Thursday, March 17, 2016
माँ
Friday, February 5, 2016
साथ
Thursday, December 24, 2015
मेहँदी
कल को ,
तू याद आती है ,
ना कोई सवाल , ना कोई जवाब ,
बस हाथो पर सजी मेहँदी नजर आती है .
यु चल रहे सिलसिले को ,
ना जाने वो क्यों तोड़ गए ,
एक दफा पूछा भी नहीं हमसे ,
बिन कुछ कहे मुह मोड़ गए .
उस रोज़ खुलते ही आँख ,
तेरी हाथो पर रंगी मेहँदी नजर आई ,
मानो ख्वाबो मे से ,
मेरे पीछे पीछे थी तू चली आई .
खुश हुआ ये जान कर ,
बिना कुछ मांगे पहली बार मिला था ,
पर क्या पता था ,
बस वही आखरी बार तेरे जहन मे ,
हमारा ज़िक्र हुआ था .
कभी रुखसाना बन हमे जलाती ,
कभी बड़ी बड़ी बातो से अपना बनाती ,
हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते ,
झेलना जब उन्हे तक़दीर मे लिखा था ,
हम कैसे तक़दीर के खिलाफ जा पाते .
चल पड़ा था ये सिलसिला ,
कई दफा टूटने के बाद ,
जानने लगे थे तुझको कुछ हद तक ,
बहुत कोशिशो के बाद .
नहीं पता वजह क्या है ,
और अब जानना भी नहीं ,
तू जो गयी दूर ,
जरूर होगी तू मजबूर .
वरना कल तक साथ निभाने वाले ,
आज यु दूर ना जाते ,
तोड़ कर अपने दिल को ,
हमे ना कुछ बताते .
एक दफा पूछ लिया होता मुझसे ,
जो थी अगर कोई बात ,
बिना कुछ कहे ,
क्यों छोड़ गयी तू मेरा साथ .
मेहँदी लगे हाथो पर तेरे ,
कदम चूमे तेरे खुशिया हज़ार ,
वादा है मेरा , जो बस चला दिल पर ,
अपने नाम की मेहँदी तेरे हाथो पर ,
ये ख्यालो मे भी ना सोचेंगे यार .
तेरी मेहँदी एक पहेली है ,
जानता हु तू आज बहुत अकेली है ,
पर हम क्या कर पाएंगे ,
जब आप यु ही हमे हर दफा अधूरे मे ,
अपनी हाथो पर सजी मेहंदी के यादो संग ,
छोड़ जाएंगे .
माँ ... माँ होती है
Sunday, November 15, 2015
बेटियाँ .. माँ की परछाईं
Sunday, September 20, 2015
इंतज़ार
Tuesday, July 7, 2015
ख़ुशी
Tuesday, June 30, 2015
बेपरवाह आशिक़ी
Wednesday, April 29, 2015
काश .... ये पल थम जाए
हम तुझे मीलों दूर से निहारा करते थे ,
धर्म , जात , रूप रंग , सब भूल भाल के ,
तुझसे ही मोहब्बत करते थे .
मिली जो नरजे कभी कभार ,
तेरी निगाहो को स्वेत हम पाते ,
झट से जाकर ख्यालो मे ,
अपनी तस्वीर से उन्हे रंग जाते .
हर दफा जो हमने इजहार किया ,
तब तब उन्होने इंकार किया ,
पर दिल को तेरा इंकार ना भाया ,
कमबख्त खाकर भी ठोकर कई दफा ,
तेरे पीछे चला था आया .
मेरी कोशिश जहा एक ओर जारी थी ,
वही तू किसी और को भी लगती प्यारी थी ,
पर किस-किस से तुझे बचाता ,
कमबख्त दिल तो आखिर दिल है ,
मुझपे ना सही किसी और पे ही आ जाता .
जो पहली और शायद आखिरी दफा ,
हम बेहद करीब आये ,
हम उन्हे देख ,
और वो उसे देख मुस्कुराई ,
तब जा कर ,
हम तो कभी थे ही नहीं ,
ये बात समझ आई .
बस वक़्त से गुजारिश है ,
काश ये लम्हा यु ही थम जाए ,
जो कह ना पाया दिल अब तक दिल से ,
वो दिल से आज कह जाए .
