Monday, November 8, 2021

तुम कहो


तुम कहो तो तुम पर ,
एक किताब लिख दूँ ,
पूरी की पूरी अपने हिस्से की ,
कायनात लिख दूँ ।

तुम कहो तो तुम पर ,
सारी खुशियां लूटा दूँ ,
हर एक पल का कर्ज ,
बस एक पल में चुका दूँ ।

तुम कहो तो तुम पर ,
एक ग़ज़ल बना दूँ ,
अल्फाज़ के श्रृंगार से ,
तुमको सजा दूँ ।

तुम कहो तो तुम पर ,
एक नया धुन बना दूँ ,
तुम जैसे उसको भी ,
दुनिया को सुना दूँ ।

तुम कहो तो तुम पर ,
एक तस्वीर बना दूँ ,
हर रंग से भर कर जिसको ,
तेरी पहचान बता दूँ ।

तुम कहो तो तुम पर ,
अपना सब लूटा दूँ ,
होकर सिर्फ तुम्हारा ,
तुम्हें तुमसे चुरा लूँ ।

एक दफा कहो ना ,
तुम पर क्या बना दूँ ?

तुम पर चाँद सजा दूँ ,
या कायनात झुका दूँ ,
बस एक दफा कहो ,
तुम पर क्या बना दूँ ?

Saturday, November 6, 2021

तेरा इंतजार

शुक्रिया आप का ,
मुझे मेरे सुकून से मिलवाने के लिए ,
चंद लम्हों में अरसे भर की ,
खिलखिलाहट दे जाने के लिए ।

इन लम्हों को अब मैं ,
अपने पास सजा कर रखूंगा ,
तेरे लौट आने तक ,
दुनिया से छिपा कर रखूंगा ।

रहेगा इंतजार अब मुझे ,
तेरे लौट आने का ,
बेवजह ही किसी गैर को ,
मेरा अपना बताने का ।

वक्त ने आज मेरे हिस्से ,
कुछ वक्त दिया तो हैं ,
तेरी गैर मौजूदगी में भी ,
किसी ने तेरा जिक्र किया तो है ।

जिक्र मैंने भी किया है किसी का ,
पर वो जिक्र आज तेरा नहीं है ,
किस्से कहानियों में हैं जरूर वो ,
पर तुझ जैसे वो मेरा नहीं है ।

सवाल फिर तेरे जहन में आज ,
अनगिनत आ रहे होंगे ,
आखिर तुम्हें छोड़ कर हम भला ,
किसकी कहानियां सुना रहे होंगे ।

रहेगा इंतजार तेरे सवालों का ,
जो इस बार हम दोनों को उलझाएंगे ,
शायद बढ़ती दूरियां और मजबूरियां ,
दर्मियाँ हम दोनों के मिट जाएंगे ।।

तेरी बिंदी

तुम ख़्वाब में आई जब मेरे ,
माथे पर तुम्हारे बिंदी सजी थी ,
मेरे ख्वाइश को तुम ख़्वाब में ही सही ,
पूरा कर रही थी ।

तौफा मिला मुझे वक्त का तुम्हारे ,
पर बदले में मैं क्या दे गया ,
अपने दिल में छिपे कुछ राज़ ,
अनजाने में तुमसे कह गया ।

तुम सुकून हो मेरा या फिर ,
मेरा नींद उड़ाने आई हो ,
क्यों लगा कर माथे पर बिंदी ,
होठों पर मुस्कान लाई हो ।

हर सवाल का जवाब सच रहा ,
पर सवाल क्यों मुझे अधूरे लगे ,
तेरी मेरी बातों से तो हम दोनों ही ,
कुछ हद तक पूरे लगे ।

तुमको याद हर किस्सा है मेरा ,
और मुझसे जुड़ी हर बात ,
कह दे कोई ये ख़्वाब नहीं ,
सच में थी तुम मेरे साथ ।

हां ख़्वाब में ही सही ,
पर अपनी इस बदले श्रृंगार से ,
अब तुम और उलझाने लगी हो ,
जबसे माथे पर बिंदी लगाने लगी हो ।

ख़्वाब जब टूटेगा ये ,
जिंदगी मुझसे रूठ जाएगी ,
मालूम नहीं फिर लगा कर बिंदी ,
तुम मेरे ख़्वाब में कब आओगी ।।

तेरा जाना

आकर जो गई तुम मुझसे ,
लगा जैसे कोई खुबसरत लम्हा खो गया ,
मिलते ही जो एक पल में ,
अगले ही पल गुम हो गया ।

