Wednesday, September 29, 2021

दिल मेरा

दिल को मेरे क्या हुआ है ,
ये अब क्यों उलझ रहा है ,
दूर तो कल भी थी वो मुझसे ,
पर अब क्यों दूर लग रहा है ।

खामोशी उसकी शोर कर रही ,
गैर मौजूदगी कमजोर कर रही ,
फासलों को मिटाने पर मुझे ,
देखो अब मजबूर कर रही ।

होठों पर लबों की बात लाकर ,
मुझसे ये कैसा करार कर रही है ,
बेकरारी को बढ़ा कर मेरे ,
मुझे मुझमें उलझा रही है ।

सब कुछ खूबसूरत लगने लगा है ,
जबसे अपने निगाहों से दिखा रही है ,
दीवानगी की हद से बेहद होने को ,
सरेआम झुठला रही है ।

फितूर मेरा उतरा नहीं कभी ,
बस उसका फितूर अब चढ़ने लगा हैं ,
देखो ना इश्क़ का ज़हर ,
अब जहन में घुलने लगा है ।

परवान चढ़ने लगा है इश्क़ जो ,
अब तो उसे निभाना है ,
चंद लम्हों की हो खुशी या जिंदगी भर की ,
उसके हिस्से जिसे कर जाना है ।।

बदनाम

दिल में बसा है कोई और ,
तस्वीर किसी और की दिखा रही ,
नाम किसी और का लेकर ,
पता किसी और का बता रही ।

रास्ते बदल रही हर मोड़ पर ,
नक्शे को भी छिपा रही ,
कभी मिल रही किसी अपने से ,
कभी अजनबी को अपना बता रही ।

भूल कर कल को ,
कल अपना बना रही है ,
आज का मालूम नहीं ,
वादा कल का किए जा रही है ।

इश्क़ में बदनाम हो कर भी ,
दिल खुलेआम लगा रही है ,
गुमनाम शहर के किसी कोने में ,
अपना आशियाना सजा रही है ।

मिल रहे हर ज़ख़्म को ,
घाव खुद बना रही है ,
मरहम लगाने वाले हाथों को ,
जख्मों से भरे जा रही है ।

खैर,

इश्क़ में भला ऐसा कभी ,
कहीं होता है क्या ,
बर्बाद करने वाला भी ,
कभी रोता है क्या ?


बदनसीब मां

जिस रोज़ मुझे घसीट कर ,
दहलीज तक वो लाय थे ,
छीन कर मेरे लाल को ,
मुझे चौखट पर छोड़ आए थे ।

मैं तड़प रही थी उसके आस में ,
था नहीं कोई भी खड़ा मेरे पास में ,
जुल्म मेरा बस मेरी एक "ना" थी ,
किसी के हरकतों से मैं खफा थी ।

जब निकली उस चौखट से ,
आजाद हो कर भी कैद हो गई ,
अपने जिगर के टुकड़े के बगैर ,
मैं इस जहां में अनाथ हो गई ।

हर सुबह पहला ख्याल भी उसका ,
हर रात भी वही आखिरी होता है ,
आज भी लगती चोट गर कभी ,
मेरा ही नाम लेकर रोता है ।

मेरी आंखो में हर वक्त नमी ,
उसकी कमी को बताता हैं ,
बगैर बच्चे के किस मां को ,
भला सुकून मिल पाता है । 

मेरे हिस्से के गम को ,
बस वही कम कर पायेगा ,
लौट कर मेरा लाल ,
जब मुझे गले लगाएगा । 

वो मां कितनी बदनसीब होती होगी ,
कोख में पलने वाले से ,
जब कभी किसी गैर के खातिर ,
मुझ जैसे दूर होती होगी ।।

आसमानी परिंदा

आज भी शाम को ,
वो छत पर आती होगी ,
किसी परिंदे को कैद करने ,
निगाहों का पिंजड़ा लाती होगी ।

