Thursday, September 23, 2021

चूड़ियों की खनक

खनक रही थी ,
चमक भी रही थीं ,
हाथों में जब अपने वो ,
चूड़ियां पहन रही थी ।

श्रृंगार था पूरा ,
पर सौन्दर्य था अधूरा ,
था नहीं पहना उसने ,
जब तक हाथों में चूड़ा ।

हर कदम और हर खनक ,
झुकी पलके और अनगिनत ख़्वाब ,
जीने को हो रहा था जिसे ,
अब मन उसका बेताब ।

दिल को दिल से लगाना ,
किसी गैर को अपना बनाना ,
चूड़ियों की खनक समझाना ,
और बस इश्क़ में पड़ जाना । 

चूड़ियों से भला बेहतर ये ,
कौन ही निभा पाता होगा ,
इश्क़ की मौजूदगी जिंदगी भर ,
खनक से अपने जो बताता होगा ।

क्या खूब रंगीन मौसम ,
देखो हर तरफ होने लगा हैं ,
तेरे चूड़ियों के रंग से ,
जो खुद को रंगने लगा है ।

चूड़ियां श्रृंगार का हिस्सा नहीं ,
जिंदगी का किस्सा बताती हैं ,
ना हो गर मौजूद हाथों में ,
सन्नाटे में शोर मचाती हैं ।।

चाय और तुम

गर है मोहब्बत तो कह दो ,
उलझाओ मत कहीं ,
वक्त ना निकल जाए ,
और तुम रह जाओ यहीं ।

चाय के प्याली की गर्माहट ,
कहीं ठंडी ना हो जाए ,
ताज़गी खत्म चाय की ,
कहीं जल्दी ना हो जाए ।

सफ़र में हमसफ़र बनने की ,
ख्वाइश हर कोई जताता है ,
पर इश्क़ में पड़ने के बाद ,
अक्सर वो बेखबर हो जाता है ।

ना रहता याद इश्क उसे ,
ना ही वादे वो निभाता है ,
चाय से चायपत्ती की तरह ,
अक्सर फेक दिया जाता है ।

पर दिल का मारा ,
भला और कैसे जिंदा रहेगा ,
रंग इश्क़ का जो ,
उस चाय की तरह चढ़ेगा ।

इश्क़ में फिर पड़ने लगा है ,
जबसे वो लबों से गुजरने लगी है ,
चाय सी कड़क मोहब्बत ,
अब वो भी करने लगी है ।।

Wednesday, September 22, 2021

चूड़ियां

तुम सज धज कर उस रोज़ ,
खुशियों का हिस्सा बनी थी ,
हाथों में तुम्हारे चूड़ियां भी ,
क्या खूब जच रही थीं ।

आंखो से पढ़े तो कुछ ,
होठों से कुछ और ,
बड़ी मुश्किल से था गुजरा ,
जिंदगी का वो दौर ।

तेरे श्रृंगार में था सब सजा ,
बस तेरे रूह को छोड़ कर ,
चूड़ियों की खनखनाहट खो गई ,
जब गया वो मुंह मोड़ कर ।

तुमसे मिला चंद रोज़ बाद ,
जब ये हादसा हो चला था ,
ख़्वाब को सच मान कर ,
तुझसे इश्क़ कर रहा था ।

निगाहों से शरारत कर के ,
एक और जुल्म तुम करा रही थी ,
चूड़ियों की खनखनहाट से ,
हाले दिल बता रही थी ।

हाथों में चूड़ियां तुमने ,
फिरसे जो सजाई थी ,
बेहद सादगी से मेरे हिस्से की ,
मोहब्बत मुझे लौटाई थी ।

खनकने लगी चूड़ियां ,
फिरसे तुम्हारे हाथ में ,
मिलने लगी खुशियां मुझे ,
इश्क़ के सौगात में ।।

पराया तौफ़ा

हर तरफ जश्न और खुशियों में ,
किसी एक की ख्वाइश थी ,
बहुत दूर जिसे जिंदगी मेरी ,
अब मुझसे कर आई थी ।

चंद लम्हों और लफ्जों से ,
उसका जादू मुझपर ,
कुछ इस कदर चढ़ा था ,
उसकी राह मैं अब तक देख रहा था ।

