गैंग के साथ खाने खाने में और अगर कोई खाली बैठा था तो वो था राहुल ... की तभी अचानक से कही बहुत दूर से आवाज आई सर क्या हुआ लंच नहीं कर रहे आप ... नहीं भूख नहीं है और तुमने क्यों नहीं किया इधर से राहुल ने बेहद ही सहमी आवाज़ में बोला .. बस सर मैं डाइट पर हू बाकी would you mind if I ask you to join me for a cup of tea ... राहुल ने बोला श्योर और उसके बाद वो दौड़ पड़ा ।।


जब दोनों बाहर चाय पी रहे थे तभी अचानक श्रेया की नजर राहुल के टूट चुके चपल्लो पर पड़ी और बोली सर ये कैसे टूट गई है और खिलखिला कर हंसने लगी .. उसकी हसी के साथ उम्मीद को जिंदगी मिली और श्रेया के पीछे दौड़ते हुए पहले से ही टूटे हुए चप्पल को मौत .. क्या लगता है राहुल इस मिली जिंदगी से खुश होगा या अब तक साथ निभाने वाले चप्पल के मौत से दुःखी ।। बताइएगा जरूर 

Tuesday, March 30, 2021

कुछ कहना है


हाथ थामा था उस रोज ,
छोड़ने के लिए नहीं ,
कुछ पल में ही ,
रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं ।

माना की हद से बेहद ,
गुजर रहे थे हम ,
अल्फाजों में उलझ कर ,
कुछ बहक रहे थे हम ।

आंखों में थे अनगिनत सवाल ,
और तुम जवाब दिए जा रहे थे ,
हम भी उन्हें पढ़ कर ,
और सवाल किए जा रहे थे ।

था यकीनन वो लम्हा सबसे खूबसूरत ,
गुजरते रात के बाद का चमकता सूरज ,
फिर भी हम चांद तारों में थे उलझे ,
हमारे जज़्बात कहा थे अब सुलझे ।

पर वो लम्हा आखिरी होगा ,
ऐसा कभी सोचा ना था ,
तेरी मौजूदगी को तरस कर ,
पहले कभी खुद को .. ऐसे कोसा ना था ।

भरने को आए थे ज़ख्म ,
और घाव दे गए , 
अंजाने में ही सही ,
हम गुनाह कर गए ।

पर अब भी कुछ कहना है ,
तेरी हसी ही तेरा गहना है ,
आंखो में है नूर गजब का ,
देखते जिनमें हमें रहना है ।

लौट आओ एक आखिरी दफा ,
अभी बहुत कुछ कहना है ।।

Monday, March 29, 2021

खुद से बात

मेरे इस बदलाव से ,
मेरा ही नुकसान होगा ,
शायद ये वो नहीं ,
जो मेरा आखिरी मुकाम होगा ।

किसी की खुशियों के जिद्द मे ,
खुद को नीलाम कर आओ ,
ऐसे तो नहीं थे तुम ,
वक्त है .. अपनी दुनिया मे लौट आओ ।

पहली नजर पहला एहसास ,
लगी खूबसूरत और खास ,
क्या पता सब एक तरफा था ,
उसके खुशियों के लिए ,
जो वो इतना तरसा था ।

चंद लम्हों में कैसे कोई इतना ,
करीब आ जाता है ,
वही चंद लम्हों में ही ,
बहुत दूर चला जाता है ।

गर सफर लंबा और ,
खुबसूरत हो सकता था ,
अंजाने में हुई गलतियों को ,
वो माफ कर सकता था ।

पर जब जरूरत ही नहीं ,
उसे तुम्हारे मौजूदगी की ,
क्यों उसे अपनी मौजूदगी जता रहे हो ,
सुनसान रास्तों पर उसे ढूंढते जा रहे हो ।

तुम्हारे हिस्से में गर लिखी है खुशी ,
एक रोज मिल जायेगी ,
मत लगाओ उन रास्तों पर फरियाद ,
जहां वो कुछ नहीं सुन पायेगी ।

शायद मैंने ही कुछ जादे ,
सोच लिया था ,
बेवजह ही किसी गैर के ज़ख्म का ,
दिल पे बोझ लिया था ।

वक्त लगेगा जरूर खुद को मानने में ,
तेरी तस्वीर झुटलाने में ,
पर कोई तो होगा .. कही जरूर ,
बेवजह ही मेरा साथ निभाने मे ।