बहुत परिंदे उड़कर ,
उसके छत पर आते होंगे ,
समझ कर आसमां उसे ,
पिंचड़े में फंस जाते होंगे ।

इश्क़ उनसे भी मुझसा ,
वो निभाती होगी ,
उंगलियों से आज भी ,
बिखरे जुल्फ सुलझाती होगी ।

कहानियों में उसके दर्द ,
और जिल्लत का जिक्र होगा ,
कर रहा कोई नया परिंदा ,
उसकी फिक्र होगा ।

आज भी किसी कैद परिंदे को ,
आजादी का पाठ पढ़ा रही होगी ,
कैद में रख कर जिसे ,
आजाद बता रही होगी ।।

कुछ नहीं बचा

ना किसी की मौजूदगी ,
ना ही किसी का आना ,
ना कोई खुशी की वजह ,
ना ही किसी से दिल लगाना ।

ना मुझे सुकून आता है ,
ना बेकरारी जाती है ,
ना उतरती खुमारी ,
ना ही वो मेरे पास आती है ।

ना दिल पूछता कोई सवाल ,
ना कोई जवाब होता है ,
ना कोई हाले दिल जानता ,
ना किसी को याद होता है ।

ना मिलता किसी से दिल ,
ना कोई दिल लगाता है ,
ना किसी से उलझता ,
ना किसी को सताता है ।

ना अब धड़कन का शोर हैं ,
ना ही दिल पर किसी का जोर है ,
ना कोई दिलबर है दिल लगाने को ,
ना ही दिल बचा है किसी का हो जाने को ।

ना जिस्म में अब जान बची है ,
ना ही वो पास खड़ी है ,
ना ही इश्क़ कोई अधुरा है ,
ना ही करना जिसे पूरा है ।

अब कुछ भी बचा नहीं ,
इस ना को हां बनाने में ,
बेहतर होगा जिंदा लाश को ,
किसी कब्र में दफनाने में ।।

Tuesday, September 28, 2021

तेरे जाने पर

तुम जाते जाते ,
क्या कुछ छोड़ कर ,
मेरे पास जाओगी ,
जब कभी आखिरी दफा,
अलविदा कहने आओगी ।

क्यों वो तुम्हारी ,
प्यारी सी मुस्कुराहट होगी ,
या होगी तुम्हारी खुमारी ,
या फिर इश्क़ में पड़ने वाली ,
लौट आयेगी मेरी बीमारी ।

या फिर होगा जिक्र तुम्हारा ,
तुम्हारी अनगिनत बातें होंगी ,
होगा पिटारा लम्हों का ,
कहानियां जिनमें तुम,
अक्सर छिपाती होगी ।

या फिर होगा वो मौसम ,
और बारिश की बूंदे ,
या फिर भीगा मन होगा ,
कल्पना से भी खूबसूरत ,
बीता हर एक पल होगा ।

या फिर होगा ,
अल्फाज़ का बिखरा रूप  ,
पहेली सा स्वरूप ,
और तेरी मेरी कहानियां ,
दीवारों पर टंगी तेरी निशानियां ।

या फिर होगी वो रात ,
जो बेताब होगी ,
अधूरी जिसकी हर बात होगी ,
खामोशी में शोर की ,
तुम्हारी वो आखिरी सौगात होगी ।।

Monday, September 27, 2021

मेरी जान

चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

इश्क़ में अब नहीं तुम्हें ,
अंजान कहते हैं ,
चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

पहली दफा सी मोहब्बत ,
हर रोज़ करते हैं ,
चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

खुद की जान तुम पर ,
हम कुर्बान करते हैं ,
चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

दिल की हर धड़कन को ,
सिर्फ तुम्हारे नाम करते हैं ,
चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

हर गुजरते लम्हें को ,
तुम्हारा पैगाम कहते हैं ,
चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

जिंदगी का हर पल ,
जिसके हिस्से नीलाम करते हैं ,
चलो आज से तुमको ,
हम जान कहते हैं ।