तेरे सुकून की तलाश में ,
वक्त उलझने भी बढ़ाता है ,
हर दफा जब वक्त देकर ,
तेरा वक्त बट जाता है ।

मेरी जिस खता से आज तुम ,
मुझसे खफा हो गई हो ,
कुछ हद तक लगा जैसे ,
मुझसे जुदा हो रही हो ।

ना लफ्ज़ सज रहे मेरे ,
ना तुम्हारा दीदार हो रहा ,
इंतजार का हर एक पल ,
मुझपर ही सवाल उठा रहा ।

तुमसे माफ़ी मांगना मेरा ,
आज काफ़ी नहीं होगा ,
मायूस दिल की खामोशी में ,
मेरा कोई साथी नहीं होगा ।

हर जुल्म हर सजा दे दो मुझे ,
मैं सबके लिए तैयार हूं ,
बस लौटा दो अपनी मुस्कुराहट मुझे ,
मैं जिसके लिए बेकरार हूं ।।

Friday, November 5, 2021

तेरा सवाल

ये सवाल पूछ कर तुमने ,
मेरे सच को झुठला दिया ,
तुम पर सजे शब्दों को ,
तुमने किसी और का बता दिया ।

माना की श्रृंगार में बिंदी ,
तुम माथे पर लगाती नहीं ,
खुद को आईने में भी ,
बिंदी से सजाती नहीं ।

हां ख्वाइश भर होने से ,
वो पूरा नहीं हुआ करता ,
जब तक ख्वाइश करने वाला ,
दिल में नहीं रहा करता ।

तुम्हारे झुमके तुम्हारी जुल्फ ,
और होठों की मुस्कान ,
काफी हैं तुम्हें सजाने के लिए ,
मेरे हिस्से की ख्वाइश मिटाने के लिए ।

देखे बगैर लिखा मेरा ख्याल ,
मेरी दिले ख्वाइश थी ,
देखने के बाद लिखा शब्द ,
लम्हों की फरमाइश थी ।

आप से तुम का सफ़र ,
बड़े शिद्दत से आया था ,
आज फिर एक सवाल ने ,
मुझे तुम से आप बनाया था ।

माना की है दायरा तुम्हारा ,
और तुम्हारी अपनी ही उलझन ,
पर पढ़ तो लेती वो किताब भी ,
लिखा था जिसमे मेरा मन ।

कहना तो बहुत कुछ है मुझे ,
तेरा पता मिल जाने पर ,
था नहीं मालूम पूछोगी सवाल ,
जवाब आ जाने पर ।।

भाभी


आईं बन कर लक्ष्मी घर की ,
हम सबकी प्रेरणा बन गईं ,
अंधकार से भरे आँगन को ,
देखो रौशन कर गईं ।

मकान को घर बना कर ,
सबके भीतर का भेद मिटाया ,
सबसे उसका दुःख दर्द बाँटकर ,
साहस देकर फ़र्ज़ निभाया ।

ठोकर लगे रास्तों में कितने ,
रिश्ते भी अक्सर उलझ गए ,
पर ना हिली नज़र मंजिल से ,
उलटे पुल्टे पर सुलझ गए ।

हिम्मत ना हारीं हार ना मानी,
पग पग पर साहस वो देतीं हैं ,
अपनो की खुशियों का ही शृगार,
सदा वरण वो करती हैं ।

आज वक्त उन्हें सब लौटा रहा ,
हर त्याग परिश्रम का फल बता रहा ,
उनके हिस्से की सारी खुशियां ,
उनके झोली में ला रहा ।

आसान नहीं था सफर जिंदगी का ,
लड़ कर उसे आसान बनाया हैं ,
हर उलझन को जिसने ,
खुद ही सुलझाया है ।

फटकार भी जिनकी हर वक्त सदा ,
प्यार दुलार सी लगती है ,
कड़वी कड़वी पर सख़्त बात भी ,
माँ के प्यार सी लगती है ।

हर माँ के लिए छवि हैं आप ,
और हर पत्नी के लिए विश्वास ,
करुणा और प्रेम से पूर्ण ,
हमारी ताउम्र रहेंगी आखिरी आस ।।

उलझन

तुम और तुम्हारी नज़रंदाजी ,
आज भी मुझे उलझाते हैं ,
जब कभी मेरे पते पर ,
तेरा कोई तौफा लेकर आते हैं ।

तंग मैंने तुमको किया कहां ,
वो तो बेवजह एक शरारत हैं ,
पहले रोज़ से आज तक ,
तुम्हारे लहज़े की नजाकत है ।