Sunday, March 28, 2021

अजनबी


मेरे शब्द खाली पड़ गए थे ,
उस रोज जब तुम सामने आ खड़े थे ,
था यकीनन एहसास बहुत खूबसूरत ,
जब आंखों से ही हम सब पढ़ रहे थे ।

पहली दफा लगा था डर मुझे ,
शब्दों को सजाने में ,
थी मुश्किल तेरी खुबसूरती को ,
अल्फाजों में बताने में ।

मैं खो गया था चंद लम्हों के लिए,
और गुनाह कर बैठा ,
माना था इशारा खुदा का जिसे ,
उसे जुदा कर बैठा ।

उसकी आंखों का रंग ,
या हो गालों पर तिल ,
खूबसूरती हर अदा में उसके झलकती होगी,
शायद लगती होगी वो और भी  खूबसूरत ,
जब पैरों में पायल खनकती होगी ।

मैंने जैसा मांगा था खुदा से इनायत ,
वो जानशीन हुबहू वैसी है ,
लगा जरूर वक्त मुझे ये बताने में ,
आखिर ये मजबूरियां , दूरियां कैसी हैं ।

सूरत से खूबसूरत सीरत जिसकी ,
और क्या हमें चाहिए ,
एक दफा हो सके तो ,
लौट आइए ।

अजनबी ही सही .. 
उनकी मौजूदगी काफी है ।।

Saturday, March 27, 2021

इत्तेफाक

उस रोज बजी दरवाजे की घंटी ,

सब बदलने वाला था ,

उसकी पहली झलक के बाद ,

दिल मचलने वाला था ।


वो बातें लंबी होती गई ,

और वक्त छोटा पड़ गया ,

बड़ी मुश्किल से टूटा सफर ,

जब कोई और उसे मिल गया ।


पहली ही मुलाकात में ,

वो हमें सब कुछ बता गए ,

कुछ वक्त भी मांगा उन्होंने .. कभी कभी ,

और हम झुठला गए ।


कैसा है ये सफरनामा ,

क्या है इसका मुकाम ,

जो भी बीता वक्त साथ में ,

यकीनन खूबसूरत बहुत है वो "इंसान"। 


बिन कुछ कहे उसके ,

हम सब जान गए ,

पहली ही मुलाकात में ,

हम पहचान गए ।


पर कर बैठे गलती उसे खो देने की ,

एक रोज अंजाने में ,

शायद था सफर इतना सा ही ,

हमारे जिंदा रह जाने में ।


रंग भी एक आंखो का ,

ढंग भी एक बातों का ,

आखिर कैसा ये इतेफाक है ,

अजनबी हो कर भी लगता ख़ास है ।


कैसे उसको मैं इतना जान गया ,

कैसे इतना पहचान गया ,

जवाब अब भी अधूरा है ,

शायद वक्त करे जिसे पूरा है ।।

Thursday, March 25, 2021

अलविदा

गर आंखे होती है सच्ची ,
तो सच ही देखा होगा ,
खूबसूरती छिपी निगाहो में उनके ,
सब ने देखा होगा ।

पर देखा जो हमने ,
वो मोती के आंसू थे ,
गाल लाल और सिसकियों से ,
लगते वो खूबसूरत काफी थे ।

है मासूम वो ,
या हम गलतफहमी पाले बैठे है ,
ये तो वक्त बतायेगा ,
पर बेवजह अब मोती ,
आंखों से नहीं बहने को आयेगा ।

कब कैसे और क्यों शुरू हुआ ,
मुश्किल है ये बता पाना ,
अजनबी बेशक हैं हम आज भी ,
कल क्या हो किसने जाना ।

खत्म होना ही लिखा है गर नसीब में,
हमे ये भी मंजूर है ,
बहते मोती हमें मुबारक ,
तेरा ना कोई कसूर है ।

गर नहीं हो तुम मेरी तकदीर में ,
हम यकीनन लौट जायेगा ,
वादा है  ,
मेरी आंखे से अब मोती ,
आप बहा ना पाएंगे  ।

यकीनन हम दूर बहुत दूर ,
वक्त के साथ चले जायेंगे ,
लौट कर शायद फिर कभी ,
हम ना आ पायेंगे ,
दूर बहुत दूर चले जायेंगे ।

अलविदा

Wednesday, March 24, 2021

खता


वो शाम आई ही क्यों ,
जब अंधेरे में उसे गुम होना था ,
उसे कुछ हद तक पहचान ही क्यों ,
जब कुछ पल में ही अंजान होना था ।

