Saturday, September 24, 2022

मेरा रकीब

अपनी वो मुस्कराहट ,
अब बस मुझे लौटा दो ,
एक और दफा इस मुसाफ़िर को ,
उसकी मंजिल तक पहुंचा दो । 

इस जंग में साथ तुम्हारे ,
मैं हर पल खड़ा रहूंगा ,
खुद को बेहतर बनाने की ,
एक आखिरी कोशिश करूंगा ।

मेरे शब्दों को चुरा कर मुझसे ,
तुम कौन से किस्से लिख रही हो ,
सब कुछ कर के मेरे हिस्से ,
अपने हिस्से क्या कर रही हो ।

इश्क़ में बर्बाद हो कर ,
भला किसे दुआ मिली हैं,
मुझे तो तेरे आने के बाद ,
लगा जैसे जिंदगी मिल गई है ।

क्या इश्क़ में मुझ जैसा ,
कोई और भी बदनसीब होगा ,
जिसकी मोहब्बत में ,
वो खुद ही रकीब होगा।

मधु की मोहब्बत

खामोशी में मेरे शोर को ,
अब सुनना छोड़ दो ,
अपने हिस्से के गम भी ,
तुम मेरी ओर मोड़ दो ।

मैं इश्क़ निभा कर तुमसे ,
हर रोज़ तुम्हें रुलाता हूं,
कर के जुल्म खुद से ,
गुनहगार तुम्हें बताता हूं ।

फिर भी साए की तरह ,
तुम मेरे साथ चलती हो ,
मेरी ख्वाइशों के आगे ,
अपने अरमान कुचलती हो ।

ना पता दिन का तुम्हें,
ना रात का इंतजार है ,
मेरी ही दुनिया में ,
बसा तुम्हारा संसार है ।

सब कुछ लुटा कर भी ,
तुम कैसे मुस्कुरा लेती हो ,
छिपा कर हर गम अपना ,
मुझसे इश्क़ निभा लेती हो ।

सच सच बताना ,
मुझसे भी बेहतर ,
कैसे मुझे पढ़ रही हो ,
खुद से भी ज्यादा ,
मुझसे मोहब्बत कर रही हो ।।

Wednesday, August 31, 2022

खैर छोड़ो

क्या गुजरना है तुम्हें ,
किसी अनछुए शोर से ,
इस दफा गुजरने देना ,
दोनों ही ओर से ।

तुम रोक कर मुझको ,
अब और कितना जलाओगी,
खाक में मिलाते मिलाते मुझे ,
मुझमें ही मिल जाओगी ।

सब्र का बाढ़ तोड़ कर ,
हद से बेहद हो जाओ ,
एक और दफा शिद्दत से ,
पहेली बन जाओ ।

चंद लम्हों में पूरी जिंदगी ,
इस दफा जी आते हैं,
बन कर कोई ख़्वाब,
तुझसे गुजर जाते हैं ।

हां इस दफा .. थोड़ा ,
खैर छोड़ो,
कुछ नहीं ..
हम लौट जाते हैं ।।

Thursday, July 21, 2022

सौदेबाज का इश्क़

क्यों नहीं ठहर कर ,
थोड़ा आराम करते हो ,
एक से ही सही ,
इश्क़ खुलेआम करते हो ।

दिल की धड़कनों का सौदा ,
सरेआम करते हो ,
दाम लगा कर इश्क़ का ,
उसे नीलाम करते हो ।

क्यों करते हो इश्क़ ऐसा ,
जिसमे कत्लेआम करते हो ,
कत्ल तुम करो किसी का ,
पर इल्ज़ाम उसके नाम करते हो । 

इश्क़ के किस्सों में ,
जो इश्क़ को बदनाम करते हो ,
किसी गैर की मोहबब्त ,
किसी गैर के नाम करते हो ।

क्या इश्क़ में सीखा यही ,
या किसी ने दिल दुखाया है ,
इश्क़ में पड़ कर भी ,
क्यों इश्क नहीं मिल पाया है ।।

तुम्हारी कहानी

ख्वाइशों में कैद जिंदगी जिसकी ,
ख़्वाब भी उसके अधूरे हैं ,
मिला सब कुछ बिखरा जिसको ,
फिर भी कहते हम पूरे हैं ।

उंगली थाम कर अपनी ,
जिसने चलना सीखा है ,
बचपन में खुद को ,
बड़ा होते देखा है ।

ना साथ मिला कभी ,
ना कोई साथी बन पाया ,
मतलब होते पूरा ,
हर किसी ने उसे गैर बनाया ।

आज भी घर की तलाश में ,
वो कैद हो जाते हैं,
किसी और पिछड़े में जाकर ,
अनजाने में फस जाते हैं ।

मंजिल की तलाश और घर ,
वक्त आने पर मिलेगा ,
किसी रोज़ कोई अजनबी ,
जब उसे अपना कहेगा ।