हर रोज़ मिलना और बिछड़ना ,
तुम्हें क्या खूब भाता हैं ,
आने से पहले ही जो अक्सर ,
जाने का वक्त बताता हैं ।

दिल का हाल भला तुम्हारे ,
तुमसे बेहतर कौन ही जानता होगा ,
हर किसी के दिल में ,
जो अपनी तस्वीर मानता होगा ।

सबसे अलग सबसे खुबसूरत ,
तुमसा ही एक गहना हैं ,
आज तक जिसे कभी तुमने ,
अपने माथे पर नहीं पहना हैं ।
 
भला अपने सुकून को तंग कर के ,
मुझ जैसे कौन चैन से सोया होगा ,
ना जाने कितनी दफा किसी सन्नाटे में ,
मेरे आसुओं ने तकिया भिगोया होगा ।
 
इंतजार में तुम्हारे और कितना ,
खुद को ऐसे उलझाऊंगा ,
एक रोज़ तो तुम्हारा भी ,
वो "कल" सामने ले आऊंगा ।।

तेरा झुमका

बदला कुछ भी नहीं ,
आज भी तेरे श्रृंगार में ,
तरस रही मेरी निगाहें ,
आज भी तेरे दीदार में ।

फर्क बस इस दफा ,
लिबास में नजर आया ,
रंग काला हाथों पर ,
जिस्म श्वेत से ढका पाया ।

झुमके तो आज भी ,
हुबहू पहले से लग रहे थे ,
शायद इस दफा मुझे छोड़ ,
किसी और से कुछ कह रहे थे ।

हम तो आज भी उन झुमकों से ,
दिल लगाए बैठे हैं ,
उन झुमकों सा खुबसूरत ,
उसे भी मान बैठे हैं ।

बताओ ना और क्या छिपा हैं ,
जो तुम्हारी खूबसूरती बताता हैं ,
रंग श्वेत हो या हो काला ,
सब तुम पर खिल जाता है ।

आज फिर जब देखा तुम्हें ,
बस तुम्हारे झुमके नज़र आए ,
इस दफा थे वो मिलने ,
थोड़ी फुर्सत से आए ।

पता नहीं और कितने ,
तुम्हारे झुमकों पर मरते होंगे ,
हम जैसे शायद वो भी ,
इन झुमको से इश्क़ करते होंगे ।

अच्छा सुनो .. 

खूबसूरत तुम भला कितनी भी हो ,
झुमके की खूबसूरती से हार जाओगी ,
देखना कभी अपनी तस्वीर मेरे निगाहों में ,
बस झुमके ही देख पाओगी ।।

तेरा पता

अपना पता बताने के लिए ,
दुनिया को मेरा पता बता रही थी ,
उस रोज़ जब दुनिया को ,
अपने तौफे के किस्से सुना रही थी ।

पता करू मैं किसका पता ,
पता नहीं किसको क्या क्या पता ,
ये कैसा पता मुझे उलझा रहा है ,
दिल मेरा तेरे पते पर आ रहा है।

उफ्फ .. इसका पता मुझे भी ,
तुम्हारे दिल से पता चला है ,
लेकिन मेरे दिल का पता ,
अब तक तुम्हें कहां पता है ।

तुम्हारा वो पता जिसका पता ,
सिर्फ मुझको पता है ,
कल खामोश क्यों था मैं ,
ये सिर्फ़ हम दोनों को पता है ।

जिस पते पर हो तुम अभी ,
उस पते का पता मुझे पता है ,
पर क्या उस पते पर ,
मेरा कोई तौफा पड़ा है ।

गर नहीं तो ढूंढ लेना उस पते को ,
जो की तुम्हें पता है ,
मेरा पता भी शायद ,
वही पता है ।

वो शहर कौन सा है ,
जिस शहर से तेरा पता जुड़ा है ,
रास्ता जिस शहर का ,
तेरे पते से जाकर मुड़ा है ।

पता नहीं और कौन सा पता ,
दिल को पता लगना बाकी हैं ,
क्या पता दोनों का पता ,
एक हैं .. गर दिल राज़ी है ।।

Thursday, November 4, 2021

इज़हार सा इनकार

हर हां में उसने जब मुझे ,
अपनी पहली ना से मिलवाया ,
लगा जैसे मेरा कोई ख़्वाब ,
सच होने को है आया ।

उसकी मौजूदगी मेरी जिंदगी में ,
अब कुछ हद तक बढ़ने लगी हैं ,
मुझ जैसे शरारत वो भी ,
अब मुझसे करने लगी हैं ।

