Saturday, September 11, 2021

पहली दफा

पहली दफा तो ,
हर दफा कमाल होता है ,
हर दफा गर पहला सा लगे ,
तो बेमिसाल होता है ।

मिलती है ये खुशी इश्क़ में ,
चंद खुशनसीब को ,
वरना गुजरते वक्त के साथ ,
गम लाज़मी है हर बदनसीब को ।

पहली बात हो या पहला साथ हो  ,
पहली झलक हो या पहली मुलाकात हो ,
पहली बारिश हो या पहली रात हो  ,
खुशियों के अनगिनत जिनमें सौगात हो ।

वक्त के साथ देखो अब तक ,
कुछ भी तो नहीं बदला है ,
दरमियान हम दोनों के ,
ये रिश्ता पहले सा ही गहरा है ।

पहली दफा वाले पल ,
जो हर रोज़ जीतें हैं ,
बड़े खूबसूरत रिश्ते उनके ,
और वो बेहद खुशनसीब होते है ।

पहली सी मेरी पहेली ,
तुम ऐसे ही बन कर रहना ,
पहली दफा वाली मोहब्बत ,
आखिरी वक्त तक करते रहना ।।

Friday, September 10, 2021

महफूज़

इश्क़ क्या ही बताएगा , 
जब निभाने उसे कोई आयेगा , 
शोर जो दबा रखा है अंदर ,
वो भी खामोश हो जाएगा ।

मिलने पर इश्क़ के , 
इश्क़ को भी , 
इश्क़ से , इश्क़ हो जाएगा ।

ना होगा कुछ अधूरा ,
ना पूरा करने की जंग होगी ,
मोहब्बत की कहानी में ,
इस दफा वो भी संग होगी ।

मेरा फितूर उस पर चढ़ा था ,
या मुझ पर उसका फितूर ,
अब चढ़ने लगा है ,
दिल ये सवाल बार बार करने लगा है ।

बारिश ने जबसे चुपके से आकर ,
हम दोनों को भिगोया है ,
इश्क़ के इस सफरनामे में ,
मानों हम दोनों ने कुछ खोया है ।

हम दोनों भी तो अब ,
कल्पनाओं में खो चुके हैं ,
एक दूजे की कहानियों का ,
हिस्सा हो चुके है ।

छोड़ कर तुम मत जाना रूह से ,
गर जिस्म से चली भी जाओ ,
एक और दफा मोहब्बत को ,
बगैर जिस्म के जी कर दिखाओ ।।

Thursday, September 9, 2021

रक़ीब

दिल में बसी तस्वीर तुम्हारी ,
धड़कनों पर किसी और का नाम है ,
मोहब्बत में आज कल ,
ये सिलसिला बेहद आम है ।

तुम्हारे इश्क़ में पड़ा हू मैं ,
आंखे किसी और की भी पढ़ रहा ,
मोहब्बत तुमसे करता मैं बेपनाह ,
बस थोड़ी सी इश्क़बाजी उनसे कर रहा ।

तुम मेरी दुनिया हो और रहोगी ,
क्या सच में मुझे बेवफा कहोगी ,
क्योंकि इश्क़ तो सिर्फ मुझे तुमसे है ,
चंद लम्हों की सौदेबाजी उनसे है ।

तुम मेरी जिक्र हो और 
तुम ही हो मेरी कल्पना ,
मोहबब्त करता हूं जिससे ,
बेइंतहा और बेपनाह ।

क्या इतना भी तुम्हारे लिए ,
लगता तुम्हें कम है ,
तोड़ा है दिल मैंने तो उसका ,
तुम्हारी आंखे क्यों नम हैं ।

इश्क़ में तुमने भी तो ,
मुझे कितना बर्बाद किया है ,
ठीक वैसे ही जैसे मैंने ,
ये जुल्म उसके साथ किया है ।

रक़ीब है वो मेरा ,
या तुम्हारा मैं रकीब हूं ,
देखो इश्क़ पाकर भी पूरा ,
मैं कितना बदनसीब हूं ।।

फितूर

मेरी आंखों में बसी तस्वीर तुम्हारी ,
अब शक्ल बदलने लगी है ,
मेरी मोहब्बत बदल कर चाल ,
अब बस तेरी ओर चलने लगी है ।

ना मुझे कोई रास्ता समझ आता ,
ना ही कोई और मंजिल नजर आती है ,
बस बढ़ते जो भी रास्ते तेरी ओर ,
वो मेरी मंजिल बन जाती है ।

तुमसे मोहब्बत ही नहीं ,
तुम्हारा फितूर मुझे भाने लगा है ,
तेरा जिक्र जबसे हर सुबह ,
मेरे जहन में आने लगा है ।