बाकी और भी जंग ,
अभी बाकी है ,
रखना भरोसा ,
तू खुद में काफी है ।।

Thursday, June 30, 2022

इश्क़ के किस्से

इश्क में और भी गम ,
हमें हर रोज़ सताते हैं,
मरहम सोच कर जब वो ,
घाव को खरोचने लग जाते हैं।

उम्मीद लगा कर बैठे हम ,
जिसे हर रोज़ वो तोड़ जाते हैं ,
वादा आखिरी मंजिल का कर के ,
बीच रास्ते कहीं छोड़ जाते हैं ।

सिलसिला इश्क़ में बेवफाई का ,
अब बड़ा ही आम है ,
सुबह को है जो आप की जिंदगी ,
शाम में उससे जिंदगी अनजान हैं ।

इश्क़ में अकेला होना बेहतर है ,
तन्हां होने से ,
इश्क़ में ना होना बेहतर है ,
हर रोज़ रोने से ।

आप भी तो इश्क़ में हैं ,
या इश्क़ तलाश रहे हैं ,
आप का इश्क़ कैसा था ,
जिसके आप पास रहे हैं ।

Wednesday, June 29, 2022

दाग़

ये इश्क़ जिसमे दाग़ हैं,
वो इश्क़ में दिखता क्यों नहीं,
बिछड़ने पर महबूब के ,
कभी मिटता क्यों नहीं ।

ना होती उनसे कोई शिकायत ,
और ना जुल्म उनके नज़र आते ,
आते ही जिंदगी में किसी इश्क़ के ,
वो गुनेहगार बन जाते ।

साथ जो सुंदर और अटूट होता ,
कैसे मैला होकर छूट जाता हैं,
बदलाव के इस दौर में ,
शायद इश्क़ से मन भर जाता है ।

पर उन लम्हों का क्या ,
जो आज भी तन्हा बैठे हैं ,
आप के गुजर जाने के बाद भी ,
आप के इश्क़ को ही ,
जो सब कुछ मान बैठे हैं ।

किसी दाग को मिटा कर ,
कोई और दाग़ हम लगाते हैं ,
श्वेत चादर ओढ़े इश्क़ पे ,
अक्सर दाग़ छोड़ जाते हैं ।

पर कोई तो इस दाग को भी ,
खुद ही मिटाएगा ,
इश्क़ में सिर्फ किसी एक के ,
खुद को रंग जाएगा ।

कहीं वो आप तो नहीं ....!

Saturday, June 18, 2022

गुनाह

तुमको पाकर भी शायद ,
खो दिया है मैंने ,
बंद दरवाजों में बहुत ,
रो लिया है मैंने ।

इश्क़ निभाते निभाते ,
कब ज़ख्म कुरेतने लगे ,
फेरती उंगलियों से ,
अब गला रेतने लगे ।

तुम पर लूटा कर सब ,
मैं खुद लूट गया ,
महल के ख़्वाब देखते देखते ,
कहीं सड़क पर सो गया ।

वादा किया था निभाने का ,
वो भी तुम तोड़ गए ,
इश्क़ में तन्हाई मेरे हिस्से ,
तुम जाते जाते छोड़ गए ।

वक्त के साथ तुम ,
सब कुछ बदलने लगे हो ,
मुझे छोड़ कर ,
किसी गैर से मिलने लगे हो ।

खैर ,
इश्क में बहुत बदनाम सुने होंगे ,
पर बर्बाद कभी सुना है क्या ,
इश्क़ के बदले इश्क़ मांगना ,
कोई गुनाह है क्या ?!।

Thursday, May 26, 2022

पहेली का दरवाज़ा

एक रिश्ता है अल्फाज़ का ,
उलझी जिसकी पहेली हैं,
दुनिया से बिलकुल परे ,
वो किसी खिड़की पे खड़ी अकेली है ।

बारिश की हर बूंद जिसके ,
मन को भीगा रही हैं,
लौट कर फिर से वो ,
अल्फाज़ में उलझी जा रही है ।

कल्पना के इस सफ़र में ,
गर कोई उसका साथी हैं,
महज मौजूदगी ही जिनकी ,
दोनों के लिए काफी है ।

अल्फाज़ के लिए वो पहेली ,
पहेली के लिए उसके अल्फाज़ हैं ,
क्या खूब छिपा लेते दोनों ,
एक दूसरे के जज़्बात हैं ।

है बहुत कुछ आज भी अधूरा ,
वक्त जो पूरा कर जाएगा ,
खोल कर दरवाज़ा जब कभी ,
वो दिल में उतर जाएगा ।

खोल कर दरवाजा ,
पहेली आज पहले ही खड़ी हैं ,
ना कोई हलचल ना हड़बड़ी ,
वो बिल्कुल खामोश पड़ी है ।।