उससे जुड़े मेरे अल्फाज़ ,
हर किसी को अपने से लगते हैं ,
पर ना जाने क्यों मेरा हर सच ,
उसे किसी झूठे सपने से लगते हैं ।

वो मेरा कल का हिस्सा नहीं ,
पर कल का हर जवाब होगी ,
पते का चलने पर पता ,
जब हमारी पहली मुलकात होगी ।

हर गुज़ारिश को नामंजूर करके ,
देखो वो क्या जाता रही हैं ,
पास तो थी नहीं कभी मेरे ,
पर अब मुझसे दूर जा रही है ।

उस जैसा सुकून जिंदगी में ,
जिंदगी से अब तक क्यों दूर हैं ,
उसके इज़हार से इनकार में भी ,
छिपा किसी इश्क़ का फितूर है ।।

Tuesday, November 2, 2021

एक सफ़र

मिला था मैं किसी ऐसे सच से ,
जिसको सब झूठ पता था ,
सच मेरे हिस्से का जो  ,
अब तक दुनिया से छिपा था ।

बेहद उलझन के बाद ,
कुछ शोर मुझ तक आया था ,
खामोशी को छोड़ कर अपने ,
वो पहली दफा कुछ कहने आया था ।

रात के सन्नाटे और मेरा सच ,
अब वो दोनों जान रही थी ,
बड़ी उलझन भरी निगाहों से ,
खुद को आईने में देख रही थी ।

मेरे हर शब्द में कुछ सच ,
और कुछ छिपे एहसास थे ,
पहली दफा दूर होकर भी ,
लग रहे जो मेरे पास थे ।

मुझको रोका नहीं उसने ,
पर मैं खुद रुक गया ,
कहते कहते सच अपना ,
एक झूठ कह गया ।

खूबसूरत लम्हों की सौगात ,
जो खामोश रह कर दे आई ,
अपनी मौजदगी से उन लम्हों को ,
तुम खुशियों से भर आई ।

हो गया सफ़र शुरू हमारा ,
जो अब तक ना हो सका था ,
मेरे आप से तुम के उलझन में ,
जो आज तक रुका था ।।

तेरा तौफा

तौफा मिला मुझे आज ,
जब उसने आने में वक्त लगाया ,
देने को तैयार खड़ा था पता मैं ,
पर वो पूछने कहां आया ।

लगा जैसे पहली बार ,
कोई बिना मांगे कुछ देने वाला है ,
था नहीं मालूम मुझे ,
वक्त नहीं था ऐसा कुछ कहने वाला है ।

पल भर की ख़्वाब वाली खुशी ,
कैसे ताउम्र का गम बन जाती हैं ,
इंतजार में जिंदगी किसी तौफे के ,
बिना मिले ही कट जाती है ।

अब मुश्किल और उलझन से ,
गुजरते तो अरसा हो चला हैं ,
शुक्र है वक्त का मेरे ,
जो अब आगे बड़ चला है ।

कोई कहता हमें तौफा नहीं ,
आप कोई सज़ा सुनाई ,
कौन बताए उनको ,
की एक दफा सज कर तो आइए ।

आप के गुनेहगार भला ,
क्या ही तौफा ले पायेंगे ,
हमेशा की तरह आप के हिस्से ,
वो चंद अल्फाज़ छोड़ जायेंगे ।

देखते हैं ख़त्म करके

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़ी बातें ,
वो चंद मुलाकाते ,
चांद और तारों के संग ,
कटने वाली वो रातें ।

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़े जज़्बात ,
बदलते हमारे हालत ,
और अधूरे किस्सों की ,
एक खूबसूरत सौगात ।

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़े अल्फाज़ ,
जो खूब बखूद बन जाते हैं ,
हर दफा जब भी ,
तुझे खुद से जुड़ा पाते हैं ।

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़ा सवाल ,
जो आज भी मुझे उलझाता हैं ,
हर दफा खामोश लब पर शोर ,
और धड़कने बढ़ाता है ।

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़ा हर जिक्र ,
जो तस्वीर मेरे आंखों में सजाता है ,
हर किसी चेहरे में मुझे ,
बस तेरा ही चेहरा नजर आता है ।

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़ी जिंदगी ,
जो अब तक हमें जिंदा रखे थी ,
तुम्हारे खिलखिहट को आज तक ,
ताउम्र का सच मान बैठी थी ।

देखते हैं ख़त्म करके ,
तुमसे जुड़ी अनगिनत कहानियां ,
जो हम दुनिया को सुनाते थे ,
हर दफा घर छोड़ कर जब ,
तुम किसी और घर चले जाते थे ।

चलो अब सब कुछ ,
ख़त्म करके देखते हैं ।।