तेरा ख़्याल ही काफी हैं ,
मेरे ख़्वाब सजाने के लिए ,
दफ्न हो चुके इस लाश को ,
जिंदा कर जाने के लिए ।

तुम आई हो हुबहू बन कर ,
मेरी वो बिछड़ी मोहब्बत ,
जिस पर मैं सब लूटा बैठा था ,
जिससे मैं दिल लगा बैठा था ।

तुम हो मेरी जिंदगी का वो किस्सा ,
जैसे हो धड़कन दिल का हिस्सा ,
तुम हो मेरी अधूरी वो कहानी  ,
लिखनी जिसकी हो पूरी जिंदगानी ।।

Wednesday, September 8, 2021

आसूं

सफ़र मेरा भी खूब होता है ,
बड़ी मुश्किल से नसीब होता है ,
गर ना हो वजह कोई खास ,
तो भला मुझसे ,
मुखातिब कहां कोई होता है ।

दिल में आने पर ख़बर ,
असर दिल पर कुछ ऐसा होता है ,
जज्बातों की शक्ल बन कर ,
मेरा सफर शुरू होता है ।

मैं बढ़ता और घटता हू ,
जज़्बात के इशारों पर ,
अक्सर आकार रुक जाता हू ,
पलकों के किनारे पर ।

मेरे आने की वजह मुश्किल है ,
किसी को बता पाना ,
कभी आता खुशियों में बहने ,
कभी गम में मिल जाता ठिकाना ।

मुझे देख पाना आसान होता है ,
छिपाना उतना ही मुश्किल ,
बड़ी कोशिशों के बाद ही ,
मिल पाती है मुझे मंजिल ।

बस कभी कभी पलके मुझे ,
बेसहारा छोड़ देती हैं ,
कतरा कतरा तोड़ कर मुझे ,
मंजिल मेरी मोड़ देती है ।

पर आज भी हु जिंदा मैं ,
किसी की आंखो का नूर बन कर ,
किसी के दिल से बहने को बेकार ,
उसका मलाल और कसूर बन कर ।।

खुशनसीब - एक दफा खोया इश्क़

तुम खुशनसीब मानो ,
इस जहां में अपने आप को ,
तुमने खोया एक ही दफा ,
किसी बेहद खास को ।

पूछो हाल कभी मेरा ,
और मुझ जैसों का , 
हम तो हर रोज खोते हैं ,
इश्क़ में अकेला जब ,
अक्सर लोग छोड़ देते है ।

बहते नहीं सिर्फ आंखो से आंसू ,
रक्त भी कई दफा बहता है ,
हर रोज इश्क़ में पड़ता मैं ,
हर रोज इश्क़ में वो बिछड़ता है ।

बस फर्क इतना की ,
तुमने तस्वीर और तकदीर ,
दोनों को सच में जिया है ,
हमने तो मोहब्बत भी आज तक ,
बस अधूरा ही किया है ।

स्वर्ग में जा चुका है ,
यकीनन इश्क आप का ,
हम तो आज भी ,
नर्क में ही बैठे हैं ।

हर रोज़ खा कर कसम ,
इश्क में ना पड़ने की ,
एक और दफा टूटने के लिए ,
दिल लगा बैठे है ।

इश्क़ में मारता नहीं कोई ,
इश्क़ में तो जिंदा होते है ,
खुशनसीब है वो सब इश्क़ में ,
जो इश्क़ को बस एक दफा खोते हैं ।

इश्क़ में बदनसीब मुझसा ,
ए खुदा किसी और का ना बनाना ,
बड़ा मुश्किल होता है ,
सुबह जन्म देकर .. रात को दफनाना ।।

Sunday, September 5, 2021

तुमने ये क्या कर दिया

मेरे हिस्से का गम तो मैं रखता था ,
खुशियां सब में बांट देता ,
बन कर अंजान अजनबी रास्तों पर ,
मुसाफिरों को रास्ता दिखा देता ।

ना कभी कुछ मांगा उनसे ,
ना कभी उनके पीछे आया ,
जब तक रही जरूरत मेरी ,
बन कर साया साथ निभाया ।

कुछ साथ चंद मिनटों का रहा ,
कुछ घंटों में बीत गया ,
कुछ की उम्र थोड़ी लम्बी थी ,
कुछ मुझसे ही अंजाने में छूट गया ।

पर कभी ना थामा हाथ किसी का ,
कुछ पल ही रुक जाने के लिए ,
एक अकेला काफी हू ,
गम में भी मुस्कुराने के लिए ।

मैं मुसाफ़िर अपनी ही जिंदगी का ,
अपने हिस्से की खुशियां बाटने आया हूं ,
चंद लम्हों की जिंदगी में ,
ताउम्र का एहसास ले आया हूं ।