इश्क़ का तुमसे ऐलान ,
सरेआम करते हैं ,
चलो ना आज से तुमको ,
मेरी जान , हम जान ,
तुमको हम सिर्फ जान ,
अपनी जान कहते है ।।

फ़रियाद

फ़रियाद की है आज मैंने ,
खुदा से पहली दफा ,
बादलों से कह दो ,
थोड़ा बरस दे जरा ।

पहले भी आती थी बरसात ,
पहली दफा उसे वो बुला रहा है ,
बन कर बारिश भिगोने का ,
मन वो भी बना रहा है ।

दूरियां आज दरमियां हमारे ,
क्यों मीलों सी लग रही , 
उतर रही खुमारी तेरी और 
मेरी खुमारी अब चढ़ रही ।

सब कुछ पूरा हो कर भी ,
आज अधूरा लग रहा हैं ,
फरियाद खुदा से वो ,
तेरे बरसने की कर रहा है ।

रात के अंधेरे के किस्से नहीं ,
दिन के उजाले सी बन कर आना ,
भूल कर सब अंधेरों को ,
बस रौशनी से भर जाना । 

ये कैसा सा खुमार मुझपर अब ,
तेरा चढ़ने लगा है ,
हर एक पल खामोशी से जो ,
बेकरार करने लगा है ।

चंद फासले अब मिटने को हैं ,
या बिलकुल अब मिट चुके हैं ,
अल्फाज़ की पहेली अब ,
हम दोनों ही अब बन चुके हैं ।।

Sunday, September 26, 2021

इश्क़ का व्यापार

इश्क़ के कारोबारी को ,
उसका नफा नुकसान भाता है ,
जिस्म से मतलब नहीं ,
उसे तो रूह में बसना आता है ।

लोग सूरत देख कर ,
सीरत को खूबसूरत बताते हैं ,
इश्क़ के व्यापारी ,
सूरत देख ही कहां पाते है ।

शोर हो या हो कोई सन्नाटा ,
उन्हें हर शख्स भा जाता हैं ,
इश्क़ अधूरा गर जिंदगी में ,
किसी रोज़ किसी के रह जाता है ।

खुशियां देने का दाम ,
उनको भी मिलता है ,
कोई देता बेहद मोहब्बत ,
तो कोई बेवफा निकलता हैं ।

हर दफा टूट कर इश्क़ करना ,
आसन नहीं होता ,
नफा नुकसान से जिसके ,
व्यापारी कभी अंजान नहीं होता ।

हर इश्क़ में पड़ने वाले का ,
ये इकलौता कारोबार नहीं होता ,
कुछ होते है सिर्फ़ सौदागर ,
जिनका इश्क़ व्यापार नहीं होता ।।

हर सुबह इश्क़

ये जो रोज रोज ,
तुम जो इश्क़ बदलते हो ,
हर सुबह पड़ कर जिसमें ,
शाम को बिछड़ते हो ।

क्या दिल नहीं टिकता कहीं ,
या इश्क़ का तुम समंदर हो ,
डुबकियां लगाने की ख्वाइश में ,
किसी के मौत का मंजर हो ।

तुम हो भला कौन ,
पल भर में जो दिल लगाता हैं ,
चुरा कर मोतियां सिप से ,
इश्क़ की तलाश में निकल जाता है ।

दिल लगाना होता है आसान ,
इश्क़ निभाना उतना ही मुश्किल ,
सिर्फ जिस्म की ख्वाइश में ,
कहां पड़ता है कोई दिल ।

जिस्म नहीं रूह से ,
हमेशा उनके वो जुड़ता है ,
पल भर में जीवन भर की खुशियां ,
झोली में जिनके भरता है ।

सौदा इश्क़ का हो या शब्दों का ,
सौदागर वो कहलाएगा ,
पल भर की खुशियां हो या गम ,
उनके हिस्से कुछ जरूर छोड़ जाएगा ।