चंद रोज और अनगिनत लम्हें ,
हम बेहद बदल रहे थे ,
लगा नहीं हम , हम थे ,
शायद अब संभल रहे थे ।

नज़र हटाना तस्वीर से जिसके ,
मुश्किल हो चला था ,
खुशियों से संवारने की थी जिद्द जिसे ,
वो खफा कर चला था ।

बिछड़ने का गम नहीं ,
क्योंकि था वो कोई हमदम नहीं ,
गम हैं उसके बेवजह रूठ जाने का ,
अंजाने में ही सही .. दिल दुखाने का ।

अनगिनत सवाल अब भी ,
अपने जवाब तलाश रहे है ,
कुछ तो हुई है यकीनन खता ,
वो बिन कुछ कहे दूर जा रहे हैं ।

खैर,

कोई अपना तो ऐसे जाता नहीं ,
जैसे तुम गए हो ,
एक झटके में ही सब तोड़ कर ,
बेवजह मुंह मोड़ गए हो ।।

Tuesday, March 23, 2021

एकतरफा


यकीनन पहली दफा तो ,
ये मुलाकात ना थी ,
कुछ सच्ची कुछ झूठी ,
जिसमे बात ना थी ।

था तो बस कुछ वक्त ,
और अनगिनत सवाल ,
जो अधूरा ही रह गया ,
जिस पल वो ... खामोशी से कुछ कह गया ।

मैंने सुना भी सिद्दत से उसे ,
और सच भी बयां हो गया ,
जो पहली दफा में ही ना जाने कैसे ,
अजनबी ना रह गया ।

क्यों जिद है उसको अब हंसाने की ,
खुशियां झोली में उसके ... अनगिनत दे आने की ,
हैं तो बहुत "अपने" उसके जो उसे हंसाते है ,
ना जाने क्यों फिर भी हम "खुश" रहने की फरियाद लगाते है ।

अक्सर छोड़ कर अधूरे में ,
रात के अंधेरे में ,
चांद तारों के संग .. वो छोड़ जाते है ,
बिन कुछ कहे .. मुंह मोड़ जाते है ।

माना की हु नहीं कोई अपना ,
और गैर सा तुम बनाते हो ,
अधूरे में ना जाने क्यों छोड़ ,
जब अक्सर चले जाते हो ।

कहना था कुछ तुमसे ,
पर शब्द नहीं है ,
उलझ रहा मैं एहसासों के जाल में,
शायद अब सच यही है ।

गर है तो ऐसा क्यों है ,
है तो आखिर वो "अजनबी" है !!

Sunday, March 21, 2021

अधूरा

कुछ खत्म हुए कहानियां की शुरुआत हो तुम ,
अधूरे उलझे और उजड़े जज्बातों की सौगात हो तुम ,
हो बेशक बेखबर कल के सुनहरे मौसम से ,
आज शाम के आंधी के बाद की बरसात हो तुम l

हो तुम अंजान बेशक आज मुझसे ,
पर खुद से तो हर रोज अंजान हो ,
पहचानना मुश्किल है नहीं तुमको ,
पर तुम खुद लिए हो अपनी ,
अधूरी पहचान हो l

सपनों में जीने की आदत लिए ,
नींद से बेहद दूर हो तुम ,
ख्वाबों में सजाए उम्मीदों की ,
पोटली के संग ... मजबूर हो तुम ।

सिर्फ दिल ही नहीं धड़कन भी अब ,
धड़कना छोड़ने लगे थे ,
जिस रोज बिखरते ख्वाबों से ,
तुम मुंह फेरने लगे थे l

तुम पल को चुरा लो कुछ पल के लिए ,
ये पल हर पल मुमकिन नहीं ,
जज्बातों में उलझी तुम हो खुद ,
कोई और निकाले बेवजह ... ये मुमकिन नहीं ।

आइना है गर मौजूद सामने ,
एक दफा निहार आओ ,
श्रंगार जो है अधूरा अब तक ,
लाकर होठों पर हसीं और आंखों में चमक ,
उसे पूरा कर जाओ ।

जाओ बेशक लौट कर जहा जाना है ,
बेवजह ही नहीं खुद को अब सताना है ,
है लिखी खुशिया जिंदगी में गर ,
तो मुस्कुराओ ... मुस्कुराओ !!