Wednesday, May 25, 2022

अंधेरा इश्क़

इश्क़ निभाने रात में ,
वो सिर्फ़ अंधेरी रातों में आता है ,
दिन के उजाले से पहले ही ,
कहीं और गुम हो जाता है ।

ना लगाता दिल किसी से ,
ना दिल में बस पाता हैं,
सौदा खूबसूरत रातों का कर के ,
सौदागर बन जाता है ।

अंधेरी रातों में अक्सर ,
ये इश्क़ करने जब आता है ,
इश्क़ का तो पता नहीं ,
पर तन्हाई मिटाता हैं ।

भूल कर अपनी मोहब्बत ,
कैसे हर कोई इसका हो जाता हैं ,
तन्हा रातों में जब कभी ,
ये दरवाज़े पे आ जाता है ।

एक रात का इश्क़,
आज कल हर रात हो रहा हैं,
बन कर महबूब किसी गैर का ,
किसी गैर की बांहों में सो रहा है ।

जिस्मानी इश्क़ में ,
रूह ना जाने कहां खो गई ,
आज रात इस डगर ,
कल कहीं और सो गई ।।

बेवफ़ा को वफ़ा

मेरे इश्क की परिभाषा बदल कर ,
तुमने इश्क़ करना सीखा दिया ,
हर मुश्किल को पार कर के ,
तुमने मुझे मुझसे मिलवा दिया ।

सह कर मेरे हर दर्द को ,
मुझे चोट से बचाती रही ,
अधूरे इश्क़ को मेरे ,
दुनिया को पूरा बताती रही ।

तुमसे करके वादा वफा का ,
बेवफाई मैं निभाता रहा ,
दिल में बसी हो तुम कह कर ,
आंखे किसी गैर से मिलाता रहा ।

परवाह नहीं की तुमने कभी ,
तुमको इस इश्क़ में क्या मिला ,
तुमने तो सब कुछ लुटा दिया ,
क्या अच्छा और क्या बुरा ।

तुम बन कर प्रेरणा मेरी ,
मुझे इश्क़ सिखाने लगी हो ,
मेरी हर उलझन को ,
एक पल में सुलझाने लगी हो ।

खैर ,

इश्क़ में चंद ही खुशनसीब मुझ जैसे ,
बेवफाई के बाद भी वफा पाते हैं ,
वरना बहुत है महफ़िल में ,
जो बर्बाद हो जाते हैं ।।

फरेब इश्क

आज फिर मिला मैं उससे ,
बिछड़ने के बाद ,
सब कुछ हो उठा जिंदा ,
उसके मिलने के साथ ।

मिट गया था हर ज़ख्म,
और अब वो मुस्कुरा रही थी ,
किसी गैर के बाहों को ,
अपना घर बता रही थी ।

इश्क़ में हो कर भी किसी के ,
वो इश्क़ तलाशती रहती थी ,
ये अदा आज भी उसकी ,
हुबहु पहले जैसी थी ।

है खड़ा वो पास उसके ,
मुझ जैसे बर्बाद होने को ,
चंद रोज के बेवफाई के बाद ,
एक रोज खाक होने को ।

मैं आज भी तन्हा ,
और बेकार पड़ा हूं ,
इश्क़ में बर्बाद हो कर ,
किसी चौराहे पे खड़ा हूं ।

मालूम नहीं मेरे हिस्से ,
कब वो गैर आयेगा ,
जो इस जिंदा लाश से ,
शिद्दत से इश्क़ निभायेगा ।

चंद खुशनसीब ही इश्क में,
हर रोज़ क़ातिल बन पाते हैं ,
साँसे छीन ,ज़िंदा लाश की
किसी मुर्दे से दिल लगाते हैं ।।

Thursday, May 5, 2022

हमारी जिंदगी

कुछ टूट रहे पत्ते ऊपर से ,
कुछ नीचे से पेड़ उग रहें  ,
अपने ही अरमानों को ,
हम अपने फैसलों से कुचल रहें ।

हां जिंदगी भी गुलजार हैं ,
और जब तक जिंदा है हम ,
पर खुद के फैसलों से ,
थोड़े शर्मिंदा हैं हम ।

क्या करें इस जिंदगी का ,
जो हर पल में बदल जाती हैं ,
एक पल करती बेहद मोहबब्त ,
अगले ही पल बेवफा बन जाती है ।

हर सुबह के बाद शाम ,
और हर खुशी के बाद गम ,
हर रोज़ बार बार मर कर भी ,
देखो अब तक जिंदा हैं हम ।

पर हम जैसा मुसाफ़िर भला ,
कभी कहां ठहर पाता हैं ,
उजाड़ कर बागीचा अपना ,
किसी और का गुलजार कर जाता है ।

खुशकिस्मत हम जैसे ,
और भी इस महफिल में बैठे हैं,
कुछ हो रहें बर्बाद खुद से ,
कुछ "आबाद" हम जैसे हैं ।।