Saturday, July 31, 2021

चंद अल्फाज़

दिल कह रहा अब तो कह दो ,
उनसे जो कहनी है बात ,
अधुरा रह नहीं गया दर्मियां कुछ ,
सिवाए वो चंद अल्फाज़ ।

देखा आज सुकून से ,
तुम्हें पहली बार ,
बिखरी जुल्फे और कातिल निगाहें ,
गया मैं सब हार ।

होठों पर बसी मुस्कराहट उनके , 
मानों मेरा हाले दिल बता रही हों ,
मेरे धडकनों के शोर को ,
जो जोर से बढ़ा रही हों ।

पलके जितनी दफा झुका कर ,
वो निगाहों को छिपा रही थी ,
हाले दिल निगाहों से ,
मुझे बता रही थीं । 

रुक रुक कर वो अल्फाज़ ,
जो दिल से जुबां पर आ रहे थे ,
बहुत सोच सोच कर ,
उन अल्फाजों को वो सजा रहे थे ।

कुछ था गर गैरमौजूद  ,
उस लम्हें में हमारे ,
तो वो उनके माथे की बिंदिया थी ,
और मेरे आंखो की निंदिया थी ।

कितना मुश्किल है ,
इस एहसास को बता पाना ,
तेरा हो कर भी ,
"पराया" हो जाना ।

काश मैं सौदागर होता शब्दों का ,
कुछ चुरा कर शब्द ले आता ,
पिरो कर माला जिसकी ,
तुझसे वो चंद अल्फाज़ कह जाता ।।

Friday, July 30, 2021

किसी और से मोहबब्त

तुम्हें जल्दी है ना ,
मेरा किसी और के हो जाने की, 
वक्त के साथ मेरे हर कहे को ,
खुद से झुटलाने की ।

तुम लिखो अपने इश्क़ की ,
एक और नई कहानी ,
वक्त आने पर रखना यकीन ,
हम सुनाएंगे जिसे अपनी जुबानी ।

मैं गया कई दफा दूर तुमसे ,
दिल किसी और से लगाने को ,
छोड़ कर इश्क़ तेरे हिस्से का ,
किसी और से निभाने को ।

पर ना दिल लगा किसी से ,
और ना तेरा जिक्र छूटा ,
मेरे इस अंदाज से ,
ना जाने कितनों का दिल टूटा  ।

तुम अपना इश्क़ ,
उनसे ही शिद्दत से निभाओ ,
हो सके तो उन्हीं के ,
दिल में बस जाओ ।

वक्त के साथ ,
हर जवाब मिल जायेगा ,
जब किसी रोज़ ,
वो मुझसे टकराएगा ।

खुद तो बिखरा ही होगा ,
मुझे भी अधूरा पायेगा ,
हो जाओ किसी और का ,
शायद फिर ना कह पायेगा ।

इजाज़त

इजाज़त है क्या मुझे ,
तुमसे इश्क़ करने की ,
हर रोज तुम पर ,
इतने ही शिद्दत से मरने की ।

जिक्र में हर पल हो तुम मेरे ,
और हमें क्या चाहिए ,
गर हो इजाजत इश्क की ,
तो बताइए ।

मैं कैसे कहूं शब्दों को सजा कर ,
खुद को सौदागर बना कर ,
इश्क़ में हो कर भी ,
इश्क़ को झूठला कर ।

हर पल हर दफा ,
जब कभी जिक्र में ,
तुम मेरे आ जाती हो ,
इश्क़ के मायने बदल जाती हो ।

आज भी और कल भी ,
मैं कुछ ऐसा ही रहूंगा ,
गर मिल गई इजाज़त ,
तो मोहबब्त करूंगा ।

वैसे भी वक्त है बहुत ,
अभी तेरा हो जाने में ,
बेवजह ही सही ,
मोहब्बत को निभाने में ।

इश्क़

वो मेरे इश्क़ में ,
हम तेरे इश्क़ में ,
तू उनके इश्क़ में ,
जो किसी और के इश्क़ में ।

इश्क़ में हम अधूरे ,
इश्क़ में कौन से तुम पूरे ,
इश्क़ में मैंने खोया ,
इश्क़ में तू भी तो रोया ।

इश्क़ में कौन किसके ,
इश्क़ में किसका कौन ,
इश्क़ ही बताएगा ,
इश्क़ कौन किससे निभायेगा ।

इश्क़ में कहीं शोर भी ,
इश्क में कहीं खामोशी ,
इश्क़ में कहीं आरोप भी ,
इश्क़ में कहीं आरोपी ।

इश्क़ में तन्हाई भी  ,
इश्क़ में जुदाई भी  ,
इश्क़ में रुसवाई भी  ,
इश्क में सुनवाई भी ।