भटकता मैं मुसाफ़िर महफिलों में ,
घर को तलाश रहा था ,
अल्फाज़ और जज़्बात को पढ़ कर ,
एक मकान बना रहा था ।

तुमने ये क्या कर दिया ,
मेरे हिस्से के शब्दों को ,
अपने शब्दों के श्रृंगार से ,
अमर कर दिया ।।

पहेली

तेरे रास्तों में छिपी अनगिनत ,
मंजिलों के बिछड़ने की कहानियां ,
तुम किसको सुना रही हो ,
किसका सच किससे झुठला रही हो ।

ये हल्की सी रौशनी जो तुमको ,
दो हिस्से में बांट रही है ,
हाले दिल और गुजरते दौर की ,
कहानी वो बता रही है ।

गुमसुम भी और शोर भी है ,
कहानियों में छिपा कोई और भी है ,
तुम ऐसे ही खामोशी से नहीं मिलती हो ,
हर रोज अनगिनत शोर से गुजरती हो ।

पलकों पर नमी नहीं आती ,
आंखो में ही छिप जाती है ,
दास्ताने जिंदगी पन्नों पर लिख ,
अक्सर अब वो सुनाती है ।

मुस्कुराती है जिंदगी के फैसलों पर ,
खुद को खुद से छिपा कर ,
जिंदा पड़े ताज़ा जख्मों को ,
भरा हुआ बता कर ।

पर कब तक ऐसे ही अल्फाजों से ,
गुफ्तगू तुम खामोशी से करती रहोगी ,
शोर होने पर भी अपने इर्दगिर्द ,
क्या अब भी तुम खामोश रहोगी ।

मुस्कुराहट से खुद को ,
किसी रोज़ सजा कर देखो ,
आईने में खुद से ,
कभी नज़रे मिला कर देखो ।

सब कुछ पल भर में ,
देखना कैसे बदल जायेगा ,
रास्ता तुम्हें अपनी मंजिल का ,
अपनी आंखो में नजर आएगा ।।

Saturday, September 4, 2021

खुशियों की पोटली

आज अरसे बाद उसने ,
खुद को फिरसे सजाया था ,
माथे पर बिंदिया , कानों में झुमके ,
और बालों में झूमर लगाया था ।

पर इस दफा सजने में उनके ,
बात कुछ अलग थी ,
हर श्रृंगार से जुड़ी कहानियां ,
जिसमें अनगिनत थी ।

तुम्हारे जिक्र भर से देखो ,
कितना सब बदल सा जाता है ,
कश्मकश से भरे इस रिश्ते को ,
जो और उलझाता है ।

कभी गम का साया आता ,
तो कभी खुशियों की बारिश ,
कभी हम करते मिन्नते ,
तो कभी तुम करते सिफ़ारिश ।

ये सिलसिला शुरू जो हुआ ,
ख़त्म इसको भी तो होना है ,
पर इस दफा हर लम्हें को ,
खुशियों से सजोना है ।

गर रह गया कुछ भी अधूरा ,
तो रहने देना ,
लबों पर जो आ जाए कोई बात ,
तो कहने देना ।

क्योंकि इस रिश्ते में ,
सब कुछ अब तक पाक है ,
जज्बातों के समुंदर में ,
तेरी लहरों का साथ है ।

तुम्हारी खुशियों की पोटली में ,
अब फिरसे कुछ लम्हें आने को हैं ,
हर एक दफा आईने में देख कर ,
जो चांद का हो जाने को है ।

कबूलनामा

तुम सज संवर कर उस रोज़ ,
जब महफिल में आई थी ,
ख्वाबों की पोटली से ,
एक लम्हा चुरा लाई थी ।

वो बाली .. वो झुमके और ,
तेरे आंखो में बसा नूर ,
डूब रहा था जिनमें वो,
हो कर मजबूर ।

होठों पे बसी खामोशी और 
हया से झुकी पलके तुम्हारी ,
तुम्हें और दिलकश बना रही थीं ,
बार बार उसकी निगाहें ,
बस तुम पर आ रही थीं ।

वो पल वो लम्हा और तुम ,
सब अब तक कल से अंजान थे ,
तुम उनकी मुमताज़ और ,
वो तुम्हारे शाह जहाँ थे ।

कबूल करने की जिद्द ,
या काबिल होने का वक्त ,
अब दोनों ही गुजर चुके थे ,
वो तो बस अब तेरे हो चले थे ।

काश वक्त गर यहीं रुक जाता ,
तो आज क्या ही बात होती ,
अनगिनत दिए जख्मों पर ,
मरहम की सौगात होती ।