तू थी नहीं मेरी ,
पर पाने की कोशिश हर पल करता रहा ,
ख्यालो मे ही सही तुझे अपना बनाऊंगा ,
कौन कहता है एक तरफ़ा मोह्हबत नहीं होती कामयाब ,
मैं ऐसा कर दिखाऊंगा .
उम्मीद का दीया ,
जल रहा है दिल के संग ,
आखिर सांस तक उसे जलाउंगा.
तेरी तस्वीर बसा कर निगाहो मे ,
तुझे हर वक़्त खुद के करीब पाउँगा .
जो ठहर जाए ये लम्हा ,
तो इसे अपनी रग रग मे बसा लू ,
इस वक़्त की खशबू से ,
समां को खुशनुमा बना दू .
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मरा नहीं , आवाज़ बना हु
Sarकार बनता हु ,
उम्मीद भरी नजरो से टक-टकी लगता हु ,
पर साल दर साल सरकार बदल जाते ,
हम जस के तस उन्हे देखते रह जाते .
क्या फर्क पड़ा लोगो को ,
जो देख मुझे लटके ,
थोड़ा भी ना घबराये ,
सोचा था शायद सरकार बचा लेंगे मुझे ,
पर मेरे मरने तक वो माइक भी ना पकड़ पाये .
एक वक़्त हुआ करता था ,
जब सरकार खम्बों पर चढ़ जाते ,
पर हाय रे राजीनीति ,
देख कैसा हुआ तेरा असर ,
मानस को भी लटके देख ,
वो ख़ामोशी के पल्लू मे छिप जाते .
मैं मौत मरा गरीबी की ,
पर वो क्यों मुझे बचाते ,
मैं बच जाता ,
तो वो घड़ियाली आंसू कैसे बहाते .
मैं बड़ी उम्मीदो से उनके कहने पर आया था ,
पर हुआ हैरान देख कर बदले रंग उनके ,
जब सरकार ने मेरे अपनों पर ही ,
मुझे बेघर करने का आरोप लगाया था .
एक ओर मौसम की मार पड़ी थी ,
खेतो मे लक्ष्मी लाचार पड़ी थी ,
तो वही साहेब के खातिर ,
सरकार हमे ग्राहक बनाने को बेक़रार खड़ी थी .
मैं मरा या मारा गया ,
सोच कर ये ,
खुद को ठगा पता हु ,
कही कोई और ना ठगा जाए ,
मुझ जैसा ,
सोच यही घबराता हु .
मेरी मौत का फैसला सही था या गलत ,
आप ही बताये ,
क्या अब जागेगा किसान ,
या फिर ठगा जाएगा ,
सोच यही मन घबराये .
मैं मरा नहीं , आवाज़ बना हु ,
चिंगारियों से मिल कर आग बना हु ...
जलाये रखियेगा इस आग को ... शायद समां इससे ही रोशन हो जाए
Friday, February 13, 2015
इश्क़-ए-इज़हार
यु ना बजती घंटी जो ,
उस रोज किसी यार की ,
दिल दे बैठा होता उसको ,
जो किसी और की ''इश्क़-ए-इज़हार'' थी .
पहली दफा जो देखा उसे ,
तो बीत चुके थे वर्षो ,
पर कमबख्त वक़्त ने किया इशारा ,
अरमानो संग अभी और तरसो .
मैंने जो पूछा उससे ,
उसके दिल का हाल ,
कह गई मुस्कुरा के मुझसे वो ,
मेरा दिल तो किसी और ने रखा है संभाल .
सुनते जिसे दिल मेरा टूटने को आया ,
कोसने लगा मुझको ,
उस रोज क्यों था तूने ,
उसका फ़ोन उठाया .
होंठो पर लाकर झुठी हंसी ,
दिल मे उठे दर्द को दफना गया ,
इस जन्म मे ना सही ,
अगले जन्म वाला फार्मूला याद आ गया .
अगली ही मुलाकात मे ,
हाथो मे लेकर उसका हाथ ,
अपने और करीब लाया ,
कह गया वो मैं ,
जो अब तक था दिल कह नहीं पाया .