हर रात हर दिन ,
बस उससे ही होता था ,
मेरे गम , मेरी खुशियों की वजह ,
बस वही होता था ।

उससे रिश्ता शायद एक तरफा था ,
या मैंने हक से नहीं निभाया ,
देखो ना वक्त से पहले ही ,
बेवक्त बेवजह वो मुझे छोड़ आया ।

मिले थे हम पहली दफा ,
उसके घर खुशियां आने पर ,
लगा था मिलेगी वो भी मुझे ,
आज का दिन आ जाने पर । 

चांद बन कर आज भी ,
उसका इंतजार अक्सर करता हु ,
आता नहीं बस अब उसके करीब ,
उसे खोने से डरता हु ।

शब्दों का सौदागर बनाकर ,
सौदा जिंदगी का हो रहा है ,
चांद के सबसे करीब तारा ,
अब आकाश गंगा में खो रहा है ।।

Saturday, September 18, 2021

दुप्पटा सा इश्क़

उस रोज़ जब तूने दुप्पटा ,
हवा में लहराया था ,
तेरे वजूद का एक हिस्सा ,
मुझसे पहली दफा टकराया था ।

मैं पल भर के लिए थम गया ,
या तूने किया मुझपर कोई जादू था ,
पहली दफा पहली नजर में ,
हुआ मेरा दिल बेकाबू था ।

तस्वीर से भी खूबसूरत ,
उसका दीदार था ,
पहली नजर वाला ,
मेरा वो पहला प्यार था ।

झुकी नज़रे और पलकों की शरारत ,
क्या खूब कहानियां बना रहे थे ,
हम उनसे लगा रहे थे दिल ,
और वो इस सच को झुठला रहे थे ।

दुप्पटा सरका सर से उनके ,
कांधे पर आकर रुक गया ,
मानो इजाज़त दी हो निहारने की ,
दुप्पटे से था जो छिप गया ।

वो खूबसूरत चेहरा और झुमके ,
बिंदी भी क्या खूब जच रही थी ,
पहली दफा पहली सी मोहबब्त ,
अब वो मुहसे भी कर रही थी ।

दुप्पटा सिर्फ श्रृंगार ही नहीं ,
मोहब्बत को भी सजाता है ,
इश्क़ निभाने जब कोई ,
दुप्पटा ओढ़ कर आता है ।

तुम मेरे ख्वाबों का वो सच हो ,
जिसका हर जिक्र अब अंजना नहीं ,
दिल में हो सबसे करीब मेरे ,
इस घर की तुम अब मेहमान नहीं ।

ओढ़ कर आना दुप्पटा ,
फिरसे इश्क़ निभाने को ,
पहली दफा सी मोहब्बत ,
हर दफा कर जाने को ।।

दुपट्टा

कोई एक रंग मालूम नहीं ,
हर रंग में कहर ढाती हो ,
कभी सर तो कभी कांधे पर ,
जब भी इसे सजाती हो ।

किसी और श्रृंगार से ,
ये कुछ इस कदर अलग है ,
और तो श्रृंगार का हिस्सा हैं ,
ये जिंदगी का सबब है ।

गर नहीं होता मौजूद कभी ,
मायने इसके बदल जाते हैं ,
अपनी मर्जी से ना ओढ़ो तो ठीक ,
वरना लाज से ये जुड़ जाते है ।

तुम पर जचता हर श्रृंगार ,
जब भी खुद को सजाती हो ,
चांद से खूबसूरत चेहरे पर ,
दुपट्टा लगाती हो । 

आज भी जब कभी जिक्र ,
कहीं दुपट्टे का आता हैं ,
तेरा ही ख़्याल सबसे पहले ,
मेरे दिल को आता है ।

इश्क़ करने वाले होंगे बहुत ,
पर हमसा कहां कोई कर पायेगा ,
झुमके , बिंदी और काजल वाला ,
दुपट्टे की मोहब्बत कहां समझ पाएगा ।।

पल भर में इश्क़

बड़ी मुश्किलों से गुजर ,
रहा था दिल मेरा ,
मिल ही गई मंजिल मुझे ,
आखिर किसी तरह ।