वो पूछती है आज भी उससे ,
तुम करते हो ऐसा क्यों भला ,
इश्क़ में तुमसा कोई इश्क़ करने वाला ,
आज तक तुन्हें क्यों नहीं मिला ।।

Friday, September 24, 2021

अंजान लड़की

देखो कितना वो मुस्कुराती है ,
हर दर्द चुपके से छिपाती है ,
कभी बिंदी कभी झुमके से ,
खुद को सजाती है ।

है मुश्किल रास्ते जिसके ,
आसान जिन्हें दुनिया को बताती है ,
जंग जिंदगी का अक्सर ,
खुद से लड़ते चली जाती है ।

इश्क़ मुकम्मल होता नहीं ,
फिर भी शिद्दत से निभाती है,
अक्सर तोड़ कर दिल अपना ,
इश्क़ में पड़ जाती है ।

ना मंजिल का पता ,
ना ठिकानों का कोई बसेरा है ,
अधूरे इश्क़ और कहानियां ने ,
बस उसे घेरा है ।

देखो मेरी निगाहों से खुद को ,
तुम्हारे आईने सी तस्वीर नजर आएगी ,
झूठी मुस्कान और अधूरी खुशियों ,
की दास्तां चीख चीख जो सुनाएगी ।

एक दफा इश्क़ को खुद से ,
शिद्दत से निभा के देखना ,
सब कुछ बदल जायेगा ,
तुमसा मोहब्बत वो भी करने लग जायेगा ।।

मैं और तुम

अधूरे ख़्वाब को जिकर ,
जब सुबह मैं उठा था ,
हर बार की तरह हारने पर ,
तू मेरे सामने खड़ा था ।

एक पल में सब ,
देखो कैसे बदल जाता है ,
जिस पल भी तू मेरे ,
सामने आ जाता है ।

तेरी मुस्कुराहट मुझे इश्क़ ,
तेरी आंखे दुनिया दिखाती हैं ,
तेरे दुपट्टे में राहत के पल ,
मेरा सुकून मुझे लौटाती हैं ।

तेरी फेरती उंगलियां का जादू ,
हर दफा तुझे जादूगर बनाती हैं ,
टूट जाने पर भी नम आंखों से ,
तू अक्सर मुस्कुराती है ।

इतनी मोहब्बत भला कैसे ,
तू मुझसे कर पाती है,
लाख जुल्मों सितम के बाद भी ,
मोहबब्त निभाती है ।

मैं और तुम ,
एक दूजे के लिए काफी हैं ,
बंध चुके रिश्ते में ,
ताउम्र के साथी है ।।

कल रात

तुम इसे आखिरी दफा ,
अब मान लेना ,
मेरी कोई आखिरी ख्वाइश ,
जिसे जान लेना ।

मांगा था पहली दफा ,
तुम्हारे वक्त का हिस्सा ,
करना था मुझे पूरा ,
अधुरा जो रह गया किस्सा ।

ये रात लगी लंबी मुझे ,
इस दफा तेरे इंतजार में ,
हर रात से अलग थी ये रात ,
जो कट रही थी तेरे प्यार में ।

ख्वाबों में तेरा जिक्र ,
पूरी रात मुझे आता रहा ,
पहली दफा तेरा इश्क़ मुझे ,
इस कदर सताता रहा ।

नींद सी मोहब्बत अब मैं ,
तुमसे करने लगा था ,
फुर्सत मिलते ही जिंदगी से ,
तुझमें खोने लगा था ।

पहेली से आज़ाद नहीं ,
मुझे इसमें कैद होना था ,
अल्फाज़ बन कर उसका ,
इन लम्हों को जीना था ।

पल कभी अब ये लौट कर ,
गुजरे वक्त सा आयेगा नहीं ,
तुझसे मांगू वक्त कभी और ,
अब ये हो पायेगा नहीं ।।