सुन कर मेरी बात को ,
वो झट से मुस्कुराई ,
कहनी लगी पागल ,
ले छीन उससे दिल अपना ,
इसी जन्म मे मैं तेरे लिए लाई .
जिसकी बातो से , आँखों से , आवाज़ से , अदा से ,
करने लगा था मोहब्बत ,
आखिरकार वो मेरे खातिर दिल अपना छीन लाई ,
लगा जैसे मिल गया था सब कुछ ,
तभी माँ जोर से चिल्लाई ,
उठो नालायक .... सुबह होने को आई .
हाय रे ये तन्हाई ,
होश मे तो वो रहती ही थी ,
ख्वाबो मे भी उसको ,
अपने संग ले आई ...
हाय रे ये तन्हाई ,
हाय रे ये तन्हाई ....
Tuesday, October 28, 2014
दिल है की मानता नहीं
तो तेरी आँखे बुरा मान जाएंगी ,
गाल के तिल पर आजाये दिल अगर ,
तो जुल्फ को आँचल बना वो उन्हे छिपाएंगी .
आज भी सोचता हु ,
तुम हो कौन , और क्यों हम मिले ,
उड़ता हुआ पंक्षी हुआ करता था ,
तेरी खूबसूरती के जाल मे कैसे हम फंसे .
तेरे इंकार को इजहार समझ बैठे ,
सोचा जो था ना कभी ,
वो दिल का हाल कर बैठे .
तेरी पहली झलक जितनी हसीन थी ,
अंदाज़ से तू उतनी ही नमकीन थी ,
चहेरे पर लिए हुस्न का भंडार ,
दिल को कर दिया मेरे तार तार .
घायल तो कर दिया था पहली नजर मे तूने ,
पर फिरसे अब जख्म ताज़ा होने लगे थे ,
जहा उम्मीद कर रहा था जख्मो पर मरहम की ,
वहां तुम अपनी बेरुखी से उन्हे खरोच रहे थे .
सोचता हु कभी कभी ,
तुम तो करीब आने से रही ,
हम खुद ही दूर चले जाते है ,
पर क्या करे इन निगाहो का ,
जो हर किसी मे तेरा ही अक्स पाते है .
...... एक आखिरी तोफा तेरे लिए
Monday, September 29, 2014
ये तुम .... कही तुम तो नहीं
पर मैं बेसुरा कैसे गा कर हाल ए दिल सुनाऊ .
यु तो तेरे जाने के बाद ,
तेरी मौजूदगी का आभास हुआ ,
और जब तू लौट कर आई ,
तब आईने संग मेरी निगाहो को ,
तुझसे मोहब्बत का एहसास हुआ .
तुझे देख कर ही ,
सुबह की शुरुआत होती है ,
तेरी ही मुस्कुराहट से ,
चहरे पर मेरे मुस्कान होती है .
यु तो कभी ऐसा हुआ नहीं ,
तुझ जैसे यहाँ पहले कभी ,
किसी ने भी था ,
दिल को छुआ नहीं .
ये जानते हुए भी ,
तेरी मोह्हबत पर किसी और का राज है ,
दिल हर रोज़ तुझपर आज जाता है ,
और हमेशा की तरह ,
अपनी बातो को कहने से रह जाता है .
तेरा मुस्कुराना , तेरा रूठ जाना ,
आईने से हमसे नजरे मिलाना ,
तो कभी खो कर कही और ,
भूल कर जमाने को हमे देखते रह जाना .
तेरी हर अदा को निगाहो से तो नहीं ,
पर दिल से देख लेता हु ,
चाहत का तो पता नहीं ,
पर हर रोज़ कुछ लम्हों के लिए ही सही ,
तुझसे मोह्हबत कर लेता हु .
ये पता नहीं ,
इस रिश्ते का आगे क्या होगा ,
पर जहा तक बात तेरी मौजूदगी की है ,
मेरे हर लम्हे मे तेरा जिक्र होगा .
सोचने लगी हो अगर तुम ,
ये तुम कही तुम तो नहीं ,
तो फिक्र मत करो ,
अगर नहीं मंजूर मेरी मोहब्बत ,
तो ये तुम , तुम नहीं .
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