पर वक्त को मंजूर तेरे हिस्से ,
कुछ और ही करना था ,
खुशियों के बगैर जीना ,
और गम से तुझे मरना था ।।

Friday, September 3, 2021

सफ़र के साथी

मैं सफर का राही ऐसा ,
मिला मंजिल भी मुझ जैसा ,
सब कुछ धुंधला नजर आता है ,
जब भी ढूंढने उसे कोई निकल जाता है ।

थाम कर हाथ मेरा अक्सर ,
अपने मंजिल तक मुसाफ़िर आते है ,
मिलते ही पहचाने रास्तों पर ,
छोड़ मेरा हाथ चले जाते है ।

सपना भी देखते साथ ,
और ख़्वाब भी सजाते है ,
मिलते ही मंजिल का पता ,
हमें गैर बताते है ।

मैं शायद आप सा ,
या आप मुझ जैसे तो लगते है ,
अक्सर थाम कर हाथ जिनका ,
गुमनाम सड़को पर लोग चलते है ।

वक्त बदलते ,
इंसान आखिर क्यों ,
बदल सा जाता है ,
मुश्किल में थामे हाथ को छोड़ ,
अपनो को गैर ,
और गैरों को अपना बनाता है ।

मतलबी दुनिया में आज भी ,
हम जैसे कुछ बेमतलब ,
अक्सर फिर वही गलती दोहराते है ,
मिलने पर मंजिल हमें लोग ,
अक्सर छोड़ कर चले जाते है ।

कामयाब होने पर अपनो को खो देना ,
क्या सच में कामयाब बनाता है ,
आखिरी वक्त में कंधे पर ,
अपनो के ही आना पड़ता है ।

मतलबी दुनिया में आज भी ,
कुछ बेमतलब ही अपना बना रहें ,
अंजान सड़को पर अजनबी को ,
रास्ता दिखा रहें ।।

Tuesday, August 31, 2021

लबों पर जिंदगी

सब कुछ जिंदगी से ,
जब छुटने लगा था ,
मीत भी मेरा मुझसे ,
अब रूठने लगा था ।

हर रात लगती थी लंबी ,
और दिन आता ही नहीं था ,
आंखो में कभी बहते आंसू ,
कभी मैं पलके झुकाता ही नहीं था ।

पर आज का सूरज ,
एक तौफा लेकर आया है ,
तेरे झुमको सा शोर ,
इस दफा तेरे लबों ने मचाया है ।

लगा जैसे जिंदा लाश को ,
किसी ने कब्र से निकाला हो ,
और दूसरी दफा जिंदगी जीने का ,
हौसला दे डाला हो ।

ना ही कोई मंजिल ,
ना ही कोई मुकाम है ,
फिर भी ना जाने क्यों ,
वो चांद पर मेहरबान है ।

ये सिलसिला जो शुरू हुआ ,
अब कब्र से निकल तो जाऊंगा ,
पर गर ना मिली मंजिल कभी ,
तुझमें दफ्न हो जाऊंगा ।

कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते ,
कुछ रिश्ते आम नहीं होते ,
कुछ रिश्तों में जिंदगी होती है ,
कुछ रिश्तों में बंदगी होती है ।

ऐसे ही इश्क़ में लोग ,
बेवजह कुर्बान नहीं होते ,
हर दफा इश्क़ करने वाले ,
अजनबी और अंजान नहीं होते ।।

Sunday, August 29, 2021

श्रृंगार

मैं सज संवर कर ,
उनके लिए तैयार बैठी थी ,
माथे पर बिंदिया और 
हाथों में कंगन पहनी थी ।

जुल्फ़ भी खुली और सुलझी थी ,
और माथे पर टीके का श्रृंगार ,
संग जिसके एक लाल बिंदी थी ।

बस अगर कुछ अधूरा था ,
तो वो था उनका दीदार ,
और झुमके को उनकी मौजूदगी में ,
पहनने को था दिल बेकरार ।

खुद को कभी मैंने ,
ऐसे सजाया ना था ,
मेरे दिल को आज तक ,
आप सा कोई भाया ना था ।

अब मुझे आईने में ,
हम दोनों ही कैद लग रहे थे ,
मेरी आंखों में आप की तस्वीर ,
और उसके आगे हम सवर रहे थे ।

आप की फेरती उंगलियां ,
मेरे कानों पर ,
जुल्फ को हटा रही थीं ,
झुमके से जब मैं खुद को ,
सजा रही थी ।

मैं भी मचली मन भी मचला ,
इसमें कुछ नई सी बात थी ,
तेरे इस छूवन में ,
बिन मौसम बरसात थी ।

मैं सज संवर कर ,
अब बस तेरी हो जाऊंगी ,
अगली दफा तेरी मौजूदगी से ,
खुद को सजाऊंगी ।।