इश्क़ मुझे तेरे रूह से ,
इश्क़ तुझे उसके जिस्म से ,
इश्क़ मुझे तेरे इल्म से ,
इश्क़ तुझे उसके जुल्म से ।

इश्क़ में कोई सब लूटा देता ,
इश्क़ में कोई सब लौटा देता ,
इश्क़ में कोई तुझमें खो जाता ,
इश्क़ ने कोई मुझ सा हो जाता ।

इश्क़ में कोई हमारा होता ,
इश्क़ में कोई तुम्हारा होता ,
इश्क़ किसी के पास होता है ,
इश्क़ किसी का खास होता ।

इश्क़ में मेरे दुआ हो तुम ,
इश्क़ में किसी के बद्दुआ हो तुम ,
इश्क़ में सदा हो तुम ,
इश्क़ में पर कहां हो तुम ।

इश्क़ में गर ना कोई गुनाह होता ,
इश्क़ में ना कोई खुदा होता ,
इश्क़ में ना कभी तू मेरा होता ,
इश्क़ में ना कभी वो तेरा होता ।।

इश्क़ ना होता .. तो क्या होता ।। 

नशा

जाम , शाम और तुम ,
तीनों ही महफ़िल में बैठा करते थे ,
नशा भी खुलेआम ,
उन दिनों हम क्या खूब किया करते थे ।

ज़ाम के लबों पर बसने से लेकर ,
तुम्हारे दिल में उतरने तक ,
शाम के गुजरने से ,
मेरे बिखरने तक ।

सब कुछ इश्क़ सा था मेरे लिए ,
और क्या गज़ब थी दीवानगी ,
खो जाऊ गर तुझमें  ,
हो जाती थी खूबसूरत शाम भी ।

पर एक रोज़ ,
शाम ने मुझे अंधेरे से मिलवाया ,
ना था जाम हाथों में ,
और ना तू कहीं नजर आया ।

लगा सब टूट कर बिखर गया हो ,
जैसे तू मुझसे मुंह फेर गया हो ,
अब जाम भी लबों पर यूं आता नहीं ,
हुआ क्या है क्यों कोई बताता नहीं ।

शाम को छोड़ कर ,
यहां सबका दाम लगता है ,
यूहीं अक्सर महफिलों में ,
सरेआम लगता है ।

भूल गया था नशे में मैं ,
तुम दोनों भी तो बिकते हो ,
अब तुम दोनों का नशा भी ,
बेहद आम लगता है ।

वक्त के साथ सब गुज़र गया ,
मोहब्बत मैं एक और दफा कर गया ,
पर इस दफा सिर्फ दिल्लगी है ,
नशे में पड़ने की अब किसे हड़बड़ी है ।

उदास

आज पहली दफा ,
उन आंखो को नम पाया ,
मुस्कुराहट उसके चहरे पर ,
कुछ कम पाया ।

आज वो महफिल में ,
अपना कल बता रही थी ,
पन्नों में सजे शब्दों को ,
पढ़ कर सुना रही थी ।

वो बीते पल और लम्हें ,
सब याद आ रहे थे ,
जब वो अपनी कहानी ,
दुनिया को सुना रहे थे ।

बस तभी जज़्बात बन कर आंसू ,
आंखो से उनके छलक आए ,
छोड़ गया था उनकी कहानी जो ,
उसे वो साथ ले आए ।

कितना वो तुम्हें जानता था ,
हर लम्हें को तुम्हारे पहचानता था ,
तुम्हारी जिंदगी के हर पहलू को ,
अल्फाजों में सवारता था ।

वो कहता था तुम्हे ,
हर पल खुल कर मुस्कुराओ ,
जीत कर हर जंग अपनी ,
दुनिया को दिखाओ ।


दिल में जिंदा है ताउम्र वो तुम्हारे ,
और पन्नों में जिंदा उसकी बाते ,
हो क्यों उदास इतना ,
क्या याद नहीं वो खूबसूरत मुलाकाते ।

मुस्कुराओ दिल खोल कर ,
वो भी संग तुम्हारे मुस्कुराएगा ,
जितनी दफा मुस्कुराते ,
तुमको वो पायेगा ।।

Thursday, July 29, 2021

इज़हार

दिन के आने से पहले ,
रात के गुजरने के बाद ,
बादलों में छिपे तारों के ,
रुक रुक कर टिमटिमाने के साथ ।

कुछ पल में ही ,
सब कुछ बदल गया ,
तारों से चांद ,
जब दिल की बात कह गया ।

ना अब कोई शोर है ,
और ना ही कोई बेकरारी ,
खुमारी और भी ,
चढ़ने लगी है अब तुम्हारी ।

कितना मुश्किल था तुमको बताना ,
हाले दिल इस कदर सुनाना ,
इश्क़ में होकर भी ,
इश्क को ना जताना ।