वो सामने मेरे खड़ी थी ,
निगाहों को थोड़ी हड़बड़ी थी ,
एक पल में वो कही खो गई ,
लगा मेरी कहानी अधूरी हो गई ।

शाम के रात हो जाने के ,
इंतजार में हम वही खड़े थे ,
जहां एक पल में बेकरार ,
अगले ही पल बेखबर हुए थे ।

चांद से आने से पहले ,
एक चांद का टुकड़ा ,
धरती पर आ गिरा था ,
एक और दफा जो ,
मेरे सामने खड़ा था ।

इस दफा नज़रे मिली हमारी ,
और वो भी थम सी गई थी ,
मानो लौट आने का इंतजार ,
वो मुझसे भी ज्यादा कर रही थी । 

बस निगाहों से कह दी ,
हमनें दिल की हर बात ,
मिलने लगे हैं हम दोनों ,
अब हर दिन और रात ।

आप सा इश्क़ करने वाला ,
कहां आप को मिल पाता है ,
खुशनसीब कम होते हैं मुझ जैसे ,
जिन्हें ये इश्क़ नसीब हो पाता है ।।

नादान मौत

बड़ी उलझनों से गुजर रहा ,
मैं और मेरा दिल था ,
थी मुश्किल भी बहुत ,
और दूर बहुत मंजिल था ।

फैसले और फासलों में ,
कुछ भी नहीं था मालूम ,
चल पड़ा था पहले ही ,
ख्वाबों का हुजूम ।

मैं डर रहा था डगर से ,
और वक्त भी कम बचा था ,
अपने ही लिखे आखिरी अल्फाज़ ,
मैं अब पढ़ रहा था ।

हुई मायूसी और थोड़ी उदासी ,
अपना हाले दिल जान कर ,
बड़ी मुश्किल से संभाला था ,
किसी गैर को अपना मान कर ।

अब तो बस ख़त्म होने को ,
मेरे जिंदगी का अध्याय था ,
बड़ी दूर तक जिसे मैं ,
बेवजह खींच लाया था ।

मेरी मोहब्बत की ये ,
आखिरी तुमको सौगात है ,
जिंदगी थी बस तुमसे ही ,
तुम्हारे बाद बस मौत का साथ है ।

हार कर भी जीत जाता मैं ,
बस अगर तुम साथ होते ,
मौत होती मुझसे बेहद दूर ,
गर तुम पास होते ।।

Friday, September 17, 2021

मस्कली

हिस्से जिसके बस बटना आया है ,
हो कर भी सच्चा दिल से ,
अनगिनत ठोकर जिसने खाया है ,
तुझ जैसा हर शख्स कहां हो पाया है ।

तेरी ख्वाइश भी अधूरी है ,
मन्नत भी नहीं हुई कोई पूरी है ,
दिल तो हर किसी को दे आती है ,
बदले में बस ठोकर पाती है ।

मुश्किल बहुत सी गुजर गई ,
और गुजरना कुछ का बाकी है ,
रखना भरोसा खुद पर ,
वही तेरा असली साथी है ।

बस कोशिश ऐसे ही ,
तुम करते जाना ,
होगा आगे का सफर ,
खूबसूरत और सुहाना ।

मुस्कुराहट चेहरे से कभी ,
अपने हटाना नहीं ,
सीरत पे दाग किसी का ,
खुद से लगाना नहीं ।

जीत तेरी पक्की है ,
तेरे इरादों सी ,
मिलेगी खुशियों की पोटली ,
खुद से किए वादों की ।

वक्त आने पर हर कोई ,
तेरे पीछे आयेगा ,
जिस रोज़ तुझे और तेरी सीरत ,
को पहचान जायेगा ।।


Thursday, September 16, 2021

बिंदी

मांग में तब सिंदूर भी ना था ,
मेरा इस कदर फितूर भी ना था ,
था तो बस इश्क़ होने को शुरू ,
और भला मैं क्या ही कहूं ।

मुझे आज जी भर के ,
तुम्हें ऐसे ही निहारने दो ,
माथे पर बिंदी को ,
ऐसे ही संवारने दो ।