Monday, March 1, 2021

उलझन

क्यों बहाना आसूं , 
जब रक्त बह रहा है ,
क्यों ठहेरना एक पल में ,
जब वक्त चल रहा है ।

हर सुबह के बाद शाम भी है ,
खुशियों के कीमत का दाम भी है ,
है गम बेचने वाले भी मौजूद ,
क्योंकि उसके खरीदार भी है ।

थाम लो एक दफा वक्त को कैद में ,
शायद पल भी ठहर जाए ,
खूबसूरत हो लम्हा तो अच्छा ,
वरना शायद वो पल ही वजह बन जाए ।

उलझन लिए नज़रे चुरा रहे है ,
जान कर भी अजनबी बने जा रहे है ,
गर हो उम्मीद कायम खुद में खो जाने की ,
तो गुमनामी से क्यों घबरा रहे है ।

वक्त के साथ सब धूल जायेगा ,
यादों में भी जिक्र ना हो पायेगा ,
बेहतर है अभी मुस्कुरा लेते है ,
कुछ पल ही खुद में खो जाते है ।

Monday, February 15, 2021

मोहब्बत ही तो है

आज शाम के इस अंधरे में भी ,
है उजाला जुगनू के मौजदगी से ,
खुश हूं बहुत यकीनन मैं आज ,
जगमगाते इस रोशनी से ।

है भरोसा कल फिर सुबह होगी ,
रोशनी हर जगह होगी ,
होगी एक उम्मीद तेरे हो जाने की ,
ज़िन्दगी भर साथ निभाने की ।

बदल रहा मौसम और मिज़ाज ,
बड़ रही नज़दीकियों में दूरियां ,
और अनगिनत मजबूरियां ।

तेरे हर ना को हां समझ लेना भूल थी ,
मुस्कुराहट पर टिकी ज़िन्दगी बेफिजूल थी ,
थी नहीं सच्ची गर मोहब्बत मेरी ,
तो शिद्दत से निभाने को क्यों वो मजबूर थी ।

खैर खो कर भी पा लिया ,
मोहबब्त का एक एहसास ,
बिछड़ते रिश्तों में किसी और के ,
आने की लिए आस ।

याद रहे बस इतनी सी बात ...
मोहब्बत ही तो है ,
फिरसे हो जायेगी ,
इस दफा तुम तो अगली दफा कोई और ,
दिल में बस जायेगी ।

मोहब्बत ही तो है ,
फिरसे हो जायेगी ।।

Sunday, February 7, 2021

पहला प्यार

पहली बार मिला जो तुमसे ,

पहली मोहब्बत कर बैठा ,

पहली निगाहों के मिलते ही ,

दिल तुझको दे बैठा ।


लगा था वक्त बहुत बेशक मुझे ,

पर आज भी वो मुलाकात याद है ,

अनगिनत पूछे सवालों के,

रखे जवाब आज भी साथ है ।


वो नन्हा सा दिल जब से धड़का था ,

तुझे मैं हर पल देखता रहता था ,

ना थी वो उम्र दिल लगाने की ,

ना ही तुझमें डूब जाने की ।


पर डूबता गया मैं ,

गुजरते वक्त के साथ ,

कभी भरी मांग मैंने ,

कभी मांगा तेरा हाथ ।


यकीनन हां के इंतज़ार में ,

वक्त गुजरता चला गया ,

मुरझाते फूल को बगिया में ,

मानो जैसे माली छोड़ गया ।


तुम हो गई किसी और की ,

और हम भी कहीं और दिल लगा बैठे ,

पहली ही हो आख़िरी मोहब्बत ,

ये सच हम दोनों झूठला बैठें ।।

Monday, February 1, 2021

मजबूर

है अनगिनत सवाल जिसके ,
मालूम नहीं जवाब उसके ,
फिर भी मुस्कुराती है ,
मजबूर है जरूर लेकिन नहीं दिखती है ।

ख्वाबों का लिए गुलदस्ता ,
और वक्त से मुरझाते फूल ,
नहीं जान पाता कोई ,
आखिर क्यों है वो मजबूर ।

दिल में बस जाना या दिल में बसाना ,
है मुमकिन बहुत और आसान ,
गर देख ले कोई उसकी निगाहों में  ,
मजबूरी में भी मुस्कुराती है वो बेजान ।

खूबसूरत जो बनाना जानती है ,
लम्हों को सजाना जानती है ,
जानती है ख्वाइशों को करना पूरा ,
फिर भी रह जाता हैं कुछ अधूरा ।

मजबूर है या है कोई मजबूरी ,
खुशियों से क्यों है मीलों दूरी ,
गर मिल जाए जवाब बता जाना ,
मजबूरी ना हो तो ,
एक पल के लिए ही सही .. मुस्कुराना ।।