पर अब ना कोई पर्दा है ,
और ना ही कोई शिकायत ,
तुमसे नहीं खुबसुरत ,
खुदा की कोई और इनायत ।

तुम्हारे खुशियों से ही मेरी खुशियां ,
और तुम्हारे गम से मेरा गम ,
बात देना गर लगे किसी रोज़ ,
मेरी मौजूदगी थोड़ी भी कम ।

तुमको पाने की ख्वाईश नहीं ,
तुमको जीने का सुरूर है ,
इश्क़ दिल को है मेरे ,
इसमें मेरा क्या कसूर है ।

सब कुछ एक पल में ,
कैसे खूबसूरत बन जाता है ,
हर दफा जब हाले दिल ,
चांद तारों को सुनाता है ।।

Tuesday, July 27, 2021

जिल्लत

मत कर इतना भी गुनाह ,
जिसकी कोई माफी ना हो ,
क्या कम सहा है जुल्म उसने ,
जिंदगी भर भी मिले गम तुझे ,
तो काफी ना हो ।

देख जरा अपने कर्मों की सजा ,
आ रहा आज कितना मज़ा ,
तू हर रोज़ उसको रुलाता था ,
नोच कर जिस्म भी अक्सर खाता था ।

तेरे नशे को उसने होठों से लगाया ,
तेरे हर धब्बे को दुनिया से छिपाया ,
हाय रब्बा क्या क्या नहीं  ,
तूने था उससे करवाया ।

उसने सब कुछ छोड़ कर ,
बस तुझे संभाला था ,
इतने जुल्म और जिल्लत के बाद भी ,
बना रहा वो तेरा सहारा था ।

पर अब और सह पाना मुमकिन नहीं ,
फर्क नहीं पड़ता गर तू उसकी मंजिल नहीं ,
बस जो चाहिए उसे वो सुकून है ,
बगैर जिसके ये जिंदगी बेफिजूल है ।

देख जरा अब कितनी ,
वो कठोर हो गई ,
आई तेरे मौत की खबर ,
और वो भाव विभोर हो गई ।

वक्त ने वक्त के साथ ,
तुझे वही सिर्फ लौटाया ,
उस वक्त जो कुछ भी ,
उसके हिस्से तू था छोड़ आया ।

हर दर्द को भुला कर ,
अब वो मुस्कुराती है ,
जिंदगी के माईने को ,
जी कर दिखाती है ।

बिछड़ना

उससे बिछड़ने का अब डर सताता है ,
हर दफा जब वो दूर जाता है ,
क्या है सिर्फ दिल मे मेरे ही तस्वीर उसकी ,
या उसके भी दिल में मेरा जिक्र आता है ।

कल सा अब कुछ भी नहीं दर्मिया हमारे ,
दूरियां भी बढ़ चलीं है ,
खामोशियों के शोर ने ,
मानो कर दी कुछ हड़बड़ी है ।

है इश्क़ में बहुत उसके दीवाने ,
पर उसकी दीवानगी किस ओर है ,
खामोशी के इस मंजर में भी ,
कर रहा ये सवाल बहुत शोर है ।

कोई तो होगा मौजूद उसके भी दिल में ,
जो उसकी धड़कने बढ़ाता होगा ,
हर दफा जब कभी ,
जिक्र उसका आता होगा ।

तुमसे मिला ही क्यों मैं ,
जब इस कदर बिछड़ना था ,
होने लगी मोहब्बत को ,
अभी कुछ और वक्त अधूरा रहना था ।

खैर ये कहानी मेरी नहीं ,
तो आप ही बताइए ,
इश्क़ में भला इश्क़ के ,
सिवा और क्या चाहिए ।।

तुम आ जाओ

मुझे इस कदर छोड़ कर ,
बीच रास्ते मुंह मोड़ कर ,
तुम आखिर क्यों चले गए ,
बिन कुछ कहे अलविदा कह गए ।

मैं टूट कर अक्सर बिखर जाता हूं ,
हर दफा जब तुझमें खोने को आता हू,
तुम ना जाने क्यों इतनी जल्दी कर गई ,
जिस्म छोड़ रूह बन गई ।

तुम्हें मालूम भी नहीं ,
मैं कितना अक्सर तुझमें खो जाता हूं ,
हर दफा जब खुद को ,
बगैर तेरे कही पाता हु ।

चलो आज तुमसे वादा करते है ,
मोहब्बत नहीं अब आधा करते हैं ,
बिखर कर फिरसे जुड़ने की कोशिश , 
थोड़ी और जादा करते हैं ।

मेरी मुसकुराहट की वजह हो तुम ,
गम को भला क्यों सौंपी ,
होठों की हंसी हो तुम ,
आंखो की नमी इन्हें क्यों कह दू ।