सज संवर कर हर रोज ,
मेरे सामने जब आती हो ,
बिंदी मेरे हाथों से ही ,
अपने माथे पर लगवाती हो ।

हर बदलता रंग माथे पर ,
तुम्हारे चेहरे पर जचता है ,
श्रृंगार बिंदी का सबसे ,
खूबसूरत तुम पर लगता है ।

तुम से इश्क़ से भी पहले मुझे ,
तुम्हारी बिंदी से इश्क़ हुआ था ,
तुम्हें छूने से पहले मैंने ,
तुम्हारे माथे की बिंदी को छुआ था ।

बिंदी सा खूबसूरत कोई और ,
श्रृंगार कहां होता है ,
उम्र की हर दहलीज पे ,
खूबसूरती जो बिखेरता है ।।

काजल

मुझे मेरा इश्क़ लौटा दो ,
मेरे हिस्से की मुझे वफा दो ,
दो लौटा मेरा हर एक पल ,
छोड़ आए तुम जिन्हें कल ।

मैं सिसक सिसक कर ,
अपना दर्द छिपा रही हु ,
बह जाने के डर से ,
काजल नहीं लगा रही हु ।

तुम ख़्वाब बन कर मेरे ,
हकीकत से मिल रहे थे ,
हकीकत को ख़्वाब समझ ,
हम तुझमें खो रहे थे । 

एक नज़र के फेर ने ,
नज़र ऐसा कुछ मुझसे चुराया ,
ख़्वाब जो लगने लगे थे हकीकत ,
एक पल में जिसे वो तोड़ आया । 

किस्मत ने मेरे हिस्से ,
तेरे छुअन को कुछ ऐसे लिखा था ,
बहने पर आंखो से आंसू ,
पलकों से तू मिट रहा था ।

मेरे श्रृंगार में काजल ,
सबसे अलग है ,
और तो है रंग बिरंगे ,
बस तू ही एक रंग है ।।

फूल सा इश्क़

मैं उस फूल सा खुशनसीब ,
क्यों नहीं बन सकता हु ,
मिलकर मौत से गले ,
किसी और को जिंदगी दे सकता हु ।

लावारिस कही सड़को पर ,
टूट कर मैं पड़ा था ,
उसने अपनी मोहबब्त की खातिर ,
बस मुझे ही चुना था ।

अपने साजन के लिए ,
मुझे वो कानों पर सजा रही थी ,
मिलते ही मोहबब्त से ,
फिरसे सड़क पर ला रही थी ।

मुरझा कर मैं अब फिर ,
उसी सड़क पर टूट कर पड़ा था ,
किसी और महबूब के मोहबब्त की ,
बेवजह वजह बन रहा था ।

कही से छूट कर मैं ,
कही टूट कर पड़ा था ,
मेरी मोहब्बत का तमाशा ,
हर राहगीर देख रहा था ।

मुझे टूटना पसंद नहीं ,
पर किस्मत कौन बदल पाता है ,
कांटों वाले फूल को ,
सबसे ज्यादा तोड़ा जाता है ।।

लिपिस्टिक

आंखे और झुमकों से ,
आज बात कुछ आगे बढ़ी थी ,
पहली दफा नकाब हटा कर ,
वो मेरे सामने खड़ी थी ।

निशा कुछ रंग के ,
नकाब पर भी बिखर चुके थे ,
बिछड़ने पर होठों से ,
उसके निशा लेकर बट रहें थे ।

दाग तो लगा था नकाब पर ,
मुझ पर लगना बाकी था ,
होठों की शरारत उनके ,
ये बताने के लिए काफी था ।

रंग चढ़ा होठों पर लाल ,
मैं नज़रे कैसे उससे चुराता ,
हाले दिल छिपा रखा था जो ,
होठों पर अब कैसे लाता ।

रंग और भी जचता होगा ,
जब वो खुद को संवारती होगी ,
आफत आने से मिट जाने पर ,
खुद से आईने में सजाती होंगी ।

इश्क़ सा ही तो होठों पर ,
मौजूद श्रृंगार होता है ,
बटने को निभाने वाले से ,
अक्सर बेकरार होता है ।।