आज अभी इस पल से ,
मैं सिर्फ तुम्हारा हूं ,
लिए तैयार यादों का पिटारा ,
जो ताउम्र बनेगा मेरा सहारा ,
बस तुम अब कभी दूर मत जाना ,
रूह हो रूह में मेरी बस जाना ।

मुस्कुराओ जरा और जोर से ,
मुझे तुम्हें दुनिया को सुनाना हैं ,
जिंदा हो जिक्र में मेरे हर पल ,
अमर जिसे बनाना है ।।

जश्न

थक हार कर बैठने लगा था मैं ,
और जीत नामुमकिन हो चली थी ,
थे मौजूद आप सब ,
और कुछ ऐसी ही महफिल सजी थी ।

उस रोज़ से बदला बहुत कुछ ,
बस आप आज भी वैसे ही हैं ,
हो रहे सपने सच मेरे अब ,
मानो वो भी बन रहे आप जैसे ही हैं ।

जश्न मेरे इस जीत की ,
मेरे अपने मना रहें ,
अब नहीं अकेला मैं ,
ये सब बता रहे ।

वक्त का शुक्रिया , 
आप का शुक्रिया ,
हौसला मेरा बढ़ाने को ,
हार कर भी जीत सकते हैं ,
हर दफा ये बताने को ।

शुक्रिया उनका भी ,
जो बीच रास्ते छोड़ गए ,
बेवजह ही मुंह मोड़ गए ।

आज के जश्न की वजह आप भी ,
क्योंकि ना होते हम अधूरे ,
और ना जीत से होते हम पूरे ।।

Sunday, July 25, 2021

ख़्वाब में तुम

आज पहली दफा मिल रहा था मैं ,

उनसे ख्वाबों में ,

उलझने लगा था ,

अपने ही पूछे सवालों में ।


मेरे लिए अब वो एक ख़्वाब सा,

बन कर रह गई थी ,

एक अरसा बीत गया था ,

जबसे वो खामोश रह रही थी ।


वो हुबहू तो बिलकुल वैसी थी ,

ख्यालों मे रहती जैसी थी ,

बस फर्क था उसकी आंखो के रंग में ,

और पराया कर जाने वाले ढंग में ।


आकर मेरे पास ,

वो कुछ पल सुकून से बैठी थी ,

ये बात ख्वाबों में भी ,

ख़्वाब के सच होने जैसी थी ।


पूछ बैठी एक और सवाल ,

मेरे थोड़ा और करीब आकर ,

दे दिया मैंने भी जवाब ,

गुजरते लम्हों में थोड़ा हिचकिचा कर ।


चांद तुम कब तक ऐसे ही ,

मेरा साथ निभाओगे ,

या उन अनगिनत तारों की तरह ,

गुजरते वक्त के साथ ,

मुझे भी छोड़ जाओगे ।


मैंने मुस्कुरा कर फिर से ,

उन्हें अपना हाले दिल सुनाया ,

जान कर मेरे जवाब को ,

वो भी थोड़ा मुस्कुराया ।


हर लम्हा हर एहसास ,

अब तक यूहीं जहन में ताजा है ,

बन बैठा तेरा और दीवाना ये दिल ,

जिस कदर मेरी मौजूदगी को ,

ख्वाबों में तुमने नवाजा है ।

तेरी खुशबू

पहली दफा जो देखा था उन्हें ,
तबसे ये सिलसिला शुरू हो गया ,
पहली ही नजर में ,
वो मेरा हो गया ।

आंखो से ना जाने क्या क्या ,
मैं हर बार कहता था ,
खामोशी से पलकों को झुका कर ,
वो ऐतबार करता था ।

उनकी खुसबु हर दफा मुझे ,
उनकी मौजूदगी बताती थी ,
मेरे पलकों की हड़बड़ी ,
उन्हें हाले दिल सुनाती थी ।

और वो भी इजहारे दिल ,
क्या खूब बयां करतीं थीं ,
खामोशी से पलके झुकाए ,
मेरे सामने खड़ी रहती थी ।

पर अब मकान बदलने वाला था ,
मेरे मुकाम के साथ ,
था नहीं मालूम आखिरी हो रही ,
खामोशी से हमारी बात ।

तेरी खुशबू आज भी फिजाओं में ,
घुल कर तेरी मौजूदगी बताती है ,
बिखरे मकान और उजड़े उम्मीद को ,
मानो जोड़ने की वजह दे जाती है ।

तुम्हारा एहसास ही काफी था ,
मेरे मुस्कुराने के लिए ,
दो पल में दो जिंदगियों का ,
सुकून दे जाने के लिए ।

पर अब पलकों की भाषा ,
खामोशी की परिभाषा ,
दिनों ही तो मालूम नहीं ,
बिन कहे उन अधुरे जज्बातों को ,
आज तक मुझे सुकून नहीं ।